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గాంధీ భవన్ మీడియా సమావేశం.

*ఎంపీ చామల కిరణ్ కుమార్ రెడ్డి హాట్ కామెంట్స్*

pc ఘోష్ కమిషన్ పై హై కోర్టు తీర్పు పూర్తి డాక్యుమెంట్ ఇంకా రాలేదు

ఘోష్ కమిషన్ రిపోర్ట్ ను కోర్టు ఎక్కడ తప్పుబట్టలేదు

రిపోర్ట్ లో ఉన్న చిన్న చిన్న ల్యాప్స్ ను సరిచేసుకోవాలని చెప్పింది

దీనికి బి ఆర్ ఎస్ నేతలు సంబరాలు చేసుకోవాల్సిన అవసరం లేదు
ప్రాజెక్ట్ లో అవకతవకలు జరిగాయని ndsa రిపోర్ట్ ఇచ్చింది

Pc ఘోష్ కమిషన్ ఆధారంగా ప్రభుత్వం సీబీఐ ఎంక్వైరీ అడగలేదు

అందుకే ఈ స్టే ఆర్డర్ సీబీఐ కి వర్తించదు

ఇప్పుడు బీజేపీ నాయకులు కిషన్ రెడ్డి, బండి సంజయ్ ల మీద బాధ్యత పెరిగింది

బి ఆర్ ఎస్ వాళ్లకు క్లీన్ చాట్ ఇవ్వడంపై బీజేపీ నేతలకు ఆనందం ఉందా?

లేదంటే వెంటనే సీబీఐ ను దింపాలి

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विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की लपटें अब बिहार के गरीब घरों के चूल्हे तक पहुँच गई हैं।
बिहार सरकार के खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने 21 अप्रैल 2026 को एक ऐसा आदेश जारी किया है जो एक साथ कई भावनाएँ जगाता है —
राहत भी,
और गहरी बेचैनी भी।

आदेश साफ कहता है:
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत आच्छादित लाभुकों को जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों के माध्यम से अब कुकिंग कोयला (Cooking Coal) उपलब्ध कराया जाएगा।

क्यों आई यह नौबत?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से होर्मुज जलसंधि प्रभावित हुई है, जिससे भारत की LPG आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है।
भारत अपनी LPG जरूरतों का लगभग 60% कतर,
यूएई,
सऊदी
अरब ,
और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है।

मार्च 2026 में देश में LPG की खपत में सालाना आधार पर करीब 13% की गिरावट दर्ज की गई, जो सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और आपूर्ति बाधाओं से जुड़ी है।

केंद्र सरकार ने पहले ही होटल,
रेस्तरां को कोयला,
बायोमास और RDF जैसे वैकल्पिक ईंधन इस्तेमाल करने की छूट दे दी थी —
और अब बिहार ने गरीब घरों तक यही विकल्प पहुँचाने का निर्णय लिया है।

बिहार समेत 9 राज्यों ने कमर्शियल LPG के आवंटन के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

राहत और सवाल — दोनों एक साथ:
राहत यह है कि बिहार सरकार ने संकट को पहचाना और गरीब लाभुकों के लिए वैकल्पिक ऊर्जा की व्यवस्था की दिशा में कदम उठाया।
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत त्वरित कार्रवाई का यह प्रयास सराहनीय है।

लेकिन सवाल गहरे हैं —
पहला सवाल —
उज्ज्वला योजना का क्या हुआ?
2016 से शुरू हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का नारा था —
"धुआँमुक्त रसोई,
स्वस्थ परिवार।
" करोड़ों बिहारी महिलाओं को LPG कनेक्शन दिया गया, उन्हें लकड़ी-कोयले के धुएँ से मुक्ति का सपना दिखाया गया।
बिहार जैसे राज्य के लिए,
जहाँ बड़ी आबादी उज्ज्वला योजना पर निर्भर है,
गैस की किल्लत ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती है।
अब उन्हीं को फिर से कोयला थमाना — यह प्रगति का उलटा सफर नहीं तो क्या है?

दूसरा सवाल —
कितना,
कब,
कितने दाम पर?
राशन कार्ड धारी को कब और कितना कोयला मिलेगा, इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है।

आदेश जारी हो गया — खान विभाग, परिवहन विभाग और सभी 38 जिलों के DM को पत्र भेज दिया —
लेकिन लाभुक के घर तक कोयला पहुँचने की ठोस समयसीमा, मात्रा और दर अभी भी अस्पष्ट है।
बिहार में PDS प्रणाली की जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं —
राशन में अनाज के लिए भी महीनों इंतज़ार होता है, कोयला कब मिलेगा?

