logo
(Trust Registration No. 393)
AIMA MEDIA
logo

కడప జిల్లా కడప నగరంలో జిల్లా ఎస్పీ ఆదేశాల మేరకు ఆర్టీసీ బస్టాండ్‌లో చిన్నచౌక్ సీఐ ఓబులేష్ యాదవ్ ఆధ్వర్యంలో విస్తృత తనిఖీలు నిర్వహించారు.
ఈ సందర్భంగా బస్టాండ్ పరిసర ప్రాంతాల్లో అనుమానాస్పద వ్యక్తులు, వస్తువులపై ప్రత్యేక దృష్టి సారిస్తూ పోలీసులు తనిఖీలు చేపట్టారు. ప్రయాణికులతో మాట్లాడిన సీఐ ఓబులేష్ యాదవ్, తమ సామాను పట్ల జాగ్రత్తగా ఉండాలని, అనుమానాస్పద వ్యక్తులు కనిపించిన వెంటనే పోలీసులకు సమాచారం ఇవ్వాలని సూచించారు.
అలాగే ప్రజల భద్రతే ప్రధాన లక్ష్యంగా ఇటువంటి తనిఖీలు కొనసాగుతాయని తెలిపారు. పోలీసులు అప్రమత్తంగా ఉండి భద్రతా చర్యలను కట్టుదిట్టం చేశారు.

0
57 views    0 comment
0 Shares

1
2 views    0 comment
0 Shares



विजय कुमार , वरिष्ठ पत्रकार

​पटना। भ्रष्टाचार के दीमक जब रक्षक की वर्दी में घुस जाएं, तो समाज की नींव खोखली होने लगती है।
गया जिले के अतरी थाने के पूर्व प्रभारी लाल बाबू प्रसाद का मामला इसी कड़वे सच की तस्दीक करता है।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की हालिया प्रेस विज्ञप्ति न केवल एक अपराधी को सजा मिलने की सूचना है, बल्कि यह हमारी व्यवस्था के दो चेहरों को उजागर करती है: एक जो भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करती, और दूसरी जो न्याय देने में दो दशक लगा देती है।
​रक्षक जब भक्षक बना
​साल 2006 का वह दौर याद कीजिए, जब अतरी के थाना प्रभारी ने न्याय की कुर्सी पर बैठकर सौदेबाजी की थी।
आरोप था कि निर्दोषों को झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर चंद रुपयों की मांग की गई। ₹8,000 की रिश्वत की मांग और ₹6,000 की वसूली—यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन एक वर्दीधारी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर जनता को डराना 'नैतिक दिवालियापन' की पराकाष्ठा है।

​न्याय की सुस्त रफ़्तार: 2006 से 2026
​इस प्रेस विज्ञप्ति का सबसे चौंकाने वाला पहलू 'समय' है। केस संख्या 62/2006 का फैसला 2026 में आता है। एक अधिकारी को दोषी सिद्ध करने में 20 साल लग गए।
इस बीच उस परिवादी (धनंजय सिंह) के संघर्ष की कल्पना कीजिए, जिसने सिस्टम से लड़ने की हिम्मत दिखाई। हालांकि, निगरानी ब्यूरो और अभियोजन पक्ष (श्री किशोर कुमार सिंह) की सराहना होनी चाहिए कि उन्होंने दो दशकों तक फाइल को दबने नहीं दिया और अंततः दोषी को सलाखों के पीछे पहुँचाया।

