क्या गरीब बच्चों की शिक्षा से सरकार को कुछ लेना देना नही
बिहारशरीफ(नालन्दा)। एक बहुत बड़ा सवाल है, कि आखिर क्यों सरकारी विद्यालयों की स्तिथि दिन-प्रतिदिन इतनी खराब होते जा रही है? सही में इसके जिम्मेदार कौन है? या फिर एक भ्रम है स्तिथि में सुधार हुआ है? या फिर अभी भी अच्छी है? केवल एक प्रोपेगेंडा है?
या फिर सबसे बड़ा सवाल सरकार को गरीब बच्चों से ,गरीब जनता से कोई लेना देना नही है?
ऊपर जितने भी सवाल है सही में इसका समाधान होना अतिआवश्यक है,क्योंकि बजट का बहुत बड़ा हिस्सा प्रत्येक वर्ष शिक्षा में खर्च होता है। वैसे में यदि परिणाम सही न मिले तो राज्य का विकास नही विनाश होना तय माना जायेगा। बिहार एक ऐसा राज्य है ,जहाँ के बच्चें पूरी दुनियॉ में अपने नाम का डंका बजा चुके है। आज के समय भी बिहार के बच्चे का टैलेंट अन्य राज्य की तुलना में अधिक माना जाता है। यदि ये कहे कि बिहार की मिट्टी में ही वो खासियत है,जो पूरी दुनियां में वैसे बच्चे को जन्म देती है जिसकी विद्वत्ता के आगे पूरी दुनियां घुटने टेक देती है,तो गलत नही होगा। फिर ऐसा क्यों कि बिहार की उन्नति, प्रगति खासकर शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। ज्ञान का प्रतीक बिहार में शिक्षा पीछे कैसे जा रहा है। आरटीई एक्ट- 2009 जब लागू किया गया तो सबसे बेहतरीन तरीके से इसे लागू करने वालों राज्यो में बिहार सबसे आगे था। 1 किलोमीटर में प्राथमिक और प्रत्येक 3 किलोमीटर में मध्य विद्यालय आज भी पूरे भारत में केवल बिहार में ही सबसे ज्यादा है। शिक्षकों को प्रशिक्षण देने की बात या फिर समय-समय पर केंद्रीय योजना के तहत देश के अन्य जगहों में जाकर कार्य करना या प्रशिक्षण बिहार का नाम जरूर आता है। इतना कुछ होने के बाद भी पिछड़ना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। जबतक सही नस को नही पकड़ेंगे ईलाज सम्भव नही है। आज मैं एक तरफा बात शिक्षकों का करूँगा क्योंकि आये दिन केवल शिक्षकों पर ही उँगली उठायी जाती है। क्या सही में केवल शिक्षक ही दोषी है। गौर कीजियेगा मैंने "केवल" शब्द का प्रयोग किया है। बात आजादी से अब तक का करते है। शिक्षकों की बहाली समय के अनुरूप होता रहा है। सरकार को उस समय अपने ब्यूरोक्रेट के सलाह के अनुसार एक नियमावली बनाकर शिक्षकों की बहाली की। उस समय साक्षर लोगों की संख्या बहुत कम थी,लेकिन जिन्होंने थोड़ा बहुत भी पढ़ाई किया उसमें गुणवत्ता की कोई कमी नही होती थी। वर्ग 1 की भी पढ़ाई कर चुके लोग किताब को अच्छी तरह से पढ़ सकते है। अंग्रेजी की पढ़ाई वर्ग -6 से होता था,इसके वाबजूद अच्छे से न केवल अंग्रेजी पढ़ सकने वाले लोग होते थे,बल्कि बहुत अच्छे से अंग्रेजी बोल सकते थे। वर्ग-5 की गणित आज की वर्ग 8-9 की पुस्तकों से भी बेहतर हुआ करती थी। पता नही किसने कटिंग शुरू किया और पूरा पाठ्यक्रम को ही छोटा कर दिया। बुनियादी विद्यालय होती थी,जहाँ रोजगार परख शिक्षा दी जाती थी। आज बुनियादी शिक्षा ही गायब है,और दोष शिक्षकों को दी जाती है। शिक्षक जिसे ब्रह्मा की दर्जा दी गयी है,लेकिन सबसे ज्यादा अपमानित,कुंठित और चिन्तित इनसे ज्यादा कोई नही। तुलना प्राइवेट स्कूलों से की जाती है। जहाँ बच्चों का होम वर्क माता -पिता करते है। बच्चों को स्कूल बस या फिर पिता अपने लक्ज़री गाड़ियों से बच्चों को पहुँचाने और लाने जाते है। घरों में ट्यूशन पढ़ाई जाती है। और हमलोग कहते है कि सरकारी स्कूल के बच्चों का विकास ही नही हो रहा है। सरकार शिक्षकों के प्रति सजग है? ये भी सवाल "हाँ कहे या न " । वर्ष 2003 में शिक्षा मित्र के नाम पर शिक्षकों की बहाली की गई। जनता का कहना था "सर्टिफिकेट दिखाओं नौकरी पाव" की नीति थी। