वाराणसी में 'दिशा' की बैठक में भड़के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, मीडियाकर्मियों को निकाला बाहर; कांग्रेस बोली 'क्या छुपा रही है सरकार?'
वाराणसी): देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सोमवार को प्रशासनिक और मीडिया हलकों में उस समय भारी हड़कंप मच गया, जब कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित जिला विकास समन्वय एवं अनुश्रवण समिति ('दिशा') की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक से मीडियाकर्मियों को अचानक बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी की अध्यक्षता में चल रही इस बैठक में हुए इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय पत्रकारों में भारी आक्रोश है, वहीं इस मुद्दे को लेकर अब सियासत भी पूरी तरह गरमा गई है।
शुरुआत में विजुअल बना रहे पत्रकारों पर भड़के मंत्री जीजानकारी के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी वाराणसी के दौरे पर थे, जहां उन्हें जिले में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करनी थी। बैठक की शुरुआत में जब मीडियाकर्मी हमेशा की तरह सामान्य प्रोटोकॉल के तहत फोटो और शुरुआती वीडियो (विजुअल) बना रहे थे, तभी केंद्रीय मंत्री अचानक भड़क गए।
उन्होंने पत्रकारों की मौजूदगी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कड़े लहजे में कहा, "अगर मैं यहां का डीएम होता तो..." और तुरंत प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी पत्रकारों को तत्काल प्रभाव से बैठक कक्ष से बाहर निकाला जाए। मंत्री के निर्देश के बाद अधिकारियों ने आनन-फानन में मीडियाकर्मियों को सभागार से बाहर कर दिया।
कांग्रेस ने घेरा, सोशल मीडिया पर पूछा 'आखिर छुपाना क्या है?' ने घेरा, सोशल मीडिया पर पूछा 'आखिर छुपाना क्या है?'
इस घटनाक्रम के तुरंत बाद मुख्य विपक्षी दल इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लपक लिया। कांग्रेस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट साझा करते हुए भाजपा सरकार और केंद्रीय मंत्री पर तीखा हमला बोला।
कांग्रेस ने अपने पोस्ट में लिखा:
"पत्रकार सिर्फ शुरुआती विजुअल ले रहे थे, जो वर्षों से एक सामान्य प्रशासनिक प्रोटोकॉल रहा है। लेकिन उन्हें इस तरह अपमानित करके बाहर निकालना भाजपा नेताओं की वीआईपी मानसिकता और मीडिया के प्रति उनकी झुंझलाहट को साफ दर्शाता है। आखिर दिशा कमेटी की बैठक में ऐसा क्या छिपाया जा रहा था, जिसे जनता के कैमरे से दूर रखने की जरूरत पड़ गई? बनारस का पत्रकार जनता की आवाज है, किसी बंद कमरे का बंधक नहीं जो इस दबाव से पीछे हट जाए।"पारदर्शिता पर उठे सवाल: बंद कमरे में कैसी समीक्षा?
इस घटना के बाद वाराणसी के स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी तीखी बहस छिड़ गई है। पत्रकारों का कहना है कि एक तरफ जहां भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और प्रधानमंत्री खुद मंचों से नेताओं को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया के साथ शालीनता और सम्मान से पेश आने की हिदायत देते हैं, वहीं दूसरी तरफ बनारस में केंद्रीय मंत्री का यह रवैया हैरान करने वाला है। जब बैठक जनता से जुड़ी विकास योजनाओं की प्रगति को लेकर थी, तो उसमें इतनी गोपनीयता क्यों बरती गई? जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उनके क्षेत्र के विकास कार्यों की हकीकत क्या है।
संयोग या सियासी टाइमिंग? एक ही दिन महंगाई पर प्रदर्शन और ये विवादनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि एक तरफ जहां देश और बनारस की जनता महंगाई की चौतरफा मार झेल रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के पेट्रोलियम मंत्री का बनारस आकर मीडिया के तीखे सवालों और कैमरों से इस तरह दूरी बनाना क्या संकेत देता है? बहरहाल, इस पूरे मामले पर जिला प्रशासन और भाजपा संगठन की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक सफाई सामने नहीं आई है।