​सजा का संदेश: 'देर है, अंधेर नहीं'
​माननीय न्यायाधीश मो० रुस्तम द्वारा सुनाई गई 3 साल की सश्रम कारावास की सजा और ₹50,000 का अर्थदंड उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो सोचते हैं कि वक्त के साथ उनके गुनाह पुराने पड़ जाएंगे। साल 2026 में अब तक 07 भ्रष्टाचार के मामलों में सजा सुनाया जाना यह संकेत देता है कि निगरानी ब्यूरो अब 'एक्शन मोड' में है।
​निष्कर्ष
​लाल बाबू प्रसाद को मिली सजा केवल एक व्यक्ति की हार नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की हार है जो सत्ता और वर्दी को 'वसूली का लाइसेंस' मानती है। लेकिन सवाल फिर वही है—क्या हम भ्रष्टाचार मुक्त बिहार के लिए 20 साल का इंतजार करने को तैयार हैं? न्याय अगर त्वरित (Fast-track) हो, तभी वह प्रभावी भय पैदा कर सकता है। फिलहाल, निगरानी ब्यूरो की यह सफलता भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध में एक 'बूस्टर डोज़' की तरह है।
​संपादकीय दृष्टिकोण: प्रशासन को 'जीरो टॉलरेंस' की नीति के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी लाने की आवश्यकता है, ताकि भ्रष्टाचार के मामलों में 'जस्टिस डिलेड' को 'जस्टिस डिनाइड' न बनने दिया जाए।

0
0 views    0 comment
0 Shares


शाहगंज। नगर के जेसी चौक पर मिशन शक्ति अभियान के अंतर्गत कोतवाली शाहगंज की महिला पुलिस टीम द्वारा जागरूकता अभियान चलाया गया। इस दौरान महिलाओं व युवतियों को उनकी सुरक्षा, अधिकारों एवं आपातकालीन सहायता सेवाओं के प्रति जागरूक किया गया।
अभियान के दौरान महिला पुलिसकर्मी वंदना और आरती ने उपस्थित महिलाओं को विभिन्न सुरक्षा उपायों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने महिला हेल्पलाइन नंबर, आपातकालीन सेवाओं तथा पुलिस से संपर्क करने के सरल तरीकों के बारे में समझाया।
कार्यक्रम में आत्मरक्षा के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। महिला पुलिसकर्मियों ने कहा कि सतर्कता और जागरूकता ही महिलाओं की सुरक्षा की पहली कड़ी है। उन्होंने युवतियों को किसी भी आपात स्थिति में बिना झिझक तुरंत पुलिस सहायता लेने के लिए प्रेरित किया।
महिला पुलिस टीम ने बताया कि मिशन शक्ति अभियान का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ जीवन यापन कर सकें।
जागरूकता कार्यक्रम में शामिल महिलाओं और युवतियों ने पुलिस टीम के इस प्रयास की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किरया। उनका कहना था कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में सुरक्षा और विश्वास का माहौल मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

0
391 views    0 comment
0 Shares

मध्य प्रदेश के धार जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है।

एक महिला, जो अपने पति की मौत पर बिलख-बिलखकर रोती हुई नजर आ रही थी, अब खुद ही हत्या की साजिश की मुख्य आरोपी निकली है। 😳

👉 पहली नजर में ऐसा लग रहा था कि महिला के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, लेकिन जब पुलिस ने जांच की तो कहानी पूरी तरह पलट गई।

🔍 पुलिस जांच में खुलासा:
बताया जा रहा है कि महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही पति की हत्या की साजिश रची।
💰 सिर्फ 1 लाख रुपये में सुपारी देकर इस वारदात को अंजाम दिलवाया गया।

👉 हत्या के बाद महिला ने खुद को बेगुनाह दिखाने के लिए रोने-धोने का नाटक किया, ताकि किसी को उस पर शक न हो।

⚠️ लेकिन कहते हैं ना — सच ज्यादा देर छिप नहीं सकता!
पुलिस की सख्त जांच में पूरा सच सामने आ गया और अब आरोपी महिला पुलिस की गिरफ्त में है।

📢 इस घटना ने एक बार फिर भरोसे और रिश्तों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

👇 आप क्या सोचते हैं? क्या ऐसे मामलों में सख्त सजा होनी चाहिए? कमेंट में जरूर बताएं।

