चांडिल-कांड्रा मार्ग की बदहाली पर सौरभ प्रामाणिक का बड़ा प्रहार; कार्टून के जरिए दिखाया व्यवस्था का असली चेहरा
चांडिल-कांड्रा मार्ग: करोड़ों का 'भ्रष्टाचार स्मारक' और सत्ता की गहरी नींद; कलाकार सौरभ की कूची ने फूंका आंदोलन का बिगुल
सड़क की धूल में दफन हुआ विकास, अब सौरभ प्रामाणिक की कला बनी चांडिल के आंदोलन की मशाल
चांडिल: चांडिल-कांड्रा मुख्य मार्ग अब केवल एक जर्जर रास्ता नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनहीनता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का जीवंत स्मारक बन चुका है। 9.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि फाइलों में खर्च दिखाए जाने के बावजूद, जमीन पर हकीकत के नाम पर केवल जानलेवा गड्ढे और बीमारियाँ बांटती धूल बची है। जनता द्वारा प्रशासन को दिया गया 7 दिनों का अल्टीमेटम समाप्त हो गया है, जिसने अब एक उग्र जन-आंदोलन का रूप अख्तियार कर लिया है।
इस संघर्ष के बीच, क्षेत्र के चर्चित युवा कलाकार सौरभ प्रामाणिक का नया कार्टून आर्ट व्यवस्था की विफलता को आईना दिखा रहा है। सौरभ के इस कार्टून आर्टवर्क में एक ओर हाथ में मशाल थामे आक्रोशित जनता अपने हक के लिए खड़ी है, तो दूसरी ओर आलीशान कुर्सियों पर आँखों पर पट्टी बाँधकर 'निद्रा में' डूबे सत्ताधारियों और अधिकारी को दिखाए गया हैं। चित्र के केंद्र में खड़ा कैलेंडर इस बात का कड़ा प्रतीक है कि अन्याय सहने की समय सीमा अब समाप्त हो चुकी है और धैर्य का बांध टूट गया है।
गौरतलब है कि चैनपुर निवासी कलाकार सौरभ प्रामाणिक की सक्रियता केवल इसी मुद्दे तक सीमित नहीं है। वे निरंतर सामाजिक ज्वलंत मुद्दों पर अपनी कूची चलाते रहे हैं। जागरूकता वाले पोस्टरों और व्यंग्यात्मक कार्टूनों के माध्यम से वे अक्सर जनता को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करते हैं। चाहे स्थानीय बुनियादी ढांचा हो या सामाजिक कुरीतियाँ, सौरभ की कला हमेशा एक 'सुरक्षा कवच' की तरह आम आदमी की आवाज़ बनकर उभरी है। उनकी यह 'कलात्मक स्ट्राइक' अब चांडिल के हर नागरिक की सामूहिक पुकार बन चुकी है।
क्षेत्र की जनता और आंदोलनकारियों का संदेश अब पूरी तरह स्पष्ट है—शांतिपूर्ण प्रतीक्षा और संवाद का समय अब बीत चुका है। सौरभ के कार्टून की पृष्ठभूमि में दिखती टूटी सड़कें और धूल के गुबार उस कड़वी सच्चाई को बयां कर रहे हैं, जिसे सत्ता अपनी बंद आँखों से देखने को तैयार नहीं है। यह मार्मिक कलाकृति हमें याद दिलाती है कि जब शब्द बेअसर हो जाते हैं और गुहार अनसुनी कर दी जाती है, तब कला को ही व्यवस्था के बहरे कानों तक जनता की गूँज पहुँचाने के लिए मशाल बनकर आगे आना पड़ता है। अब देखना यह है कि इस 'कलात्मक प्रहार' के बाद क्या जिम्मेदार अपनी नींद त्यागते हैं या जनता को इसी नारकीय स्थिति में रहने को मजबूर किया जाएगा।