मन, द्रष्टा और जीवन का स्वाभाविक विज्ञान
(जीवन का प्रत्यक्ष विज्ञान-दर्शन — वेदांत 2.0 लाइफ )
बुक्स 2
मन स्वयं आनंद है, स्वयं ब्रह्म है।
बस उसे कर्ता से द्रष्टा बना दो—कर्ता नहीं बचता।
यही द्रष्टा प्रेम है, आनंद है।
तब मन स्थिर होता है, ऊर्जा बहती है—प्रेम, करुणा, दया, सेवा अपने आप प्रकट हो जाते हैं।
सबसे बड़ा भय यही है—
“अगर द्रष्टा बन गया तो संसार कहाँ जाएगा?
मेरी हासिल की गई चीज़ें, मेरी इज्जत, मेरी जीत—इनका क्या होगा?”
यही दुविधा बंधन है।
मन का काम देखना और बोध कराना है, प्रतिक्रिया देना नहीं।
बाक़ी काम बुद्धि, इंद्रियाँ और ऊर्जा करती हैं।
मन स्थित होकर “मेरा” नहीं कहता।
जैसे निद्रा में शरीर, बुद्धि और इंद्रियाँ सो जाती हैं,
वैसे ही मन भी भीतर सो सकता है।
लेकिन मन की विशेषता यह है कि
वह बिना शरीर, बिना बुद्धि, बिना इंद्रियों के
कल्पना और स्वप्न रच सकता है।
जो शरीर, बुद्धि और इंद्रियाँ साकार नहीं कर सकतीं,
मन उन्हें स्वप्न में साकार कर देता है।
मन केवल स्वप्न देखता है।
जब कोई काम नहीं होता,
मन खाली होता है—और स्वप्न देखने लगता है।
सारी ऊर्जा मन पर आ जाती है,
और मन इच्छा, कल्पना, आशा बन जाता है।
मन का काम इच्छा करना है।
एक ही पल में मन ईश्वर बन जाता है, राजा बन जाता है—
बिना कर्म, बिना परिश्रम, बिना नियम।
भीतर ही शासन शुरू कर देता है,
आदर्श गढ़ता है, निर्णय सुनाता है।
सब कुछ काल्पनिक—पाँच मिनट का राजा, पाँच मिनट का राज।
यही मन है।
यही मन धर्म की कहानियों के स्वप्न देखता है—
कि ईश्वर दर्शन देगा,
वेदांत देगा,
धन देगा, पद देगा, शासन देगा।
यह सब पूजा, पाठ, मंत्र, आशा और विश्वास से
काल्पनिक भगवान-देवताओं से पाना चाहता है।
तब धर्म, मंदिर, मूर्ति, गुरु और भगवान सामने आते हैं
और कहते हैं—
“यह संभव है, साधना से संभव होगा।”
जबकि प्रकृति का नियम यह है कि
पुराने अधूरे स्वप्न और कर्म
आज की स्थिति में प्रकट होते हैं।
जो मिला, वह कम लगा—
क्योंकि कभी इच्छा ही बहुत बड़ी की थी।
कभी करोड़ की चाह की थी,
आज हज़ार मिले—तो दुख बना।
अब मन कहता है—
“अगले जन्म में पूरा होगा।”
या नींद में पूरा होगा।
यही दुख का खेल है।
यह मन कर्म का खेल है।
यही मन का अस्तित्व है।
मन शरीर में सबसे सूक्ष्म है।
आज तक कोई विज्ञान, कोई यंत्र
मन को पकड़ नहीं पाया।
इसलिए साधनाएँ बनीं, मंत्र बने।
लेकिन मन और अधिक विकृत हो गया।
धर्म कहता है—
“यह नाम लो, यह देवता है, यह भगवान है—सब इच्छा पूरी करेंगे।”
बुद्धिजीवी चालाकी सिखाते हैं—
जिन्हें मोटिवेशन गुरु कहा जाता है।
किताबें लिखते हैं—चार कदम में सफलता।
मन में इच्छा पैदा करते हैं,
लोग किताबें खरीदते हैं।
यह मूर्ख बनाने की कला है।
दुनिया को मूर्ख बनाया जा सकता है।