🔁 पोस्ट को शेयर करें, ताकि सच्चाई सब तक पहुंचे
👍 लाइक करें | 📲 फॉलो करें Rao Digital India

0
0 views    0 comment
0 Shares

गजरौला शिव (बिजनौर)। जनपद के गजरौला शिव निवासी कु. सारिका राजपूत ने आयकर विभाग में सुपरिंटेंडेंट के पद पर चयनित होकर क्षेत्र का नाम रोशन किया है। वह सरोज बाल विद्या मंदिर के प्रबंधक श्री योगेश राजपूत एवं श्रीमती ऋतु राजपूत की सुपुत्री हैं।
कठिन परिश्रम, अनुशासन और अटूट लगन के बल पर प्राप्त की गई यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पूरे जनपद के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत भी है।
सारिका राजपूत की यह उपलब्धि यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
हार्दिक शुभकामनाएं! आशा है कि वह अपनी नई जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ करते हुए राष्ट्र सेवा में महत्वपूर्ण योगदान देंगी।

1
0 views    0 comment
0 Shares

0
310 views    0 comment
0 Shares

1
38 views    0 comment
0 Shares

जमशेदपुर में ‘खाओ गली’ पर बवाल, अधिवक्ता ने प्रशासन को दी चेतावनी

जमशेदपुर (झारखंड)। जमशेदपुर सह झारखंड राज्य के वरीय अधिवक्ता एवं समाजवादी चिंतक सुधीर कुमार "पप्पू" ने शहर में विकसित हो रही खाओ गली संस्कृति पर रोक लगाने का आग्रह जिला एवं पुलिस प्रशासन से किया है।

पिछले कुछ वर्षों से अपराधियों और नशेड़ियों में ठेला दुकान गुमटी लगाने की होड़ सी मची हुई है। जनप्रतिनिधि, पुलिस प्रशासन जेएनएसी तथा टाटा स्टील के पदाधिकारीगण मुकदर्शक बने हुए हैं। शहर के चारों तरफ अतिक्रमण अपनी चरम सीमा पर है, सरकारी हो या गैर सरकारी जमीन दबंगो के माध्यम से खरीद बिक्री का खेल चल रहा है। वहीं नई संस्कृति पनपी है कि किसी भी रोड के किनारे दुकान या ठेला लगा दिया जाता है, भाड़ा पर लगाकर अवैध कमाई की जाती है।

ये अपने ठेले और दुकान से विभिन्न तरह के नशे का गैर कानूनी वस्तुएं उपलब्ध करवाते हैं, रात में खुलेआम ठेले या दुकान के ऊपर रखकर सेवन करते हैं और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। जिसके चलते आम जनता को भी काफी मुश्किलों और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

हर रोज़ सड़क जाम, गुंडे नशेड़ियों के माध्यम से रोड पर लगे हुए ठेले में ही नशीले पदार्थ का सेवन, आते-जाते माता और बहनों के साथ छेड़खानी, गंदे-भद्दे कमेंट, चैन स्नेचिंग, मोबाइल चोरी, मारपीट, खून-खराबा और भी तरह-तरह के गैर कानूनी हरकतें होते रहते हैं।

आज के समय में इसी किस्म के अतिक्रमित जगह में ठेला और दुकान लगाकर उसे जगह को खाओ-गली बनाने का नया फैशन जमशेदपुर शहर में चल रहा है, जिस पर प्रशासनिक अधिकारी टाटा स्टील के पदाधिकारी, जेएनएसी के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधिग, चुप्पी धरे बैठे हैं।

जब कोई अप्रिय घटना घट जाती है तब सभी आंदोलन करने पर उतारू होते हैं।बिस्टुपुर, साकची, कदमा, सोनारी और जमशेदपुर के हर जगह से सबको मुक्त करवा दिया जाए और सभी रास्तो को अतिक्रमण मुक्त किया जाए तो शायद जमशेदपुर की जनता चैन से और बेझिझक आना-जाना कर सकेंगे। चापड़ एवं नशा मुक्त शहर बन पाएगा।

अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने जमशेदपुर के पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियो और जेएनएसी से इसके निवारण करने का प्रयास करने की जरुरत पर बल दिया है।

25
1503 views    0 comment
0 Shares

Kolkata: As West Bengal gears up for the 2026 Assembly elections, Kolkata has emerged as the focal point of a high-stakes political contest that is drawing attention across the country. The city, known for its rich political legacy and vibrant civic participation, is once again witnessing an intense battle for power.

The elections are expected to be fiercely contested, with the ruling party aiming to retain its stronghold while the opposition seeks to make significant inroads. Over the past few weeks, Kolkata has seen a surge in campaign activities, including rallies, roadshows, and public meetings, reflecting the importance of urban constituencies in determining the final outcome.

Key issues such as employment opportunities, urban infrastructure, public safety, and governance have dominated the electoral discourse. Political leaders have been actively engaging with voters, promising development, transparency, and improved quality of life. The campaign narrative has also been marked by sharp exchanges and contrasting visions for the state’s future.

Adding to the intensity, concerns over electoral roll revisions have sparked debate among political parties, with allegations and counter-allegations highlighting the charged atmosphere. Despite these tensions, authorities have assured that all necessary measures are being taken to ensure free, fair, and peaceful polling across the city.

Security arrangements have been strengthened, with increased deployment of police personnel and strict monitoring of sensitive areas. Election officials have emphasized their commitment to maintaining law and order, ensuring that citizens can exercise their democratic rights without fear.

Meanwhile, unpredictable weather conditions have posed challenges for campaigners, occasionally disrupting outdoor events. However, voter enthusiasm remains undeterred, with a strong turnout anticipated on polling days.

As Kolkata prepares to cast its votes, the significance of this election extends beyond the city. The results are likely to shape the political trajectory of West Bengal and influence broader national dynamics. For now, all eyes remain on the electorate, whose verdict will ultimately decide the course of governance in the state.



19
734 views    0 comment
0 Shares


पुणे पोलीस खंडणी प्रकरण: 'ब्रेकिंग'च्या नादात कायद्याचा आणि नीतिमत्तेचा खून?

