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संघर्ष की मिसाल: उत्तराखंड से ऑल इंडिया फार्मासिस्ट फेडरेशन को मजबूत कर रहे प्रदीप चौहान

कभी कानपुर के हैलेट अस्पताल के गलियारों में फार्मेसी प्रशिक्षण लेने वाला एक साधारण युवा आज फार्मासिस्ट आंदोलन का एक समर्पित चेहरा बन चुका है। यह कहानी है प्रदीप चौहान की — उस साथी की, जिसने संघर्षों से भरे रास्ते को चुना, लेकिन कभी हार मानना नहीं सीखा।

आज प्रदीप चौहान उत्तराखंड में रहते हुए “ऑल इंडिया फार्मासिस्ट फेडरेशन” को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका सफर केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि दोस्ती, संघर्ष और पेशे के सम्मान की लड़ाई की कहानी है।

हैलेट अस्पताल से शुरू हुआ सफर

साल 2014 में कानपुर के हैलेट अस्पताल में फार्मेसी प्रशिक्षण के दौरान प्रदीप चौहान की मुलाकात उन साथियों से हुई, जो आगे चलकर उनके संघर्ष के सबसे मजबूत साथी बने।

हैलेट अस्पताल ने उन्हें सिर्फ दवाइयों की जानकारी नहीं दी, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई से भी परिचित कराया।

उन्होंने देखा:

सीमित संसाधनों में काम करते फार्मासिस्ट

अस्पतालों में बढ़ता कार्यभार

जिम्मेदारियां अधिक लेकिन सम्मान कम

फार्मासिस्टों की समस्याओं को नजरअंदाज किया जाना


इन परिस्थितियों ने उनके भीतर बदलाव की इच्छा पैदा की।

प्रदीप चौहान स्वभाव से शांत थे, लेकिन अंदर से बेहद दृढ़। वे ज्यादा बोलने के बजाय काम करने में विश्वास रखते थे। जब बाकी लोग चर्चा करते थे, तब प्रदीप जमीन पर जाकर लोगों को जोड़ने का काम करते थे।

“फार्मासिस्ट फाउंडेशन” से आंदोलन की शुरुआत

हैलेट अस्पताल के दिनों में ही प्रदीप चौहान और उनके साथियों का जुड़ाव “फार्मासिस्ट फाउंडेशन” से हुआ।

उस समय फार्मासिस्ट विनय भारतीय और अमित श्रीवास्तव जैसे वरिष्ठ लोगों के नेतृत्व में युवा फार्मासिस्टों को संगठन और आंदोलन की दिशा समझने का अवसर मिला।

प्रदीप चौहान ने इस दौर में संगठन निर्माण की बारीकियां सीखीं:

लोगों को जोड़ना

जिलों में नेटवर्क बनाना

फार्मासिस्टों की समस्याओं को सुनना

आंदोलन को अनुशासित रखना


उन्होंने दिन-रात मेहनत की और जमीनी स्तर पर काम करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई।

जब संघर्ष ने नया मोड़ लिया

समय के साथ संगठन के भीतर कुछ लोगों का प्रभाव बढ़ने लगा। कई कार्यकर्ताओं को महसूस होने लगा कि जमीनी स्तर पर काम करने वालों की आवाज़ कमजोर पड़ रही है।

प्रदीप चौहान और उनके साथियों का मानना था कि संगठन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर फार्मासिस्ट का होना चाहिए।

यहीं से बदलाव की सोच मजबूत हुई।

यह फैसला आसान नहीं था।
नया मंच बनाना मतलब नई चुनौतियां, नए विरोध और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना।

लेकिन प्रदीप चौहान पीछे हटने वालों में नहीं थे।

“ऑल इंडिया फार्मासिस्ट फेडरेशन” के निर्माण में भूमिका

जब “ऑल इंडिया फार्मासिस्ट फेडरेशन” की नींव रखी गई, तब प्रदीप चौहान उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का काम किया।

उन्होंने हमेशा यह कोशिश की कि छोटे जिलों और दूरदराज के क्षेत्रों के फार्मासिस्ट भी संगठन से जुड़ें और अपनी आवाज़ उठा सकें।

आज भी वे इसी सोच के साथ काम कर रहे हैं।

“ऑल इंडिया फार्मासिस्ट फेडरेशन” फार्मासिस्टों को एकजुट करने और उनके अधिकारों की आवाज़ बनने का प्रयास कर रहा है। संगठन का उद्देश्य फार्मासिस्टों की पेशेगत पहचान, कार्य परिस्थितियों और स्वास्थ्य व्यवस्था में उनकी भूमिका को मजबूत करना है।

उत्तराखंड में नई जिम्मेदारी

आज प्रदीप चौहान उत्तराखंड में रहकर संगठन को मजबूत करने में लगे हुए हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां अलग हैं। कई जगह संसाधनों की कमी है और फार्मासिस्टों को सीमित सुविधाओं में काम करना पड़ता है।

प्रदीप चौहान लगातार कोशिश कर रहे हैं कि:

फार्मासिस्टों की आवाज़ दूरदराज तक पहुंचे

युवा फार्मासिस्ट संगठन से जुड़ें

पेशे के सम्मान की लड़ाई मजबूत हो

स्वास्थ्य व्यवस्था में फार्मासिस्टों की भूमिका को गंभीरता से लिया जाए


उनके करीबी लोग बताते हैं कि वे आज भी उसी सादगी और समर्पण के साथ काम करते हैं, जैसे हैलेट अस्पताल के दिनों में करते थे।

दोस्ती और संघर्ष आज भी साथ हैं

प्रदीप चौहान की सबसे बड़ी ताकत केवल उनका संघर्ष नहीं, बल्कि उनके साथियों के साथ बना विश्वास है।

हैलेट अस्पताल में शुरू हुई दोस्ती आज भी कायम है।
संघर्ष बदल गए, जिम्मेदारियां बढ़ गईं, शहर बदल गए, लेकिन उद्देश्य वही रहा — फार्मासिस्टों को सम्मान दिलाना।

प्रदीप चौहान उन लोगों में हैं जो मंच पर कम और जमीन पर ज्यादा दिखाई देते हैं।
वे मानते हैं कि आंदोलन नारों से नहीं, बल्कि लगातार मेहनत और एकता से मजबूत होता है।

संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ

आज भी प्रदीप चौहान अपने साथियों के साथ फार्मासिस्टों की आवाज़ को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।

उनकी कहानी यह साबित करती है कि संघर्ष केवल बड़े नेताओं का नहीं होता। कई बार शांत और साधारण दिखने वाले लोग ही आंदोलन की असली ताकत बनते हैं।

कानपुर के हैलेट अस्पताल से शुरू हुआ उनका सफर आज उत्तराखंड तक पहुंच चुका है, लेकिन उनके भीतर का वही जुझारू छात्र आज भी जिंदा है — जो कभी अपने पेशे और अपने साथियों के सम्मान के लिए झुकना नहीं चाहता था।

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