तीसरा सवाल — स्वास्थ्य और पर्यावरण का क्या?
कोयले से खाना पकाने पर घर के अंदर वायु प्रदूषण होता है जो फेफड़ों, आँखों और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है।
WHO के अनुसार, घर के अंदर ठोस ईंधन के धुएँ से हर वर्ष लाखों मौतें होती हैं —
और इनमें सर्वाधिक पीड़ित महिलाएँ और बच्चे होते हैं।

चौथा सवाल — दीर्घकालिक ऊर्जा नीति कहाँ है?
यह संकट अचानक नहीं आया। होर्मुज जलसंधि पर खतरे की चेतावनियाँ महीनों से थीं। पाइपलाइन कनेक्टिविटी, PNG नेटवर्क और इंडक्शन कुकिंग जैसे दीर्घकालिक विकल्पों की ओर कदम बढ़ाने की ज़रूरत थी।
क्या बिहार सरकार के पास ऊर्जा विविधीकरण की कोई दूरदर्शी नीति है — या हर संकट में आपातकालीन जुगाड़?
निष्कर्ष
बिहार सरकार का यह आदेश जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं।
वैश्विक युद्ध के कारण आए ऊर्जा संकट में गरीब परिवारों को वैकल्पिक ईंधन देना सरकार की जिम्मेदारी है —
यह सही कदम है।

लेकिन कोयले की राशन दुकान तक पहुँचाने की व्यावहारिक रूपरेखा, स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय, महिलाओं पर पड़ने वाले असर और इस संकट से दीर्घकालिक निकास की योजना —
ये सब अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा में हैं।

"धुआँमुक्त बिहार" के नारे से "कोयला राशन" तक का यह सफर — यह बताता है कि वैश्विक युद्ध की आँच सबसे पहले और सबसे गहरे गरीब की रसोई में पहुँचती है।

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*మంత్రి పొన్నం ప్రభాకర్*
తెలంగాణ గ్రామీణ ప్రాంతాల పేద ప్రజలకు లైఫ్ లైన్ ఆర్టీసీ..
ఆర్టీసీ సంస్థ పరిరక్షణ,ప్రజా శ్రేయస్సు దృశ్య ఆర్టీసీ కార్మికులు సమ్మె విరమించాలని విజ్ఞప్తి చేస్తున్న..

ఆర్టీసీ లో రోజుకు 65 లక్షల మంది ప్రయాణికులు అందులో 40 లక్షల మంది మహిళా ప్రయాణికులు ప్రయాణిస్తున్నారు.వారు ఉద్యోగ రీత్యా,విద్యా,వైద్య అవసరాలకు ప్రయాణం చేస్తున్నారు

ఆర్టీసీ కార్మికులు లేవనెత్తిన 32 అంశాల్లో 29 అంశాలకు ప్రభుత్వం పరిష్కరించడానికి సిద్ధంగా ఉంది

మిగిలిన మూడు అంశాలపై చర్చిస్తున్నాం..

మేము రాగానే వేసిన మొట్ట మొదటి కమిటీ సీనియర్ ఐఏఏస్ లతో వేశాం..

అధికారుల కమిటీ తో ఐదు గంటలపైగా చర్చిస్తుండగానే సమ్మెకు పోతున్నామని మద్యలో వెళ్లిపోవడం ఇది కుట్ర లో భాగమే

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विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

बिहार सरकार के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने 10 अप्रैल 2026 को एक ऐसा आदेश जारी किया जो बिहार की प्रशासनिक संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आदेश संख्या 4626 के तहत श्री काशी नाथ माँझी — जो बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग (BPSSC), पटना में पुलिस उपाधीक्षक के पद से महज 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे —
उन्हें संविदा के आधार पर उसी पद पर, उसी कार्यालय में पुनः नियोजित कर दिया गया।