लोकशाहीचा चौथा स्तंभ म्हणून माध्यमांकडे पाहिले जाते. अन्यायाला वाचा फोडणे हे माध्यमांचे कर्तव्य आहे, परंतु अलीकडच्या काळात 'न्याय देणे' आणि 'शिक्षा सुनावणे' हे कामही माध्यमं आणि सोशल मीडियावरील ट्रोलर्स स्वतःच करू लागले आहेत. पुण्यात अलीकडेच पीएसआय बडे, सोनाली हिंगे आणि तायडे यांच्याशी संबंधित जे प्रकरण समोर आले, ते 'मीडिया ट्रायल'चे एक विदारक उदाहरण आहे. कोणत्याही न्यायालयीन निकालापूर्वी, कोणत्याही ठोस पुराव्याशिवाय एखाद्याला गुन्हेगार ठरवून मोकळे होणे, हा समाजासाठी एक धोकादायक कल ठरत आहे.
१. प्रकरणाची पार्श्वभूमी आणि निर्माण केलेला संभ्रम
या प्रकरणात एका महिला प्राचार्यांकडून खंडणी वसूल केल्याचा आरोप पोलीस अधिकाऱ्यांवर ठेवण्यात आला. यात सर्वात कळीचा मुद्दा ठरला तो म्हणजे 'POCSO' (Protection of Children from Sexual Offences) कायद्याचा वापर. माध्यमांनी हा शब्द इतक्या वेगाने फिरवला की जनतेने मूळ प्रकरणाचा विचार सोडून भावनेच्या भरात निकाल द्यायला सुरुवात केली.
पण इथे काही मूलभूत प्रश्न उपस्थित होतात ज्याकडे सर्वांनी जाणीवपूर्वक दुर्लक्ष केले:
• जर हा विषय खरोखरच POCSO अंतर्गत येत होता, तर पीडित मुलगी कोण आहे? तिची ओळख सुरक्षित आहे का?
• घटनेच्या बऱ्याच काळानंतर ही तक्रार का दाखल झाली?
• सर्वात महत्त्वाचे: ज्या कायद्याची भीती दाखवून खंडणी मागितली गेली, तो कायदा त्या परिस्थितीला तांत्रिकदृष्ट्या लागू होत होता का? की केवळ 'पोक्सो' या शब्दाचा धाक दाखवून दहशत निर्माण करण्याचा हा एक नियोजनबद्ध कट होता?
२. 'व्ह्यूज'साठी सत्याचा गळा आवळणारी पत्रकारिता
आजच्या डिजिटल युगात 'पहिले ब्रेकिंग' देण्याच्या शर्यतीत माध्यमांची विवेकबुद्धी हरवत चालली आहे. तुटपुंज्या व्ह्यूजसाठी आणि रेटिंगसाठी काही न्यूज चॅनेल्सनी पुराव्यांची शहानिशा न करता बातम्या चालवल्या. अर्धे-अधुरे सत्य हे पूर्ण असत्यापेक्षा जास्त धोकादायक असते. जेव्हा माध्यमं एखाद्या व्यक्तीला आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभं करतात, तेव्हा त्या व्यक्तीची वर्षानुवर्षांची सामाजिक प्रतिष्ठा एका रात्रीत धुळीस मिळते. हे प्रकरण केवळ खंडणीचे आहे की यामागे काही 'मोठे मासे' दडलेले आहेत, हे शोधण्याचे धाडस कोणीही दाखवले नाही.
३. वरिष्ठ अधिकारी आणि पोलीस दलातील अंतर्गत राजकारण
पोलीस दलासारख्या शिस्तबद्ध विभागात कनिष्ठ अधिकारी आपल्या वरिष्ठांच्या संमतीशिवाय किंवा माहितीशिवाय इतकी मोठी हालचाल करू शकतात का? हा प्रश्न उपस्थित होणे स्वाभाविक आहे. POCSO सारखा गंभीर कायदा जेव्हा चर्चेत येतो, तेव्हा जिल्ह्याचे किंवा शहराचे वरिष्ठ अधिकारी त्यापासून अनभिज्ञ असणे अशक्य आहे. मग प्रश्न असा पडतो की, हे कनिष्ठ अधिकारी आपल्याच विभागातील अंतर्गत राजकारणाचे बळी ठरले आहेत का? केवळ खालच्या स्तरावरील कर्मचाऱ्यांवर खापर फोडून वरिष्ठांना अभय दिले जात आहे का? या प्रकरणातील ही 'काळी बाजू' अद्याप गुलदस्त्यातच आहे.
४. POCSO कायद्याचा शस्त्रासारखा वापर
POCSO हा लहान मुलांच्या संरक्षणासाठी अत्यंत संवेदनशीलतेने बनवलेला कायदा आहे. मात्र, अलीकडे या कायद्याचा वापर वैयक्तिक शत्रुत्व, खंडणी किंवा व्यावसायिक हिशोब चुकता करण्यासाठी 'शस्त्र' म्हणून होताना दिसत आहे. जर अशा गंभीर कायद्याचा गैरवापर झाला, तर भविष्यात खऱ्या पीडितांना न्याय मिळणे कठीण होईल. पुण्याच्या प्रकरणात नेमके हेच घडले आहे का? कायद्याचा धाक दाखवून कोणाची तरी कोंडी करण्याचा हा प्रयत्न होता का? हे विचारण्याऐवजी समाजाने फक्त 'ब्रेकिंग न्यूज' पाहून तोंडसुख घेण्याचे काम केले.
५. डिजिटल मॉब आणि समाजाची जबाबदारी
सोशल मीडियावरील ट्रोलर्स हे आजच्या काळातील 'डिजिटल जमाव' (Digital Mob) बनले आहेत. कोणाबद्दलही काहीही लिहिणे, शिवीगाळ करणे आणि न्यायनिवाडा करणे हे त्यांचे काम झाले आहे. जनतेने हे समजून घेतले पाहिजे की, पोलीस तपास आणि न्यायालयीन प्रक्रिया ही पूर्ण झाल्याशिवाय कोणालाही गुन्हेगार ठरवणे चुकीचे आहे. "बिनडोकपणे" प्रतिक्रिया देण्याऐवजी सत्याची बाजू समजून घेण्याची संयमी वृत्ती समाजात कमी होत चालली आहे, जी लोकशाहीसाठी घातक आहे.
६. निष्कर्ष: नेमका बळी कोणाचा?
मीडिया ट्रायल ही आजची एक भयावह वास्तव आहे. पत्रकारांनी तपास यंत्रणेची किंवा न्यायाधीशांची भूमिका बजावू नये. पुण्याच्या या प्रकरणात 'नेमका बळी कोणाचा गेला?' हे आजही स्पष्ट नाही. जर हे पोलिसवाले व्यवस्थेचे बळी असतील तर त्यांच्यावर झालेला हा अन्याय कधीही भरून न येणारा आहे. आज जर आपण या मीडिया ट्रायलविरुद्ध आवाज उठवला नाही, तर उद्या कोणताही सामान्य नागरिक या डिजिटल भस्मासुराचा बळी ठरू शकतो.
तपास यंत्रणेसाठी आणि समाजासाठी काही अनुत्तरित प्रश्न:
१. तक्रारदाराची आणि त्यामागील सूत्रधारांची विश्वासार्हता काय?
२. विभागीय चौकशी पूर्ण होण्याआधीच गोपनीय माहिती माध्यमांपर्यंत कोणी आणि का पोहोचवली?
३. कथित खंडणीच्या रकमेचा धागादोरा कुठे लागतो का?
४. हा संपूर्ण प्रकार पोलीस दलाची प्रतिमा मलीन करण्याचा तर प्रयत्न नाही ना?
हा वेळ आहे आत्मचिंतनाचा आणि जबाबदार नागरिक म्हणून सत्याच्या पाठीशी उभे राहण्याचा.

