विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार
गया। जब पारा 45 डिग्री को पार करने की जिद पर अड़ा हो, तब बूंद-भर पानी की कीमत उस प्यासे परिवार से पूछिए जो घंटों सूखी टोंटियों को निहारता रहता है।
गया के जिला पदाधिकारी शशांक शुभंकर का पुलिस लाइन और सिंगरा स्थान जलापूर्ति केंद्र पर औचक धावा महज एक 'सरकारी दौरा' नहीं, बल्कि उन लापरवाह अधिकारियों के लिए 'वेक-अप कॉल' है, जो फाइलों में तो जलापूर्ति सुचारू दिखाते हैं, लेकिन धरातल पर वाल्व को जंग खाने के लिए छोड़ देते हैं।
सिस्टम की 'सुलिस' में फंसी जनता की प्यास,
यह विडंबना ही है कि एक तरफ सरकार करोड़ों की लागत से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करती है, वहीं दूसरी ओर बुडको के जिम्मेवार अभियंताओं की नाक के नीचे मुख्य सड़क पर वाल्व बंद पड़े रहते हैं।
एपी कॉलोनी से लेकर गवालबीघा तक की जनता पिछले चार दिनों से पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही थी, और विभाग सोया रहा।
डीएम की नाराजगी जायज है—वेतन रोकना और स्पष्टीकरण मांगना उन अधिकारियों के लिए कड़ा संदेश है जो जनता की बुनियादी जरूरतों को 'कैजुअल' लेते हैं।
समय प्रबंधन और तकनीकी गैप,
सिंगरा स्थान केंद्र का डेटा डराने वाला है।
8 घंटे की मेहनत (टंकी भरना) का फल सिर्फ 45 मिनट (डिस्चार्ज) में समाप्त हो जाता है।
ऐसे में एक मिनट की भी लापरवाही हजारों घरों को प्यासा रख सकती है।
प्रशासन ने सही पकड़ा है कि यहाँ 'निगरानी' ही एकमात्र समाधान है।
अंतिम छोर (Tail End) तक पानी पहुंचाना केवल पाइपलाइन का काम नहीं, बल्कि उस पर तैनात कर्मी की ईमानदारी का काम है।
आपदा प्रबंधन: अब कोताही बर्दाश्त नहीं
भीषण गर्मी के इस दौर में पानी की किल्लत किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है।
डीएम द्वारा 'आपदा प्रबंधन अधिनियम' के तहत कार्रवाई की चेतावनी देना यह साबित करता है कि अब पानी की चोरी या सप्लाई में बाधा डालना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा। 24 घंटे का अल्टीमेटम बुडको के लिए 'अग्निपरीक्षा' है।
हमारा नजरिया:
प्रशासनिक सख्ती स्वागत योग्य है, लेकिन गया जैसे शहर को केवल 'निरीक्षणों' के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
बुडको और नगर निगम को एक 'स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम' विकसित करना होगा ताकि वाल्व बंद होने या सप्लाई रुकने की जानकारी डीएम के पहुंचने से पहले मुख्यालय को मिल जाए। जनता को पानी चाहिए, बहाने नहीं।