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: "शब्दभेदी बाण और 'अंधे' चश्मदीदों का दौर"
"चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।"
: "शब्दभेदी बाण और 'अंधे' चश्मदीदों का दौर"
"चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।"
विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार,
महाकवि चंदबरदाई का यह कालजयी उद्घोष केवल एक राजा को लक्ष्य बताने का निर्देश नहीं था, बल्कि यह उस 'अंतिम अवसर' की पुकार थी, जहाँ चूकने का अर्थ सर्वनाश था। आज सदियों बाद, जब हम विश्व पटल और अपने समाज की गलियों में झांकते हैं, तो ऐसा लगता है कि 'सुल्तान' तो वहीं बैठा है, बस उसके चेहरे और चोगे बदल गए हैं। आज का सुल्तान वह 'साम्राज्यवाद' और 'भ्रष्ट तंत्र' है, जो कभी लोकतंत्र के नाम पर तो कभी सत्ता के रसूख के नाम पर संप्रभुता और मानवता को कुचल रहा है।
वैश्विक संप्रभुता का हनन:
शर्मनाक सन्नाटा,
आज का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य किसी महायुद्ध की आहट से कम नहीं है। ईरान से लेकर वेनेजुएला तक, जिस तरह अमेरिका और इजरायल जैसी शक्तियों ने देशों की संप्रभुता का मखौल उड़ाया है, वह शेष विश्व के लिए केवल 'शर्मनाक' ही नहीं, बल्कि आत्मघाती है। हम विकास के नाम पर 'बारूद' को खूबसूरत फूल समझने की भूल कर रहे हैं। याद रहे, बारूद की दुर्गंध को 'खुशबू' समझना हमारी सबसे बड़ी ऐतिहासिक मूर्खता होगी। विनाश कभी भी प्रगति का पर्याय नहीं हो सकता, और युद्ध कभी शांति का दूत नहीं बन सकता।
चुप्पी का सिद्धांत:
चांदी, सोना या लोहे की जंजीर?
एक पुरानी कहावत है—
"बोलना अगर चांदी है, तो चुप रहना सोना है।"
यह सिद्धांत व्यक्तिगत शांति के लिए श्रेष्ठ हो सकता है, लेकिन जब अन्याय चरम पर हो, तो यही 'सोना' कायरता की लोहे की जंजीर बन जाता है।
हम आज उसी सिद्धांत के गुलाम हो चुके हैं। हमारे आसपास हत्या और बलात्कार जैसी जघन्य घटनाएँ घट रही हैं, और हम 'मूकदर्शक' बने हुए हैं। हम उस समाज का हिस्सा बन गए हैं जो अपनी ही जड़ों के कटने पर 'शांति' का पाठ पढ़ता है।
अंधे चश्मदीद:
एक आधुनिक त्रासदी,
इस लेख का सबसे कड़वा सच यही है कि "अंधे कभी चश्मदीद गवाह नहीं बन सकते।" आज का आधुनिक मानव आँखें रहते हुए भी अंधा है। हम तकनीक से लैस हैं, सोशल मीडिया पर दुनिया देख रहे हैं, लेकिन जब बात गवाही देने की आती है, तो हम अपनी दृष्टि खो देते हैं। यह 'स्वैच्छिक अंधापन' ही है जिसने अपराधियों और भ्रष्ट तंत्र के हौसले बुलंद किए हैं।
चाहे वह हाजीपुर के कार्यालय में ₹50,000 की रिश्वत का खेल हो या वैश्विक स्तर पर किसी देश की स्वायत्तता की लूट—
हमारी चुप्पी ने ही इन 'सुल्तानों' को अभयदान दिया है।
निष्कर्ष:
यदि हम आज भी 'चौहान' की तरह अपना लक्ष्य पहचानने में चूक गए और अपने विवेक का बाण नहीं चलाया, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। अन्याय चाहे सात समंदर पार हो या हमारे पड़ोस की गली में—अन्याय केवल अन्याय होता है। हमें तय करना होगा कि हमारी चुप्पी 'शांति का प्रतीक' है या 'कायरता का आवरण'।
वक्त आ गया है कि हम अपनी आंखों पर बंधी पट्टी खोलें, क्योंकि एक अंधा समाज कभी स्वतंत्र नहीं रह सकता।
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