भूमिका
यह लेख किसी सरकार, शासन-तंत्र या राजनेताओं के विरुद्ध नहीं है। यह किसी संस्था को कमजोर करने या अविश्वास फैलाने का प्रयास भी नहीं करता।
यह लेख कर अदा करने वाले नागरिकों की जागृति के लिए है। ताकि वे यह समझ सकें कि लोकतंत्र में उनका योगदान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक भी है।
यह एक विरोध नहीं, एक विमर्श है। इसका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संतुलन, उत्तरदायित्व और संवाद को बढ़ाना है।
यह लेख इस विश्वास पर लिखा गया है कि जब करदाता सजग होता है, तो शासन अधिक उत्तरदायी, और लोकतंत्र अधिक स्वस्थ होता है।
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शांति और तर्क — करदाता, सरकार और सम्मान
यह लेख किसी वर्ग के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह न क्रोध से लिखा गया है, न आरोप से। यह एक शांत, तर्कपूर्ण और गंभीर प्रश्न है— कि जिस देश की व्यवस्था कर (Tax) पर चलती है, उस देश में करदाता की जगह क्या है?
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1. सरकार क्या है — और क्या नहीं
सरकार कोई धन पैदा करने वाली संस्था नहीं है। सरकार कोई उद्योग नहीं चलाती। सरकार कोई उत्पादन नहीं करती।
सरकार का पूरा अस्तित्व करदाता के धन पर आधारित है।
शिक्षा
स्वास्थ्य
रक्षा
न्यायपालिका
प्रशासन
सरकारी वेतन
सामाजिक योजनाएँ
इन सबका स्रोत एक ही है— कर (Tax)।
यह तथ्य नहीं, यह आधार है।
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2. कर कौन देता है?
कर कोई काल्पनिक इकाई नहीं देती। कर सरकार नहीं देती। कर व्यवस्था नहीं देती।
कर नागरिक देता है। विशेष रूप से वह नागरिक— जो आयकर देता है, जो अप्रत्यक्ष कर देता है, जो हर वस्तु और सेवा पर कर देता है।
यही नागरिक सरकार को चलाता है, व्यवस्था को जीवित रखता है, और राज्य को सक्षम बनाता है।
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3. करदाता मालिक नहीं, लेकिन आधार है
यह कहना कि करदाता देश का मालिक है— यह अतिशयोक्ति हो सकती है।
लेकिन यह कहना कि करदाता सम्मान का अधिकारी नहीं— यह अन्याय है।
करदाता:
आदेश देने वाला नहीं है
सत्ता चलाने वाला नहीं है
नीति तय करने वाला नहीं है
लेकिन वह आधार है।
जैसे भवन का आधार दिखाई नहीं देता, लेकिन उसी पर पूरा भवन टिका होता है।
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4. चुनाव और कर — दो अलग आवाज़ें
लोकतंत्र में एक आवाज़ है— चुनाव की आवाज़।
लेकिन एक दूसरी आवाज़ भी है— कर की आवाज़।
चुनाव पाँच साल में होता है। कर हर दिन दिया जाता है।
अगर व्यवस्था केवल चुनाव की सुने और कर की न सुने— तो वह व्यवस्था असंतुलित हो जाती है।
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5. आरक्षण और सहायता — साधन या स्थायी व्यवस्था?
सहायता आवश्यक है। कमज़ोर को सहारा देना किसी भी सभ्य समाज का कर्तव्य है।
लेकिन जब सहायता:
स्थायी अधिकार बन जाए
पहचान आधारित बन जाए
योग्यता से ऊपर रखी जाए
तो वह न्याय नहीं रहती, वह व्यवस्था बन जाती है।
और हर व्यवस्था जो आत्म-समीक्षा से मुक्त हो जाए, अंततः अन्याय पैदा करती है।
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6. करदाता की अदृश्य पीड़ा
करदाता:
न तो विशेष सहायता पाता है
न आरक्षण
न सहानुभूति
उससे अपेक्षा की जाती है:
वह कर देता रहे
व्यवस्था चलाता रहे
और चुप रहे
यह चुप्पी कमज़ोरी नहीं, पर उपेक्षा का परिणाम है।
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7. सरकार, न्यायपालिका और उत्तरदायित्व
यदि सरकार केवल सत्ता की सुने, यदि न्यायपालिका केवल क़ानून की भाषा सुने और करदाता की वास्तविक स्थिति न देखे—
तो व्यवस्था अंधी हो जाती है।
क़ानून बिना संवेदना के न्याय नहीं दे सकता।
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8. सम्मान की माँग, सत्ता की नहीं
यह लेख सत्ता की माँग नहीं करता। यह विशेषाधिकार की माँग नहीं करता।
यह केवल इतना कहता है:
> करदाता को कर्मचारी की तरह नहीं, बल्कि आधार की तरह देखा जाए।
सम्मान के साथ। संवाद के साथ। तर्क के साथ।
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9. संतुलन ही समाधान है
न तो:
केवल करदाता सर्वोपरि हो
न ही:
केवल पहचान और संख्या
लोकतंत्र का स्वास्थ्य संतुलन में है।
जहाँ:
सहायता अस्थायी हो
योग्यता जीवित रहे
और करदाता की आवाज़ सुनी जाए
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10. सम्मान, अधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रश्न
नेताओं और अधिकारियों का सम्मान आवश्यक है। लोकतंत्र में पद का सम्मान व्यवस्था को स्थिर रखता है।
लेकिन प्रश्न यह है— सम्मान किस आधार पर और किस सीमा तक?