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि क्या सर्टिफिकेट किराने की दुकान में मिलती थी? जहाँ से लेकर सरकार को दिखाया गया। 2003 के पहले मैट्रिक की परीक्षा वर्ग-9 और वर्ग-10 की किताबें से होती थी। उस समय केवल तृतीय श्रेणी से भी पास होना बहुत बड़ी होती थी,जो प्रथम श्रेणी के थे उनकी तुलना के काबिल आज कोई है ही नही। तृतीय श्रेणी वाले आज के 80% से ऊपर लाने वाले से भी बेहतर थे,तो फिर इनके ऊपर उँगली क्यो उठती है। इनकी योग्यता पर सवाल क्यों उठता है? मैं पूर्ण दावे के साथ कह सकता हूँ, जब इनलोगो मैट्रिक की परीक्षा दी थी आप इनके आगे शून्य होंगे,लेकिन सिस्टम इतनी बेरुखी हो गयी कि धीरे-धीरे समय के साथ सारा चीज मिटता चला गया। समय के साथ इन्हें अपडेट नही किया गया और अपडेशन का सिस्टम आया बहुत देर हो चुकी थी। सबसे बड़ी बात एक जगह दो अलग-अलग लोगों का होना जिनके बीच खाई बनी हुई थी। परिवार की चिंता क्योंकि इतने कम मानदेय परिवार तो क्या अपना पेट भरना मुश्किल है,तो फिर ये लोग शेष बचे समय में पढ़ाई करेंगे या फिर अपने बच्चों और परिवार के लिए कुछ काम करेंगे,ताकि भरण-पोषण अच्छे से हो सके। अमेरिका द्वारा बिहार का एक सर्वे किया गया था,जिसमें शिक्षा मित्र द्वारा शिक्षा में सुधार किया गया है। ये बात अमेरिकी शिक्षाविदों द्वारा बोला गया था। शिक्षकों की अजीब विडम्बना होती चली आ गई। महँगाई बढ़ती गयी वेतन घटती रही लेकिन तुलना करना कम नही हुआ। टेट शिक्षक आये लड़ाई सरकार की जगह आपस मे हो गयी। बिहार लोक सेवा से शिक्षकों की बहाली हुई पूरा शिक्षक समाज ऐसा बिखर गया जिसे जोड़ने के लिए अब धरती में किसी को अवतरित होना पड़ेगा। खाई इतनी बढ़ गयी है जिसे पाटना शायद ही सम्भव है। ऐसे में शिक्षा में सुधार की अपेक्षा करना पत्थर को पीसकर तेल निकालने के बराबर है। सरकार जबतक शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षकों को दोषी ठहराएगी शिक्षा में कोई सुधार नही हो सकता है। सरकार को अपनी जिम्मेवारी न केवल समझनी होगी बल्कि बिहार का भविष्य सही में सुधारना चाहती है तो सबसे पहले इस खाई को भरना होगा। सभी प्रकार के शिक्षकों को एक संवर्ग के शिक्षकों में बदलना होगा । नियोजित,नियमित,विद्यालय अध्यापक ,विशिष्ट इत्यादि सभी को एक संवर्ग में विलय कर सभी बराबर करना होगा । सोचिये आज के समय 2003 मे बहाल शिक्षकों की सेवा 23 वर्ष हो चुकी है। वे अब रिटायर हो रहे है। इतनी लंबी सेवा के बाद उन्हें क्या मिल रहा है। सोचकर ही रूह काँप जाती है। क्या सरकार इतना पत्थर हो गयी है कि अपने जनता के बारे में सोच नही सकती। भारत आजाद हुआ लाखों लोग शहीद हुए आजादी के पहले से चलती आ रही पेंशन आज खत्म हो चुका है। इससे आगे कुछ लिखने का शब्द ही नही मिल रहा है। चिंतन जरूरी है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है। फैसला जनता द्वारा चुनी गई सरकार को करना है। बौद्ध की धरती,ज्ञान की धरती कहे जाने वाले राज्य से पशु बनाना है या फिर आर्यभट्ट।
मिथिलेश कुमार
प्रधान शिक्षक
नालंदा