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Anjani mishra
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Bada Ganesh Ji : त्रिनेत्र धारी हैं इस मंदिर में व‍िराजमान गणेशजी, दर्शन से रोग ही नहीं हर कष्ट होता है दूर
Bada Ganesh Ji temple of Varanasi: भगवान शिव की नगरी में उनके पुत्र गणपति जी का एक मंदिर ऐसा हैं जहां वह स्वयं भी त्रिनेत्रधारी हैं। बड़ा गणेश के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है।बातेंइस मंदिर में स्वयंभू है भगवान की प्रतिमा40 खंभों पर बना है यह सुप्रसिद्ध मंदिरविघ्नहर्ता के यहां दर्शन से दूर होते हैं कष्ट

काशी यानी वाराणसी में भगवान गणपति का विशेष और प्रमुख मंदिर है बड़ा गणेश। यहां इन्हें वक्रतुण्ड के नाम से भी जाना जाता है। यहां गणपति जी की प्रतिमा स्वयंभू हैं और उनके दो नहीं अपने पिता शिवजी के तरह तीन नेत्र हैं। सिंदूरी रंग गणेश प्रतिमा के दर्शन करने मात्र से मनुष्य के बहुत से कष्ट दूर हो जाते हैं। माना जाता है कि बड़ा गणेश भगवान के दर्शन-पूजन से सारे ही रुके हुए कार्य पूरे हो जाते हैं और तरक्की की राह आसान हो जाती है। गणपति जी यहां अपनी पत्नी रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ के साथ यहां विराजमान है। इस मंदिर में देवी मन्सा, संतोषी मां और हनुमान जी भी मौजूद हैं। वहीं गर्भगृह में गणपति जी तो गर्भगृह के बाहर उनकी सवारी मूषकराज विराजमान हैं।
यह मंदिर वाराणसी के लोहटिया में स्थित है। यहां गणेशजी की स्वयंभू प्रतिमा है और यहां बंद कपाट में भगवान की खास पूजा होती है। इसे देखने की किसी को अनुमति नहीं होती है। मंदिर का इतिहास दो हजार साल पुराना बताया जाता है। खास बात ये है कि ये मंदिर 40 खंभों पर टिका है और मंदिर में 40 खंभे होना बहुत ही शुभ माना जाता है। मीनाकारी और पत्थरों को तराश कर इस मंदिर को बनाया गया है। यहां गणपति जी चांदी के छत्र के नीचे विराजमान हैं। मान्यता है की एक जमाने में बाबा विश्वनाथ के करीब से होते हुए गंगा प्रवाहित होती थी। ढुंढीराज गणेश जो विश्वनाथ द्वार पर हैं और उनके स्वरुप की भी यहां पूजा होती है।

मंदिर का इतिहास 2000 साल पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि उस समय काशी में गंगा के साथ मंदाकिनी का अस्तित्व था। उसी समय भगवान गणपति की ये प्राकृतिक प्रतिमा नदी से निकली थी। इसे अपने मूल रूप में आज भी मंदिर में देखा जा सकता है। साढे 5 फुट बड़ी इस प्रतिमा है गणपति जी के तीन नेत्र हैं। गणपति जी यहां अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान है और गणपति जी के त्रिनेत्र होने के कारण इस मंदिर का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्त की झोली गणपति जी जरूर भरते हैं।गणपति जी कि यहां पूजा जब भी करें उनका पंचामृत से स्नान जरूर करें। इसके बाद दूर्वा और लड्डू का भोग लगाएं। यदि आप बड़ा गणेश से कोई मनोकामना पूरी कराना चाहते हैं तो बुधवार के दिन यहां आकर उनकी विधिवत पूजन करें और उसके बाद उनसे अपनी कामना कहें। साथ ही यह भी वचन दे कर जाएंग कि यदि उनकी कामना पूरी हुई तो वह फिर से विधिवत पूजन कर उनका आशीर्वाद लेने आएंगे।
                                   अंजनी मिश्रा

