विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार पश्चिम बंगाल के औसग्राम में एक छोटे-से घर की दहलीज पर जब 5 मई की सुबह मतगणना के नतीजे आए, तो सिर्फ एक सीट नहीं जीती गई एक पूरी ज़िंदगी की तपस्या का फल मिला। कलिता माझी वही महिला जो कुछ दिन पहले तक गुस्करा नगरपालिका के वार्ड नंबर 3 के चार घरों में झाड़ू-पोंछा और बर्तन साफ करके महीने के 2,500 कमाती थीं आज पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य हैं। 1,07,692 वोट और 12,535 मतों का अंतर ये महज संख्याएं नहीं हैं, यह लोकतंत्र की आत्मा का प्रकाशन है।वो ज़मीन जिस पर खड़ी हुई कलिता की कहानी"कोई भी पेशा छोटा नहीं होता लेकिन समाज के कुछ अनकहे नियम हैं।"बंगाल ने उन नियमों को तोड़ा।अनुसूचित जाति से आने वाली कलिता माझी का जीवन हमेशा से संघर्ष की धूप में जला है। पति सुब्रत माझी प्लंबर हैं घर की आमदनी सीमित, ज़िम्मेदारियाँ असीमित। लेकिन कलिता ने हार नहीं मानी। उन्होंने BJP की बूथ-स्तरीय कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में पहला कदम रखा। 2021 के विधानसभा चुनाव में वे TMC के अबेदानंद से महज 12 वोटों से हारी थीं। 12 वोट! इतने करीब से जीत छिन जाना किसी को भी तोड़ देता लेकिन कलिता टूटी नहीं।2025 और उम्मीद की दूसरी पारीपार्टी ने भरोसा जताया, दोबारा टिकट दिया। और इस बार कलिता ने घर-घर जाकर, दरवाजे-दरवाजे खटखटाकर, अपनी संघर्ष की कहानी को ही अपना चुनावी हथियार बनाया। जिस जनता ने उन्हें झाड़ू थामते देखा था, उसी जनता ने उनके हाथ में अपना जनादेश थमाया। TMC के श्यामा प्रसन्न लोहार पस्त हो गए 95,157 वोटों पर सिमट गए।प्रत्याशीपार्टीवोटकलिता माझीBJP1,07,692 श्यामा प्रसन्न लोहारTMC95,157चंचल कुमार माझीCPI(M)16,478तापस बरालकांग्रेस2,0822,500 से 1.25 लाख तक लोकतंत्र का सबसे ईमानदार पुरस्कारकलिता माझी की मासिक आय अब 50,000 वेतन सहित यात्रा भत्ता, चिकित्सा सुविधा, दूरसंचार खर्च मिलाकर करीब 1.25 लाख प्रतिमाह होगी। यह तथ्य किसी मेहनतकश को ईर्ष्या नहीं, बल्कि प्रेरणा देता है कि व्यवस्था में भागीदारी से ज़िंदगी बदलती है।लेकिन यह सफर सिर्फ कलिता का नहीं है। यह उन करोड़ों महिलाओं का सफर है जो सुबह अंधेरे में उठकर दूसरों के घर चमकाती हैं और शाम को लौटकर खुद के सपनों को सोते हुए देखती हैं।बंगाल का राजनीतिक भूकंप और उसकी एक मानवीय कहानी15 साल की TMC सत्ता का अंत हो गया। BJP ने 294 में से 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। PM मोदी ने कहा "पश्चिम बंगाल में कमल खिल गया।" 1972 के बाद पहली बार बंगाल में केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार आने जा रही है।लेकिन इस बड़े राजनीतिक बदलाव के बीच कलिता माझी की जीत सबसे मानवीय और सबसे बड़ी लगती है। क्योंकि यह जीत किसी वंश की विरासत नहीं यह जीत पसीने की कमाई है।सवाल जो राजनीति से पूछने चाहिए,क्या सिर्फ करोड़पति और राजनीतिक परिवारों के लोग ही हमारे प्रतिनिधि बन सकते हैं?क्या किसी कामगार महिला को सत्ता के गलियारों में जगह नहीं?कलिता माझी ने इन सवालों का जवाब दे दिया है।अंतिम बात बंगाल की जनता का संदेश,जब जनता अपने ही जैसे किसी व्यक्ति को सत्ता में भेजती है, तो यह लोकतंत्र की सबसे शुद्ध और सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है। कलिता माझी के पास न धन था, न परिवार की राजनीतिक विरासत पर उनके पास था जनता का भरोसा और खुद पर विश्वास।झाड़ू थामने वाला हाथ अब कानून बनाएगी।