सेवानिवृत्ति के सिर्फ 100 दिन बाद —
वही कुर्सी,
वही कार्यालय,
वही पद।

आदेश क्या कहता है?
सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार के संकल्प ज्ञापांक-10000, दिनांक 10.07.2015 के अंतर्गत बनाई गई राज्यस्तरीय चयन समिति की 16 मार्च 2026 को आयोजित बैठक में लिए गए निर्णय के आधार पर यह नियोजन किया गया है।
यह संविदा दो वर्ष के लिए है —
अथवा उस पद पर नियमित नियुक्ति/प्रोन्नति होने तक।

आदेश की शर्तें यह भी कहती हैं कि यदि श्री माँझी के विरुद्ध किसी प्रकार का आरोप प्रमाणित होता है,
या उनका कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है,
तो संविदा रद्द हो सकती है।

चार तीखे सवाल
1. क्या 2015 का संकल्प इसी काम के लिए बना था?
वर्ष 2015 में सामान्य प्रशासन विभाग का यह संकल्प वास्तविक रिक्तता और संस्थागत संकट की स्थिति में सेवानिवृत्त अनुभवी अधिकारियों की अस्थायी सेवा लेने के लिए बना था।
लेकिन जब BPSSC जैसे आयोग में —
जो स्वयं हज़ारों पुलिस पदों पर भर्ती करता है — पुलिस उपाधीक्षक का पद भरने के लिए कोई योग्य अधिकारी उपलब्ध नहीं है,
तो यह बिहार पुलिस व्यवस्था की दयनीय स्थिति को दर्शाता है —
या फिर किसी 'चहेते अधिकारी' को बचाए रखने की कोशिश।

2. वही कार्यालय,
वही पद —
पर नियमित नियुक्ति क्यों नहीं?
बिहार में पुलिस अधिकारियों की प्रोन्नति वर्षों से लंबित है। सैकड़ों इंस्पेक्टर DSP पद पाने की प्रतीक्षा में हैं।
ऐसे में एक सेवानिवृत्त DSP को संविदा पर रखना — बजाय किसी पात्र सेवारत अधिकारी को प्रोन्नत करने के —
प्रशासनिक तर्क से परे लगता है।
क्या 16 मार्च 2026 को चयन समिति की बैठक में यह विकल्प विचारा गया?

3. BPSSC में यह संविदा नियुक्ति —
विडंबना नहीं?
BPSSC वह आयोग है जो बिहार में दारोगा (SI), सार्जेंट जैसे पुलिस पदों पर भर्ती करता है।
हज़ारों युवा इस आयोग की परीक्षाओं के नतीजे और नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं।
जिस संस्था से बेरोजगार युवाओं को नौकरी की उम्मीद है —
उसी में एक सेवानिवृत्त अधिकारी को 2 साल के लिए वापस बैठा देना — यह संदेश क्या देता है?

4. पारदर्शिता कहाँ है?
आदेश में यह नहीं बताया गया कि इस पद के लिए और कितने उम्मीदवार विचारे गए?
चयन समिति ने क्या मानदंड अपनाए?
क्या किसी सेवारत अधिकारी की प्रोन्नति की संभावना खोजी गई?
2015 का संकल्प कहता है कि संविदा नियोजन "अंतिम विकल्प" होना चाहिए —
क्या यहाँ अन्य विकल्प आज़माए गए?

निष्कर्ष
श्री काशी नाथ माँझी की व्यक्तिगत योग्यता पर कोई प्रश्न नहीं है।
सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता पर है,
व्यवस्था की प्राथमिकता पर है।

जब बिहार में लाखों शिक्षित युवा पुलिस की वर्दी के लिए दशकों इंतज़ार करते हैं —
और जब उसी भर्ती करने वाले आयोग में एक सेवानिवृत्त अफसर को 100 दिन में वापस बैठा दिया जाता है —
तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है:
क्या बिहार में "संविदा नीति" वास्तव में संस्थागत ज़रूरत के लिए है —
या चुनिंदा अफसरों की सेवा-विस्तार का एक सुविधाजनक रास्ता बन गई है?