मैंने भी कला सीखी, व्यापार किया, सफल हुआ।
लेकिन फिर मुझे भी धार्मिक मूर्ख बनाया गया—
कि यही सफलता नहीं है,
हमारी शरण में आओ,
हमारी संस्था में आओ,
हमारे शिष्य बनो—
तभी स्वर्ग, समाधि, मुक्ति मिलेगी।
जो दुनिया को मूर्ख बनाता है,
वही धर्म में मूर्ख बन जाता है।
यह सब मन का खेल है—
जहाँ जीवन नहीं, केवल कल्पना है।
यह मन है।
मन अपनी स्थिति में खड़ा रहे,
द्रष्टा बने,
ज़रूरत पर निर्णय ले—यही विवेक है।
मन में जितनी इच्छा, कल्पना, आशा, धर्म और स्वप्न भरे हैं,
मन उतना ही विकृत और दूषित है।
धर्म की कहानियाँ फिल्मी कहानियाँ हैं, उपन्यास हैं—
जिनका कोई प्रमाण नहीं हो सकता।
घटना घटी भी हो,
वैसी घटना असंभव है—
लेकिन मन ने संकल्प बना लिया
कि उसे चमत्कार चाहिए।
यही मन दुख है।
इस मन की मूर्खता की कहानी का कोई अंत नहीं।
जिसे हम “मैं” कहते हैं,
बस उसे समझ लो—
“यह मैं हूँ।”
इतना समझना ही
मन की शुद्धि है।
मालिकाना जाएगा,
मन द्रष्टा बनेगा।
द्रष्टा ही मन का पवित्र रूप है।
मन शरीर का अंतिम बिंदु है—
जिसे न बुद्धि सुधार सकती है,
न इंद्रियाँ,
न मृत्यु,
न यम।
इसे खुद समझना होगा,
खुद पहचानना होगा,
खुद अपनी जगह खड़ा होना होगा।
तब जीवन है।
तब आनंद है।
तब फूल, सुगंध, नाद, समाधि, ईश्वर, शांति, प्रेम—
सब भीतर मिल जाते हैं।
पूरा ब्रह्मांड भीतर उतर आता है।
मन बुरा नहीं है।
लेकिन मन के भीतर जितने स्वप्न, आशा और इच्छाएँ भरोगे,
मन उतना ही फूलेगा।
मन गुब्बारा है।
हवा = स्वप्न, आशा, इच्छा।
जब समझ आ जाती है कि यह सत्य नहीं है,
तब दुख पैदा होता है।
और वही दुख
खुद को समझने की तैयारी बनता है।
जब तक मन के भीतर स्वप्न, ख्याल और कल्पनाएँ भरी हैं,
दुख पैदा नहीं होता।
यही संसार है।
जब दुख बाहर होता है,
उसकी जगह आत्मा लेती है—
आनंद लेता है, प्रेम लेता है।
मन जितना भीतर कचरा भरता है,
उतना भारी होता है।
जब भीतर से खाली होता है,
तभी पवित्र होता है,
तभी अमृत-कलश बनता है।
भीतर से खाली करने का कोई उपाय नहीं है।
धर्म भी भीतर भरता है।
साधना भी भीतर भरती है।
और फिर अहंकार भी भर जाता है—
भगवान बन जाता है, गुरु बन जाता है।
जिस गुरु के भीतर मन स्वस्थ है,
आत्मा में आनंद और प्रेम है—
वह साधना, धर्म, सफलता, दुख-सुख की बातें नहीं करेगा।
वह मौन में बैठेगा।
और जो पास आएगा, उससे बस कहेगा—
“बैठ जाओ, मौन हो जाओ।”
लेकिन भीतर इतना कचरा हो
तो मौन असंभव हो जाता है।
कोई दूसरे के मन को समझा नहीं सकता।
मन अति-सूक्ष्म है।
मन खाली
केवल मन ही हो सकता है।
बुद्धि और इंद्रियाँ नीचे हैं—
वे यह काम नहीं कर सकतीं।
मन के भीतर द्रष्टा जागे—
तभी संभव है।
वेदांत कहता है—
कोई साधना नहीं, कोई ज्ञान नहीं।
जो भी उपाय हैं, छोड़ दो।
वेदांत 2.0