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गणेश चतुर्थी की पौराणिक एवं प्रचलित कथाएं : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगा अपार सुख

श्री गणेशाय नम:'
 
संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके मांगलिक कार्य संपन्न होते है तथा भगवान श्री गणेश असीम सुखों की प्राप्ति कराते हैं। माह की किसी भी चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ना अथवा सुनना जरूरी होता है। इससे संबंधित चार कथाएं प्रचलित हैं। 
पहली कथा :- 
 
पौराणिक एवं प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। 
इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा।
 
भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा।
 
तब गणेश ने कहा - 'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।' यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी। पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी।
 
गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा :-
 
एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आंवा में डाल दिया।
 
उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेशजी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की।
 
 
दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो आंवा में उसके बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बच्चे का बाल बांका भी नहीं हुआ था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई।
 
इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए संकट चौथ का व्रत करने लगीं। 
                                    अंजनी मिश्रा

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महाराणा प्रताप, पुण्यतिथि आज


महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। वह अकेले राजपूत राजा थे...
महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। वह अकेले राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका जन्म आज ही के दिन यानी 9 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था। आइये आज उनसे जुड़ीं खास बातें जानते हैं..
जीवन परिचय
उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह था और माता महारानी जयवंता बाई थीं। अपने परिवार की वह सबसे बड़ी संतान थे। उनके बचपन का नाम कीका था। बचपन से ही महाराणा प्रताप बहादुर और दृढ़ निश्चयी थे। सामान्य शिक्षा से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी। उनको धन-दौलत की नहीं बल्कि मान-सम्मान की ज्यादा परवाह थी। उनके बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, 'इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है। धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे। प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया। हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा'

राज्याभिषेक
महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह अपनी मृत्यु से पहले बेटे जगमल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था जो उनकी सबसे छोटी पत्नी से थे। वह प्रताप सिंह से छोटे थे। जब पिता ने छोटे भाई को राजा बना दिया तो अपने छोटे भाई के लिए प्रताप सिंह मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे लेकिन सरदारों के आग्रह पर रुक गए। मेवाड़ के सभी सरदार राजा उदय सिंह के फैसले से सहमत नहीं थे। सरदार और आम लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रताप सिंह मेवाड़ का शासन संभालने के लिए तैयार हो गए। 1 मार्च, 1573 को वह सिंहासन पर बैठे।
अकबर से टकराव और हल्दीघाटी का युद्ध
महाराणा प्रताप के समय दिल्ली पर मुगल शासक अकबर का राज था। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुगल बादशाह की गुलामी पसंद नहीं थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि मानसिंह के भड़काने से अकबर ने खुद मानसिंह और सलीम (जहांगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।अकबर ने मेवाड़ को पूरी तरह से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच युद्ध हुआ। इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है। 'हल्दीघाटी का युद्ध' भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे।

महाराणा प्रताप और चेतक
भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कहा जाता है कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था। कुछ लोकगीतों के अलावा हिन्दी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता 'चेतक की वीरता' में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है। हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

कभी नहीं झुके महाराणा
अकबर इस बीच बिहार बंगाल और गुजरात में विद्रोह दबाने में लगा था जिससे मेवाड़ पर मुगलों का दबाव कम हो गया. दिवेर की लड़ाई के बाद महाराणा प्रताप ने उदयपुर समेत 36 अहम जगहों पर अपना अधिकार कर लिया और राणा का मेवाड़ के उसी हिस्से पर कब्जा हो गया जब उनके सिंहासन पर विराजने के समय था. इसके बाद महाराणा ने मेवाड़ के उत्थान के लिए काम किया, लेकिन 11 साल बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावण्ड में उनकी मृत्यु हो गई. 
                                   अंजनी मिश्रा

