भारत केवल आध्यात्म का देश नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित, खगोल और चिकित्सा का भी आदि स्रोत - महेश शर्मा
मेरठ। विद्या भारती द्वारा आयोजित दस दिवसीय "आचार्य दक्षता वर्ग" के पांचवें दिवस पर पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए हवन का आयोजन किया गया एवं इस अवसर पर वृक्षारोपण भी किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में विद्या भारती के प्रांतीय शैक्षिक प्रमुख श्री महेश शर्मा जी उपस्थित रहे। उनका विषय था "भारतीय ज्ञान परंपरा: अतीत से वर्तमान तक"। उन्होंने अत्यंत रोचक एवं तथ्यपरक शैली में भारतीय मनीषा के वैज्ञानिक योगदान को रेखांकित किया। वर्ग में प्रांत भर से आए 150 से अधिक आचार्यों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सामूहिक सरस्वती वंदना से हुआ। शिशु शिक्षा समिति के प्रदेश निरीक्षक श्री मदनपाल जी ने प्रस्तावना रखते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश समय की मांग है।
मुख्य वक्ता महेश शर्मा ने अपने उद्बोधन की शुरुआत में स्पष्ट किया कि भारत केवल आध्यात्म का देश नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित, खगोल और चिकित्सा का भी आदि स्रोत रहा है। पश्चिमी जगत ने जिन सिद्धांतों को 16वीं-17वीं शताब्दी में खोजा, वे भारत में हजारों वर्ष पूर्व ग्रंथों में दर्ज थे।
श्री शर्मा जी ने आर्यभट्ट के योगदान को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि आर्यभट्ट ने 5वीं शताब्दी में ही बता दिया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन-रात होते हैं। आर्यभटीय ग्रंथ में पाई के मान का शुद्ध उल्लेख और वर्गमूल-घनमूल निकालने की विधि विश्व को भारत की देन है।
ब्रह्मगुप्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि शून्य को संख्या के रूप में प्रतिष्ठित करने और ऋणात्मक संख्याओं के नियम बनाने का श्रेय ब्रह्मगुप्त को जाता है। उनके ग्रंथ "ब्राह्मस्फुट सिद्धांत" में बीजगणित के सूत्र आज भी प्रासंगिक हैं।
उन्होंने बताया कि दशमलव प्रणाली, स्थानमान पद्धति भारत ने विश्व को दी। भारतीय कालगणना की सूक्ष्मता अद्भुत है। । ग्रहों की स्थिति, राशि का निर्धारण, नक्षत्र विज्ञान में भारत सदैव अग्रणी रहा।
शर्मा जी ने आयुर्वेद के शल्य चिकित्सा के जनक आचार्य सुश्रुत के योगदान पर प्रकाश डाला। सुश्रुत संहिता में 300 प्रकार की शल्य क्रियाओं, 125 से अधिक शल्य उपकरणों और प्लास्टिक सर्जरी तक का वर्णन है। राइनोप्लास्टी यानी नाक की पुनर्रचना की विधि सुश्रुत ने 600 ईसा पूर्व ही विकसित कर ली थी। उन्होंने बताया कि भारतीय पंचांग की सटीकता का आधार खगोलीय गणना है। आर्यभट्ट ने चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का वैज्ञानिक कारण बताया कि ग्रहण राहु-केतु के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी एवं चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं।
वराहमिहिर की "पंचसिद्धांतिका" में ग्रहों की गति, युति, उदय-अस्त की गणना के सूत्र दिए गए हैं। भास्कराचार्य द्वितीय ने "सिद्धांत शिरोमणि" में स्पष्ट किया कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। ये सभी तथ्य यूरोप से सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत में प्रतिपादित हो चुके थे।
अपने उद्बोधन के समापन में श्री शर्मा जी ने कहा कि मैकाले की शिक्षा पद्धति ने हमें अपनी जड़ों से काटने का प्रयास किया। अब आवश्यकता है कि हम आचार्य के रूप में कक्षा-कक्ष में भारतीय ज्ञान परंपरा के गौरव को पुनर्स्थापित करें।
उन्होंने सुझाव दिया कि गणित पढ़ाते समय आर्यभट्ट-ब्रह्मगुप्त, विज्ञान में कणाद-नागार्जुन, चिकित्सा में चरक-सुश्रुत का उल्लेख अवश्य किया जाए। इससे विद्यार्थियों में स्वाभिमान जगेगा और वे अनुसंधान के लिए प्रेरित होंगे।
कार्यक्रम के अंत में कमला देवी सरस्वती शिशु मंदिर की प्रधानाचार्य श्रीमती गीता अग्रवाल जी ने सभी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि अगले सत्र से प्रत्येक विद्यालय में "भारतीय ज्ञान परंपरा कोना" स्थापित किया जाएगा। इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री प्रभात गुप्ता, मनोहर देवी शिशु वाटिका की प्रधानाचार्य श्रीमती सीमा श्रीवास्तव, दस्तावर के वर्ग संयोजक श्री हरिशंकर जी आदि उपस्थित रहे l