यह प्रश्न गृह विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और जनता — तीनों को जवाब माँगता है।

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AIMA media Dr Riyasat saifi

*लखनऊ 21 अप्रैल, 2026 राजधानी के विकास नगर में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड के बाद राहत कार्यों में जुटी संस्था 'रहमान फाउंडेशन' ने आज सहायता के दायरे को बढ़ाते हुए दैनिक जरूरत का सामान बांटा है। प्रख्यात इस्लामी विद्वान मौलाना खलील- उर -रहमान सज्जाद नोमानी, के दिशा-निर्देशों पर काम करते हुए, फाउंडेशन की महिला विंग ने मंगलवार को प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया और पीड़ित परिवारों, विशेषकर महिलाओं तक व्यक्तिगत रूप से पहुँचकर उन्हें जरूरी राहत सामग्री दी। अग्निकांड के कारण इन परिवारों का घरेलू सामान पूरी तरह जलकर नष्ट हो गया था, जिससे उन्हें दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कामों में भी बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनकी जरूरतों को समझते हुए रहमान फाउंडेशन के जनरल सेक्रेटरी मौलाना बिलाल सज्जाद नोमानी की अगुवाई में राहत सामग्री के रूप में नई किट वितरित की गई। प्रत्येक पीड़ित परिवार को खाना बनाने और भोजन करने के लिए जरूरी बर्तन और बाल्टी, स्वास्थ्य और स्वच्छता बनाए रखने के उद्देश्य से टूथपेस्ट, साबुन और सफाई से जुड़ी अन्य सामग्री प्रदान की गई। संस्था की महिला विंग ने विशेष रूप से पीड़ित महिलाओं की निजता और गरिमा का ध्यान रखते हुए उनसे जुड़ी आवश्यक व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं वितरित कीं। रहमान फाउंडेशन के जनरल सेक्रेटरी मौलाना बिलाल सज्जाद नोमानी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि उनकी टीम पहले स्थिति का जायजा लेती है और उसी के आधार पर जरूरत का सामान लोगों तक पहुंचाती है। उन्होंने बताया, "हम लोग विकास नगर में लगभग सातवीं-आठवीं बार आए हैं। मौजूदा समय में लोगों को खाने या कपड़ों की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं की है। इसलिए जमीनी स्तर पर आकलन करने के बाद, इस बार मुख्य रूप से खाना पकाने के बर्तन, नहाने और कपड़े धोने के काम आने वाले जरूरी सामान का वितरण किया गया है। उन्होंने बताया कि आज इस राहत कार्य में 'रहमान फाउंडेशन' के महिला विंग का विशेष योगदान रहा। सबसे खास बात यह रही कि इसमें महिलाओं की बुनियादी जरूरतों और उनकी हाइजीन (साफ-सफाई) से जुड़े सामानों पर विशेष ध्यान दिया गया। यह सारा सामान फाउंडेशन की महिला स्वयंसेविकाओं के हाथों ही बंटवाया गया ताकि महिलाओं को किसी तरह की झिझक न हो। मौलाना बिलाल नोमानी ने कहा कि उनकी टीम लगातार इस इलाके की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और भविष्य में भी, जिस वक्त जिस चीज की जरूरत होगी, उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। 'रहमान फाउंडेशन' की महिला विंग ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर हालात का जायजा लिया और पीड़ितों की मदद की। मीडिया से बात करते हुए प्रतिनिधि ने बताया, "हमें फाउंडेशन के जरिए यहाँ भेजा गया है। हमने खुद यहाँ का जायजा लिया है। इस वक्त लोगों को खाने और कपड़ों से ज्यादा अन्य बुनियादी चीजों की जरूरत है।" उन्होंने बताया कि लोगों के पास सामान रखने तक की जगह नहीं है, इसलिए उन्हें बर्तन, सामान रखने के लिए बैग या झोले, बैठने के लिए चटाई और हाथ वाले पंखों की सख्त जरूरत है। संस्था का प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा ऐसी चीजें लोगों तक पहुंचाई जाएं। पीड़ितों का दर्द बयां करते हुए प्रतिनिधि काफी भावुक हो गईं।उन्होंने कहा, "एक औरत का दर्द एक औरत ही समझ सकती है। यहाँ लोगों के आंसू लगातार बह रहे हैं, उन्हें इस हाल में देखकर हमें भी बहुत रोना आ रहा है। इन गरीबों का सब कुछ जल चुका है। उनकी जिंदगी की तमाम चीजें, उनके ख्वाब और बच्चों का मुस्तक़बिल सब खाक हो गया है।" गौरतलब हो कि इससे पहले भी फाउंडेशन के जिम्मेदारों ने भोजन, पेयजल और रहने के लिए टेंट (तंबू) की व्यवस्था की गई थी। रहमान फाउंडेशन का कहना है कि वे इस कठिन समय में प्रभावित परिवारों के साथ तब तक खड़े रहेंगे जब तक कि उनका जीवन सामान्य नहीं हो जाता। मौलाना सज्जाद नोमानी ने टीम को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि राहत वितरण में मानवीय गरिमा का पूरा ख्याल रखा जाए। विकास नगर के स्थानीय निवासियों ने फाउंडेशन की इस संवेदनशील पहल और विशेष रूप से महिला विंग द्वारा की गई मदद की सराहना की है।*

