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विदेश में ऐश, भारत में मां-बाप बेबस

माता-पिता की उपेक्षा पर पासपोर्ट रद्द करने की मांग, हर 6 माह संतुष्टि प्रमाण पत्र का प्रस्ताव

विशेष रिपोर्ट
✍️ सुमित पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” की परंपरा आज भी हमारे सामाजिक जीवन की आधारशिला है। लेकिन बदलते समय और बढ़ती वैश्विक प्रवृत्तियों के बीच एक चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है—कई लोग बेहतर भविष्य और सुख-सुविधाओं की तलाश में विदेश तो चले जाते हैं, परंतु अपने वृद्ध माता-पिता को भारत में अकेला और असहाय छोड़ देते हैं।

इसी संवेदनशील मुद्दे को उठाते हुए वरिष्ठ भाजपा नेता राधा मोहन दास अग्रवाल ने एक सख्त प्रस्ताव रखा है। उनका कहना है कि जो संतान अपने माता-पिता की देखभाल नहीं कर रही और उन्हें तड़पता छोड़कर विदेश में आनंद ले रही है, उनके विरुद्ध कठोर कदम उठाए जाने चाहिए—यहाँ तक कि ऐसे लोगों का पासपोर्ट रद्द करने पर भी विचार होना चाहिए।

हर 6 माह “संतुष्टि-प्रमाण पत्र” की मांग
अग्रवाल ने सुझाव दिया है कि विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिकों से प्रत्येक छह महीने में उनके माता-पिता का “संतुष्टि-प्रमाण पत्र” लिया जाए। इस प्रमाण पत्र के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सके कि माता-पिता को आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य देखभाल और भावनात्मक सहयोग मिल रहा है या नहीं।

यह प्रस्ताव न केवल प्रशासनिक बल्कि नैतिक दृष्टि से भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

बढ़ती सामाजिक समस्या

देश में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों की पीड़ा और पारिवारिक टूटन इस बात का संकेत हैं कि समस्या गंभीर होती जा रही है। कई मामलों में वृद्ध माता-पिता को न्यायालयों का सहारा लेना पड़ता है।
हालाँकि पहले से “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम” जैसे कानून मौजूद हैं, परंतु उनके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं

समर्थन और विरोध
इस प्रस्ताव के सामने आते ही समाज में बहस छिड़ गई है।

समर्थकों का कहना है कि यह कदम भारतीय पारिवारिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है।

वहीं विरोधियों का तर्क है कि पासपोर्ट रद्द करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कठोर प्रहार हो सकता है और इसके दुरुपयोग की आशंका भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नीति को लागू करने से पहले कानूनी, संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीर मंथन आवश्यक होगा।

समाज के लिए आत्मचिंतन का समय
यह मुद्दा केवल राजनीति या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना से जुड़ा हुआ है। प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक उन्नति की दौड़ में हम अपने मूल संस्कारों को पीछे छोड़ रहे हैं?

वृद्ध माता-पिता की सेवा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है।
सरकार चाहे जो नीति बनाए, परंतु अंततः समाज और परिवारों को स्वयं आत्ममंथन करना होगा कि आधुनिकता और संस्कारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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