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  पंडित बिरजू महाराज 

पंडित बृजमोहन मिश्र (जिन्हें बिरजू महाराज भी कहा जाता है)(४ फ़रवरी १९३८ - १६ जनवरी २०२२) प्रसिद्ध भारतीय कथक नर्तक थे। वे शास्त्रीय कथक नृत्य के लखनऊ कालिका-बिन्दादिन घराने के अग्रणी नर्तक थे।पंडित जी कथक नर्तकों के महाराज परिवार के वंशज थे जिसमें अन्य प्रमुख विभूतियों में इनके दो चाचा व ताऊ, शंभु महाराज एवं लच्छू महाराज; तथा इनके स्वयं के पिता एवं गुरु अच्छन महाराज भी आते हैं। हालांकि इनका प्रथम जुड़ाव नृत्य से ही है, फिर भी इनकी पर भी अच्छी पकड़ थी, तथा ये एक अच्छे शास्त्रीय गायक भी थे।[2] इन्होंने कत्थक नृत्य में नये आयाम नृत्य-नाटिकाओं को जोड़कर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।[3] इन्होंने कत्थक हेतु '''कलाश्रम''' की स्थापना भी की है। इसके अलावा इन्होंने विश्व पर्यन्त भ्रमण कर सहस्रों नृत्य कार्यक्रम करने के साथ-साथ कत्थक शिक्षार्थियों हेतु सैंकड़ों कार्यशालाएं भी आयोजित की।

अपने चाचा, शम्भू महाराज के साथ नई दिल्ली स्थित भारतीय कला केन्द्र, जिसे बाद में कत्थक केन्द्र कहा जाने लगा; उसमें काम करने के बाद इस केन्द्र के अध्यक्ष पर भी कई वर्षों तक आसीन रहे। तत्पश्चात १९९८ में वहां से सेवानिवृत्त होने पर अपना नृत्य विद्यालय कलाश्रम भी दिल्ली में ही खोला।
बिरजू महाराज का जन्म कत्थक नृत्य के लिये प्रसिद्ध जगन्नाथ महाराज के घर हुआ था, जिन्हें लखनऊ घराने के अच्छन महाराज कहा जाता था। ये रायगढ़ रजवाड़े में दरबारी नर्तक हुआ करते थे।[5] इनका नाम पहले दुखहरण रखा गया था, क्योंकि ये जिस अस्पताल पैदा हुए थे, उस दिन वहाँ उनके अलावा बाकी सब कन्याओं का ही जन्म हुआ था, जिस कारण उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया। यही नाम आगे चलकर बिगड़ कर 'बिरजू' और उससे 'बिरजू महाराज' हो गया।

इनको उनके चाचाओ लच्छू महाराज एवं शंभु महाराज से प्रशिक्षण मिला, तथा अपने जीवन का प्रथम गायन इन्होंने सात वर्ष की आयु में दिया। २० मई, १९४७ को जब ये मात्र ९ वर्ष के ही थे, इनके पिता का स्वर्गवास हो गया।[ परिश्रम के कुछ वर्षोपरान्त इनका परिवार दिल्ली में रहने लगा।
बिरजू महाराज ने मात्र १३ वर्ष की आयु में ही नई दिल्ली के संगीत भारती में नृत्य की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। उसके बाद उन्होंने दिल्ली में ही भारतीय कला केन्द्र में सिखाना आरम्भ किया। कुछ समय बाद इन्होंने कत्थक केन्द्र (संगीत नाटक अकादमी की एक इकाई) में शिक्षण कार्य आरम्भ किया। यहां ये संकाय के अध्यक्ष थे तथा निदेशक भी रहे। तत्पश्चात १९९८] में इन्होंने वहीं से सेवानिवृत्ति पायी। इसके बाद कलाश्रम नाम से दिल्ली में ही एक नाट्य विद्यालय खोला।

