आज ये दृश्य देखकर जो पीड़ा हुई वह केवल व्यक्तिगत शोक नहीं है, वह समूचे सनातन चेतन समाज की आंतरिक वेदना है।
मौनी अमावस्या, जो मौन, तप, करुणा और आत्मसंयम का प्रतीक है—उसी पावन तिथि पर प्रयागराज के संगम तट पर जो हुआ, वह केवल कुछ व्यक्तियों पर किया गया अत्याचार नहीं था, बल्कि सनातन संस्कृति के मस्तक पर किया गया प्रहार था। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज के शिष्यों को शिखा पकड़कर घसीटना, पीटना और अपमानित करना—यह दृश्य किसी भी संवेदनशील हृदय को भीतर तक चीर देने के लिए पर्याप्त है।
शिखा केवल केश नहीं होती। वह ब्रह्मचर्य, विद्या, तप, संयम और परंपरा की जीवित पहचान होती है। शिखा पकड़कर किसी सन्यासी या शिष्य को घसीटना, वास्तव में उस विचार को रौंदना है, जो हजारों वर्षों से भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए है। यह कृत्य केवल हिंसा नहीं, यह सुनियोजित सांस्कृतिक अपमान है।
सबसे पीड़ादायक यह है कि यह सब उस समय हुआ जब साधु, शिष्य और श्रद्धालु किसी विरोध के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ईश्वर-स्मरण के लिए संगम आए थे। जिन हाथों में जपमाला होनी चाहिए थी, वे हाथ स्वयं को बचाने के लिए उठे। जिन नेत्रों में शांति होनी चाहिए थी, उनमें अपमान और पीड़ा उतर आई। क्या यही वह भारत है, जिसकी भूमि को “तपोभूमि” कहा गया?
यह घटना प्रशासनिक विफलता से कहीं अधिक है। यह उस मानसिकता का प्रमाण है, जो आज धर्म को सहज निशाना मानकर अपने अहंकार और सत्ता का प्रदर्शन करती है। जब शस्त्रधारी आतंकी मारे जाते हैं तो उन्हें “मानवाधिकार” याद आते हैं, लेकिन जब निशस्त्र संत पीटे जाते हैं, तब सब चुप क्यों हो जाते हैं?
मेरा हृदय रो रहा है। इसलिए नहीं कि कुछ शिष्यों को चोट लगी, बल्कि इसलिए कि आज भी सनातन को सहनशीलता की आड़ में बार-बार अपमान सहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह मौन अब साधना नहीं, अपराध बनता जा रहा है।
आज आवश्यकता है कि यह पीड़ा केवल आँसू बनकर न बहे, बल्कि चेतना बने। यदि आज भी हम नहीं जागे, तो कल शिखा नहीं, विचार पकड़े जाएंगे; आज शिष्य पिटे हैं, कल सिद्धांत कुचले जाएंगे।
यह समय है—दुख को शक्ति में, पीड़ा को प्रश्न में और मौन को चेतावनी में बदलने का। क्योंकि जब धर्म पर प्रहार होता है, तब चुप रहना अधर्म का समर्थन बन जाता है।
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