यदि देश की आर्थिक रीढ़ सिर्फ़ लगभग 10–15% करदाताओं पर टिकी हो, और शासन की दिशा तय करने का अधिकार बाक़ी 85–90% के हाथ में हो— तो यह संतुलन स्वाभाविक नहीं है।
यह लेख यह नहीं कहता कि करदाता ही सर्वोपरि हों। यह केवल यह पूछता है— क्या करदाता की भूमिका केवल भुगतान तक सीमित रहनी चाहिए?
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11. दो सदन, दो आधार — एक सुझाव
लोकसभा सार्वजनिक प्रतिनिधित्व का सदन है। यह जनता की संख्या और मत से बनता है।
लेकिन राज्यसभा यदि केवल राजनीतिक नियुक्तियों का मंच न होकर, आर्थिक उत्तरदायित्व का सदन बने— तो संतुलन संभव है।
एक विचार यह हो सकता है कि:
राज्यसभा में करदाता–आधारित प्रतिनिधित्व हो
या कम से कम करदाताओं की एक स्वतंत्र परिषद विधेयकों की समीक्षा करे
इसका अर्थ सत्ता छीनना नहीं, जवाबदेही बढ़ाना है।
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12. करदाता और भ्रष्टाचार
जब निर्णय लेने वालों को भुगतान करने वालों से कोई सीधा प्रश्न नहीं मिलता, तो लापरवाही बढ़ती है।
यदि करदाता:
सरकार से प्रश्न कर सके
नीतियों को चुनौती दे सके
और जवाबदेही तय कर सके
तो भ्रष्टाचार स्वतः कम होगा।
क्योंकि जहाँ भुगतान करने वाला देख रहा हो, वहाँ अपव्यय कठिन होता है।
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13. क़ानून, सत्ता और आर्थिक विवेक
नेता और क़ानून अंतिम सत्य नहीं होते।
अंतिम सत्य है— व्यवस्था का टिके रहना।
यदि कोई क़ानून आर्थिक रूप से असंतुलित है, यदि वह करदाता पर अनुपातहीन बोझ डालता है, तो उसकी समीक्षा आवश्यक है।
यह समीक्षा केवल राजनीतिक नहीं, आर्थिक विवेक से होनी चाहिए।
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सार — वेदांत 2.0 की नीति-दृष्टि
वेदांत 2.0 की नीति-दृष्टि यह नहीं कहती कि सत्ता किसी एक वर्ग की होनी चाहिए। वह यह भी नहीं कहती कि केवल करदाता ही निर्णायक हों।
लेकिन वह यह स्पष्ट कहती है कि— जो देश की मूल आय (Income) का आधार है, उसकी भूमिका केवल भुगतान तक सीमित नहीं हो सकती।
यदि केवल मत (Vote) के आधार पर सत्ता तय हो, तो सत्ता का भागीदार वही बनता है जिसे तत्काल लाभ मिल रहा होता है।
लेकिन जो नागरिक कर देता है, उसे केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि आधार समझा जाना चाहिए।
आज की व्यवस्था में कर देना कई बार सम्मान नहीं, बल्कि बोझ या अपराध की तरह देखा जाता है।
यह स्थिति वेदांत की दृष्टि से असंतुलित है।
कर देना गुलामी नहीं होना चाहिए। कर देना सहभागिता का प्रतीक होना चाहिए। इसके साथ प्रोत्साहन, आदर, और उत्तरदायित्व जुड़ा होना चाहिए।
वेदांत 2.0 कहता है— जहाँ योगदान है, वहाँ भागीदारी का कोई न कोई रूप अनिवार्य है।
इसका अर्थ यह नहीं कि गरीब सरकार न बना सके। लोकसभा जनता की हो सकती है, और होनी चाहिए।
लेकिन यह भी विचारणीय है कि— राज्यसभा जैसी संस्थाओं में करदाता-आधारित प्रतिनिधित्व या आर्थिक विवेक की स्वतंत्र भूमिका हो।
ताकि नीति-निर्माण में केवल संख्या नहीं, जिम्मेदारी भी बोले।
आज की स्थिति यह है कि— सरकार बनती है, नेता और सरकारी कर्मचारी सुरक्षित होते हैं, लाभार्थी वर्ग संतुष्ट होता है, और करदाता अक्सर अभिशाप की तरह देखा जाता है।
प्रश्न यह है— क्या अधिक कमाना केवल इसीलिए है कि सरकार, नेता और व्यवस्था का निर्वाह किया जाए?
या फिर अधिक कमाने वाला नागरिक भी सम्मान और सार्थक भागीदारी का अधिकारी है?
वेदांत 2.0 का उत्तर स्पष्ट है—
जहाँ आय का आधार है, वहाँ नीति में संतुलित सहभागिता भी होनी चाहिए।
यही संतुलन लोकतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण, और देश को अधिक स्थिर बना सकता है।