इन्होंने सत्यजीत राय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी की संगीत रचना की, तथा उसके दो गानों पर नृत्य के लिये गायन भी किया। इसके अलावा वर्ष २००२ में बनी हिन्दी फ़िल्म देवदास में एक गाने काहे छेड़ छेड़ मोहे का नृत्य संयोजन भी किया। इसके अलावा अन्य कई हिन्दी फ़िल्मों जैसे डेढ़ इश्किया, उमराव जान तथा संजय लीला भन्साली निर्देशित बाजी राव मस्तानी में भी कत्थक नृत्य के संयोजन किये।
बिरजू महाराज को अपने क्षेत्र में आरम्भ से ही काफ़ी प्रशंसा एवं सम्मान मिले, जिनमें १९८६ में पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा कालिदास सम्मान प्रमुख हैं। इनके साथ ही इन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं खैरागढ़ विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि मानद मिली।

२०१६ में हिन्दी फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में "मोहे रंग दो लाल " गाने पर नृत्य-निर्देशन के लिये फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
२००२ में लता मंगेश्कर पुरस्कार।
भरत मुनि सम्मान 
२०१२ मे सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन हेतु राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: फिल्म विश्वरूपम के लिये।
                               अंजनी मिश्रा

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15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है सेना दिवस? क्या आप जानते हैं इसका इतिहास

भारत के लोगों की रक्षा के लिए तत्पर रहने वाली भारतीय सेना हर परिस्थिति में देश की सेवा करने को तैयार रहती है.
15 जनवरी की तारीख ही क्यों?
15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल Francis Butcher से फील्ड मार्शल KM करिअप्पा के हाथ में आ गई थी. इसी के साथ ब्रिटिश इंडियन आर्मी से ब्रिटिश शब्द हमेशा के लिए हट गया था और उसे इंडियन आर्मी कहा जाने लगा था. फील्ड मार्शल KM करियप्पा आजाद भारत के पहले आर्मी चीफ बने थे. तब से लेकर आज तक हर वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 
भारतीय सेना को आजादी से पहले तक ब्रिटिश इंडियन आर्मी के तौर पर जाना जाता था. लेकिन 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना को अपना पहला भारतीय कमांडर इन चीफ मिला था.
गोलाबारूद-हथियारों के मामले में भारतीय सेना दुनिया में चौथे स्थाना पर आती है. भारतीय सेना के पास सटीक अग्नि और पृथ्वी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो इसे ताकतवर बनाती है. 
पूरे विश्व में भारतीय सेना एक मात्र ऐसी सेना है जो सिर्फ अपने दुश्मनों के हमले का जवाब देती है. भारतीय सेना के नाम कभी भी किसी देश पर पहले हमला न करने या उसे कब्जा करने का कोई भी रिकॉर्ड नहीं है.
भारतीय सेनासर्व-स्वयंसेवी बल है और इसमें देश के सक्रिय रक्षा कर्मियों का 80% से अधिक हिस्सा है. भारतीय सेना दुनिया की एकमात्र ऐसी सेना है, जिसके पास 12 से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं. इतना ही नहीं 9 लाख से ज्यादा रिसर्व फोर्स है. 
भारतीय सेना जितनी देश की जनता की रक्षा करने के लिए तत्पर रहती हैं, उताना ही दुनिया इसका लोहा मानती है. भारतीय सेना के नाम दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर पुल बनाने का रिकॉर्ड भी दर्ज है. हिमालय की चोटी पर 18 हजार 379 फीट की ऊंचाई पर सेना द्वारा निर्मित इस पुल का नाम बेली ब्रिज है.   
आर्मी डे पर पूरा देश थल सेना के अदम्य साहस, उनकी वीरता, शौर्य और उसकी कुर्बानी को याद करता है। 
                                         अंजनी मिश्रा

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मकर संक्रान्ति पर्व की महत्ता

