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गीता सोरेन — जड़ों से जुड़ी, बदलाव की मशाल

गीता सोरेन — जड़ों से जुड़ी, बदलाव की मशाल

जमशेदपुर के आदिवासी समाज से निकली एक साधारण, कोमल स्वभाव वाली युवती गीता सोरेन ने जीवन की चुनौतियों को अपनी ताक़त बना लिया। बचपन से ही वे अपनी संस्कृति, परंपराओं और समुदाय से गहराई से जुड़ी रहीं। यही जुड़ाव उनके आत्मबल की नींव बना, और यही जड़ें आज उन्हें एक प्रेरणादायी नेता के रूप में खड़ा करती हैं।

शिक्षा प्राप्त करने के बाद गीता ने ठान लिया कि उनका सफ़र सिर्फ़ उनका अपना नहीं होगा—यह उन सभी आदिवासी बालिकाओं का भी होगा, जो सपने तो देखती हैं, लेकिन अवसरों की कमी से रुक जाती हैं। उनकी कोमलता के पीछे अटूट संकल्प छिपा था—अपने समुदाय की बेटियों को शिक्षित करना, उन्हें आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना।

गत दो वर्षों में, गीता सोरेन और उनकी टीम ने खूंटी और देवघर में माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के समक्ष अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से विशेष पहचान बनाई। इन्हीं सफल प्रस्तुतियों को ध्यान में रखते हुए, इस वर्ष उन्हें और उनकी टीम को विशेष रूप से राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया गया है, जहाँ वे 15 अगस्त के अवसर पर झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रदर्शन करेंगी। यह केवल एक मंचन नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और गौरव की गूंज है, जो पूरे देश में पहुँचेगी।

कलामंदिर संस्था से जुड़कर, गीता अपने विचारों और संकल्पों को नए आयाम तक पहुँचा रही हैं—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों पर गर्व करें और अपने सपनों को पंख दे सकें।

गीता सोरेन उस दीपक की तरह हैं, जो अपनी जड़ों से ऊर्जा लेकर अन्य आदिवासी बालिकाओं के रास्ते को रोशन कर रही हैं—कोमल हृदय, लेकिन अटूट साहस के साथ।

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