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सीतामढ़ी: कन्हौली थाना परिसर में 720 लीटर नेपाली सौंफी शराब का विनष्टिकरण
सीतामढ़ी जिले के कन्हौली थाना परिसर में दिनांक 22 अप्रैल 2026 को मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में बड़ी कार्रवाई करते हुए कुल 720 लीटर नेपाली सौंफी शराब का विधिवत् विनष्टिकरण किया गया। यह कार्रवाई बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून के तहत की गई, जिसका उद्देश्य अवैध शराब के कारोबार पर रोक लगाना और समाज में कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखना है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह शराब विभिन्न मामलों में पुलिस द्वारा जब्त की गई थी। जब्ती के बाद संबंधित मामलों की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के उपरांत न्यायालय के निर्देशानुसार इन सभी शराब की खेपों को नष्ट किया गया। विनष्टिकरण की पूरी प्रक्रिया मजिस्ट्रेट की निगरानी में पारदर्शिता के साथ संपन्न हुई।
इस दौरान कन्हौली थाना के पुलिस पदाधिकारी, स्थानीय प्रशासन के प्रतिनिधि एवं अन्य संबंधित कर्मी उपस्थित रहे। अधिकारियों ने बताया कि शराबबंदी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लगातार छापेमारी, जांच अभियान और जब्ती की कार्रवाई जारी है। इसी क्रम में जब्त की गई अवैध शराब को समय-समय पर नष्ट किया जाता है ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके।
प्रशासन ने आम लोगों से अपील की है कि वे शराबबंदी कानून का पालन करें और किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में सकारात्मक संदेश गया है और प्रशासन के प्रयासों की सराहना की जा रही है।

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​मेलघाट: जल संकट से जूझ रहे मेलघाट के बोरधा गांव के ग्रामीणों ने प्रशासन की घोर अनदेखी के बाद आखिरकार खुद मोर्चा संभाल लिया है। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जब शासन-प्रशासन ने पानी की विकट समस्या पर ध्यान नहीं दिया, तो गांव वालों ने आपसी सहयोग (लोक वर्गणी) से पैसे इकट्ठा कर खुद ही बोरवेल की खुदाई करवा ली।
​प्रशासन की विफलता और आदिवासियों की आत्मनिर्भरता
​ग्रामीणों के इस प्रयास को बड़ी सफलता मिली और बोरवेल में भरपूर पानी निकला है। पानी लगने की खुशी में स्थानिक लोगों ने अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपरा के अनुसार बोरवेल की महापूजा संपन्न की।
​यह पूरी घटना शासन और प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली पर एक करारा तमाचा है। इससे यह स्पष्ट रूप से साबित होता है कि मेलघाट के स्थानिक आदिवासी अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए पूरी तरह से सरकार के मोहताज नहीं हैं; वे अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने में सक्षम हैं। प्रशासन के लिए यह बेहद शर्म की बात है कि जो मूलभूत सुविधाएं उन्हें उपलब्ध करानी चाहिए थीं, उसके लिए ग्रामीणों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ा।
​युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष के हाथों हुआ उद्घाटन
​ग्रामीणों की इस बड़ी उपलब्धि और सफलता के उपलक्ष्य में विशेष तौर पर युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राहुल येवले को आमंत्रित किया गया था। उनके हाथों इस नवनिर्मित बोरवेल का विधिवत उद्घाटन किया गया।
​उद्घाटन के अवसर पर इनकी रही प्रमुख उपस्थिति:
इस अवसर पर गांव के कई नागरिक और गणमान्य लोग उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
​छन्नु भैया, लालाजी कास्देकर, सज्जु भैया, कज्जु कास्देकर, सोमा कास्देकर, मुगा धिकार, मुन्ना बेठेकर, अशोक भुसुम, मधु धिकार, संजू कास्देकर

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