वेदांत 2.0 — मन, आत्मा और जीवन का नियम
मन और बुद्धि केवल यंत्र हैं।
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वेदांत 2.0 — मन, आत्मा और जीवन का नियम
मन और बुद्धि केवल यंत्र हैं।
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वेदांत 2.0 — मन, आत्मा और जीवन का नियम मन और बुद्धि केवल यंत्र हैं। मनुष्य अक्सर मन को ही “मैं” समझ लेता है, और वहीं से झूठा ज्ञान शुरू होता है। लोग पसंद करते हैं, धन्यवाद देते हैं — लेकिन यह भी मन का खेल है, आत्मा का नहीं। आत्मा चुप रहती है। वह हर समय नहीं बोलती; केवल आवश्यकता होने पर प्रकट होती है। मन को “मैं” मान लेना सबसे बड़ी भूल है। जब भीड़ साथ खड़ी हो जाती है, जब लोग एक साथ “हाँ” कहते हैं, तब मन कहता है — “मैं सही हूँ।” गुरु कहता है — “मैं सही हूँ।” धार्मिक कहता है — “मैं सही हूँ।” यहीं मन की गलती शुरू होती है। ओशो ने गीता, उपनिषद या वेद से ज्ञान प्राप्त नहीं किया। पहले भीतर अनुभव हुआ — बोध, जागरण। फिर उस अनुभव को शास्त्रों से मिलाकर देखा कि जो भीतर खिला है, क्या वही सत्य शास्त्रों में भी है। शास्त्रों ने अनुभव पैदा नहीं किया; उन्होंने केवल पुष्टि दी कि जो भीतर है, वह व्यक्तिगत “मैं” नहीं — वह अस्तित्व है। ज्ञान बाहर से नहीं आता। भीतर फूल स्वयं खिलता है। न वेद, न गीता, न उपनिषद, न भगवान, न गुरु, न धर्म — कोई बाहर की चीज भीतर का फूल नहीं खोलती। जीवन को बस जीना होता है। कोई विशेष उपाय नहीं। कोई अनिवार्य साधना नहीं। कोई जटिल ज्ञान जरूरी नहीं। जैसा जीवन मिला है, उसे स्वीकार करो। अपनी जरूरत के अनुसार कर्म करो। धर्म, शास्त्र, नियम, पहचान — सब भूलकर जीवन को सीधे जियो। जब जीवन पूर्णता से जिया जाता है — भीतर फूल अपने आप खिलता है। सत्य पाने से कोई नहीं रोक सकता; रोक केवल अपनी धारणाएँ करती हैं। यह उपदेश नहीं — अनुभव है। 25 साल की खोज का सार है। न धन्यवाद चाहिए, न पूजा, न पहचान। न मैं भगवान हूँ, न गुरु। मुझे मूर्ख समझो — कोई शिकायत नहीं। यदि यम प्रकृति मन की पसंद-नापसंद देखकर अपना धर्म छोड़ दे, तो प्रकृति चल नहीं सकती। इसलिए धन्यवाद या अस्वीकृति की आशा नहीं। केवल नियम — केवल जीवन। ✦ वेदांत 2.0
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