ईद-उल-अज़हा का इंसानियत संदेश
कानपुर : ईद-उल-अज़हा, जिसे आम भाषा में बकरा ईद कहा जाता है, इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व इस्लामी कैलेंडर के ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है और तीन दिनों तक चलता है। कुर्बानी केवल जानवर तक सीमित नहीं है, बल्कि त्याग, इंसानियत, आज्ञाकारिता और जरूरतमंदों की मदद का संदेश देती है।
इस त्योहार की उत्पत्ति हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके पुत्र हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की महान कुर्बानी की याद में हुई है। क़ुरान में वर्णित है कि अल्लाह तक जानवर का मांस या खून नहीं पहुंचता, बल्कि इंसान की नीयत और परहेज़गारी मायने रखती है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, कुर्बानी का असली उद्देश्य दिखावे से परे अल्लाह की रज़ा अर्जित करना और जरूरतमंदों की सहायता करना है।
त्योहार के दौरान मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है, जिसमें एक हिस्सा गरीबों को दिया जाता है ताकि समाज के सभी वर्ग खुशियों में शामिल हो सकें। धार्मिक संगठनों ने शांति, साफ-सफाई और आपसी सौहार्द के साथ त्योहार मनाने की अपील की है। बाजारों में रौनक बढ़ी है और लोग कुर्बानी के साथ गरीबों की सहायता में भी सक्रिय हैं।