1
5 views    0 comment
0 Shares

0
0 views    0 comment
0 Shares

बांसवाड़ा जिले के घाटोल थाना पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए चार साल से फरार चल रहे एक स्थायी वारंटी को गिरफ्तार कर लिया है। यह कार्रवाई पुलिस अधीक्षक सुधीर जोशी के निर्देशन में चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत की गई।

पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार गिरफ्तार आरोपी की पहचान चेतनदास उर्फ भंवरदास, पुत्र बंशीदास वैष्णव, उम्र करीब 46 वर्ष, निवासी लोरडी, देजधरा, थाना झंवर, जिला जोधपुर के रूप में हुई है। आरोपी पिछले लगभग चार वर्षों से फरार चल रहा था और उसके खिलाफ धारा 406, 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत मामला दर्ज था।

घाटोल थाना पुलिस ने आरोपी को जोधपुर से गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।

इस पूरी कार्रवाई को थाना अधिकारी रमेश पन्नू के सुपरविजन में अंजाम दिया गया। कार्रवाई में सहायक उप निरीक्षक कमलेश कुमार और कांस्टेबल गोविंद (नं. 1027) की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पुलिस द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत फरार और वांछित आरोपियों की गिरफ्तारी लगातार जारी है। पुलिस का कहना है कि आगे भी इस तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

0
410 views    0 comment
0 Shares