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जय गटागट सरकार: करुणा और चमत्कार के देवता
कहते हैं जब धरती पर विश्वास डगमगाने लगता है और मनुष्य दुखों का बोझ उठाने लगता है, तब गटागट सरकार प्रकट होते
जय गटागट सरकार: करुणा और चमत्कार के देवता
कहते हैं जब धरती पर विश्वास डगमगाने लगता है और मनुष्य दुखों का बोझ उठाने लगता है, तब गटागट सरकार प्रकट होते
जय गटागट सरकार: करुणा और चमत्कार के देवता कहते हैं, जब धरती पर विश्वास डगमगाने लगता है और मनुष्य अपने दुखों का बोझ अकेले उठाने लगता है, तब गटागट सरकार प्रकट होते हैं। वे किसी महल में नहीं रहते, न ही सोने के सिंहासन पर बैठते हैं। उनका वास होता है—आम लोगों के दिलों में। गटागट सरकार का नाम ही उनके स्वभाव को दर्शाता है। “गटा-गट”—अर्थात बिना देर किए, बिना शोर किए, चुपचाप सहायता कर देना। जो उन्हें सच्चे मन से पुकारे, उसकी पीड़ा वे पल भर में हर लेते हैं। कहानी की शुरुआत बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में रामू नाम का किसान रहता था। लगातार सूखे ने उसकी फसल नष्ट कर दी थी। घर में अन्न नहीं था, बच्चों की आँखों में भूख थी और मन में निराशा। एक रात रामू ने टूटे मन से कहा— “हे गटागट सरकार, अगर आप सच में हो, तो मेरी लाज रख लो।” उस रात कोई आकाशवाणी नहीं हुई, कोई चमत्कारी रोशनी नहीं दिखी। बस अगली सुबह गाँव में एक अनजान साधु आया। उसने रामू को कुछ बीज दिए और कहा— “इन्हें बो दो, बाकी मुझ पर छोड़ दो।” रामू ने वैसा ही किया। कुछ ही दिनों में, जब पूरे क्षेत्र में सूखा था, रामू के खेत हरे-भरे हो उठे। लोग दंग रह गए। जब रामू साधु को धन्यवाद देने गया, तो वह साधु कहीं नहीं मिला। बस खेत के किनारे एक पत्थर पर लिखा था— “जहाँ विश्वास है, वहाँ मैं हूँ — गटागट सरकार।” गटागट सरकार की महिमा गटागट सरकार दिखावे के देवता नहीं हैं। वे मंदिर से ज़्यादा मन में बसते हैं। वे प्रसाद से नहीं, सच्चाई और करुणा से प्रसन्न होते हैं। कहते हैं— जो भूखे को खिलाता है, वहाँ गटागट सरकार मुस्कराते हैं जो टूटे मन को सहारा देता है, वहाँ वे प्रकट होते हैं और जो घमंड छोड़ देता है, उसके जीवन से दुख गटागट गायब हो जाते हैं आज भी… आज भी लोग कहते हैं— “काम बन गया, गटागट हो गया” क्योंकि उन्हें विश्वास है कि गटागट सरकार ने चुपचाप अपना काम कर दिया।
जय गटागट सरकार
एक लोक-आस्था पर आधारित दिव्य कथा पुस्तक
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भूमिका
यह कथा किसी धर्म, जाति या संप्रदाय से बँधी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है जो मनुष्य के भीतर जन्म लेता है। गटागट सरकार कोई मूर्ति नहीं, कोई सिंहासनधारी देव नहीं, बल्कि करुणा, सहायता और त्वरित न्याय का प्रतीक हैं। जहाँ पुकार सच्ची होती है, वहाँ गटागट सरकार स्वयं प्रकट होते हैं।
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अध्याय 1: विश्वास का जन्म
बहुत पहले की बात है। विंध्य पर्वत की तलहटी में बसा था एक छोटा-सा गाँव—धर्मपुर। इस गाँव में लोग सीधे-सादे थे, पर दुखों से घिरे रहते थे। कभी सूखा, कभी बीमारी, कभी अन्याय।
उसी गाँव में रहता था हरिदास—एक साधारण किसान। वह रोज़ सुबह खेत पर जाने से पहले आसमान की ओर देखकर कहता—
> “हे जो भी ऊपर है, अगर तुम हो, तो हमें संभाल लो।”
एक दिन गाँव में एक बूढ़ा फकीर आया। उसकी आँखों में अजीब शांति थी। उसने लोगों से कहा—
> “जिसे तुरंत सहारा देने वाला चाहिए, वह गटागट सरकार को याद करे।”
यही से गाँव में पहली बार यह नाम गूंजा—गटागट सरकार।
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अध्याय 2: पहला चमत्कार
कुछ ही दिनों बाद हरिदास का इकलौता बैल मर गया। खेती ठप हो गई। रात को वह टूटकर रोया और पहली बार बोला—
> “गटागट सरकार, अगर आप सच में हो, तो देर मत करना।”
सुबह होते ही गाँव में खबर फैली—किसी अजनबी ने हरिदास के दरवाज़े पर एक स्वस्थ बैल बाँध दिया है। न कोई नाम, न कोई पहचान। बस बैल के गले में बँधी एक पर्ची—
> “देर हो जाए, तो मैं नहीं। — गटागट सरकार”
गाँव के लोग स्तब्ध रह गए।
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अध्याय 3: गटागट का अर्थ
धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि गटागट सरकार का मतलब चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि समय पर सहायता है।
भूखे को भोजन
निराश को आशा
अन्याय पीड़ित को न्याय
बिना ढोल-नगाड़े, बिना प्रचार।
लोग कहने लगे—
> “काम हो गया? समझो
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