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सरना और सनातन एक नहीं आदिवासी पहचान, इतिहास और धार्मिक अस्तित्व पर फिर तेज हुई बहस
सरना और सनातन एक नहीं आदिवासी पहचान, इतिहास और धार्मिक अस्तित्व पर फिर तेज हुई बहस
झारखंड सहित पूरे आदिवासी समाज में एक बार फिर “सरना धर्म” और “सनातन धर्म” की पहचान को लेकर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर सामाजिक चिंतकों, आदिवासी बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक संगठनों का कहना है कि सरना संस्कृति को हिन्दू धर्म या सनातन परंपरा का हिस्सा बताना इतिहास और आदिवासी अस्मिता दोनों के साथ अन्याय है।
लेखक और सामाजिक विचारकों का दावा है कि सरना-आदिवासी संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी प्रकृति-पूजक परंपरा है, जिसकी अपनी अलग धार्मिक व्यवस्था, सामाजिक मान्यताएं, पूजा-पद्धति और सांस्कृतिक पहचान रही है। उनका कहना है कि इसे जबरन हिन्दू धर्म से जोड़ने की कोशिश लगातार की जाती रही है, जबकि ऐतिहासिक दस्तावेज और जनगणना रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बताते हैं।
आदिवासी धर्म को अलग पहचान मिलने के ऐतिहासिक प्रमाण
ब्रिटिश कालीन जनगणनाओं (1871 से 1941) का हवाला देते हुए आदिवासी संगठनों का कहना है कि उस समय “Tribal Religion”, “Animism”, “Aboriginal Religion” और “Nature Worship” जैसे अलग कॉलम मौजूद थे। इसका अर्थ यह था कि अंग्रेजी शासन भी आदिवासी धर्म और हिन्दू धर्म को अलग मानता था।
बाद में 1951 की जनगणना में “Tribal Religion” को हटाकर “Other Religions and Persuasions” कर दिया गया और 1961 में उस कॉलम को भी समाप्त कर दिया गया। आदिवासी संगठनों का आरोप है कि इसी के बाद उनकी धार्मिक पहचान सरकारी रिकॉर्ड में धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई।
जयपाल सिंह मुंडा और संविधान सभा का संदर्भ
इस बहस में संविधान सभा के सदस्य और महान आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
19 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में अपने भाषण के दौरान उन्होंने तत्कालीन नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन 1940 के भाषण का उल्लेख किया था। उस भाषण में आदिवासियों को भारत का “मूल निवासी” बताते हुए उनकी सभ्यता को आर्यों से अलग और अत्यंत प्राचीन कहा गया था।
आदिवासी समाज का मानना है कि यह बयान स्वयं इस बात का ऐतिहासिक संकेत है कि आदिवासी संस्कृति और आर्य/ब्राह्मणवादी परंपराएं अलग-अलग स्रोतों से विकसित हुईं।
“प्रकृति पूजा” बनाम “शास्त्रीय धर्म”
सरना धर्म मानने वाले लोग जल, जंगल, जमीन, सूर्य, चंद्रमा, पहाड़, पेड़ और प्रकृति की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक स्थल “सरना स्थल” कहलाते हैं, जहाँ सामूहिक पूजा और प्रकृति संरक्षण की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
दूसरी ओर हिन्दू धर्म के वेद, पुराण, मनुस्मृति और अन्य धार्मिक ग्रंथों में आदिवासी समाज को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं, लेकिन आदिवासी संगठनों का कहना है कि कहीं भी उन्हें स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म का मूल अंग नहीं बताया गया है। यही वजह है कि सरना को अलग धर्म कोड देने की मांग वर्षों से उठती रही है।
राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सरना धर्म कोड की मांग लगातार तेज होती रही है। आदिवासी समाज का कहना है कि अलग धार्मिक पहचान मिलने से उनकी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को संवैधानिक सुरक्षा मिलेगी।
हालांकि दूसरी ओर कुछ संगठन यह मानते हैं कि आदिवासी परंपराएं भारतीय सनातन संस्कृति का ही हिस्सा हैं और दोनों को अलग-अलग बताना समाज को बांटने की कोशिश है।
लेकिन आदिवासी बुद्धिजीवियों का स्पष्ट कहना है कि “सम्मान तभी संभव है जब पहचान को स्वीकार किया जाए।” उनका तर्क है कि किसी समुदाय की संस्कृति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी बड़े धर्म में समाहित करना सांस्कृतिक अस्तित्व पर खतरा बन सकता है।
जनता के बीच बड़ा सवाल
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान को आधिकारिक मान्यता मिलनी चाहिए?
क्या सरना धर्म को अलग कोड देकर उसकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जाना चाहिए?
या फिर इसे व्यापक भारतीय परंपरा का हिस्सा मानकर देखा जाना चाहिए?
यह बहस अब केवल धर्म की नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की बहस बन चुकी है।
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