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चिरकुंडा में यह कैसी 'खामोश क्रांति'? सत्ता देखती रह गई, 'संकल्प' जीत गया!

"कुर्सी मौन है, मगर काम बोल रहा है,
पिंकी फाउंडेशन के साथ, नया चिरकुंडा डोल रहा है!"
जब वादे सो रहे थे, तब किसने जगाया उम्मीद का सूरज?चुनाव बीत गए, शोर थम गया और विकास की फाइलें धूल फांकने लगीं। लेकिन इस सन्नाटे के बीच, चिरकुंडा के 21 वार्डों में एक नई हलचल है। बिना किसी सरकारी कुर्सी के, 'पिंकी फाउंडेशन' ने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े पद नहीं कर सके।
नारी शक्ति का उदय: 'कल्पना सोरेन' वाली सोच
पिंकी फाउंडेशन ने साबित किया कि विकास के लिए सत्ता नहीं, नीयत चाहिए। फाउंडेशन ने 20-25 महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। यह पहल चीख-चीख कर कह रही है कि चिरकुंडा को अब 'कल्पना सोरेन' जैसा नेतृत्व चाहिए—जो 'मईया सम्मान' की तरह हर महिला का दर्द समझे और जिसके दिल में सत्ता का अहंकार नहीं, सेवा का भाव हो।
रविवार को गवाह बना चिरकुंडा: 'दिशोम गुरु' के जन्मदिन पर अनूठी सेवा
बीते रविवार, जब पूरा राज्य 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन जी का जन्मदिन मना रहा था, पिंकी फाउंडेशन ने इसे 'सेवा पर्व' में बदल दिया:
500 लोगों को गर्माहट: वार्ड नंबर 1 से 21 तक कड़ाके की ठंड में 500 जरूरतमंदों को कंबल ओढ़ाकर इंसानियत का फर्ज निभाया।
वादे की जीत: सबसे भावुक पल वह था जब फाउंडेशन ने अपना पुराना वादा पूरा किया। एक जरूरतमंद दिव्यांग भाई को 2 व्हीलचेयर सौंपकर यह साबित कर दिया कि यहाँ "जो कहा जाता है, वो किया जाता है।"

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