मकर संक्रांन्ति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें और पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है क्योंकि इसी दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिए इस पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। यह भारतवर्ष तथा नेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है।
यूपी में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है। उत्तर प्रदेश में 14 जनवरी से ही हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। ऐसा विश्वास है कि 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आख़िरी स्नान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परम्परा है। बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है।
मकर संक्रान्ति के साथ अनेक पौराणिक तथ्य जुड़े हुए हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था। इसके अतिरिक्त देवताओं के दिनों की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्री व उतरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है। महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था।
मकर संक्रान्ति के दिन दान करने का महत्व अन्य दिनों की तुलना में बढ जाता है। इस दिन व्यक्ति को यथासंभव किसी गरीब को अन्नदान, तिल व गुड का दान करना चाहिए। तिल या फिर तिल से बने लड्डू या फिर तिल के अन्य खाद्ध पदार्थ भी दान करना शुभ रहता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार कोई भी धर्म कार्य तभी फल देता है, जब वह पूर्ण आस्था व विश्वास के साथ किया जाता है। जितना सहजता से दान कर सकते हैं, उतना दान अवश्य करना चाहिए।                                             अंजनी मिश्रा

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*विप्र महा फाउंडेशन भारत के पटल पर बोले प्रोफेसर आशुतोष द्विवेदी युवाओं में कौशल विकास की आवश्यकता है ताकि भ्रमित ना हो सही दिशा में समृद्ध हो*


विप्र महा फाउंडेशन भारत ने  राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर वेबिनार का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता महिला प्रकोष्ठ के *अध्यक्ष प्रोफ़ेसर माधुरी शर्मा जी ने किया* उन्होंने कहां हर भारतीय प्रेरणा स्रोत युग परिवर्तन स्वामी विवेकानंद जी ने पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से पल्लवित किया की कार्यक्रम का मुख्य वक्ता के रूप में अर्नी विश्वविद्यालय के संकाय प्रमुख *प्रोफेसर आशुतोष द्विवेदी* ने कहा कि आज के वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की विकास और प्रतिक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए युवाओं को उचित शिक्षा और कौशल विकास की आवश्यकता है ताकि वह भ्रमित ना हो सही दिशा में समृद्ध हो सके युवा  बेरोजगारी एवं रोजगार विषयों पर भी वक्तव्य रखा *राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेश त्रिपाठी ने कहा* कि आज के वर्तमान परिदृश्य में युवाओं का भारत में 65 पर्सेंट आबादी युवाओं का है और युवाओं के कंधे पर ये भारत का विकास का है तो युवा निराश ना हो युवा विकास की ओर अग्रसर रहे युवाओं वाला भारत विश्व में विकास की नई पटल पर भारत बनेगा *राष्ट्रीय प्रभारी अमित कुमार तिवारी ने कहा* वर्तमान परिवेश में युवा वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है भारत देश को रीड का हड्डी युवाओं को कहा जाता है
 *देश की तरक्की का युवा होते हैं  प्रमुख*आधार प्रबल कंधों पर होता है इनके राष्ट्र निर्माण का भार*
*राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष डा विजय आचार्य जी*  आज के परिवेश में युवाओं की भूमिका पर अनेक अपने विचार व्यक्त किए *राष्ट्रीय यूवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष* नेडा.विकास दि्वेदी ने राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए *अंशु कुमार मिश्र राष्ट्रीय संगठन सचिव ने* भी युवा दिवस के अवसर पर युवाओं को शुभकामनाएं दी और समाज को संगठित करते हुए युवाओं को आगे आने के लिए अपील की *बिहार प्रदेश अध्यक्ष अशोक झा* ने भी युवाओं और भाषा संस्कृति पर जोर दिया *युवा प्रकोष्ठ एवं उपाध्यक्ष सत्य प्रकाश तिवारी ने कहा* विवेकानंद जी ने कहां था की यह  अविद्या के कारण है कि हमें आत्मा ससीम प्रतीत होता है अविद्या के नष्ट हो जाने पर आत्मा जो नितांत अभेद है स्वस्वरूप को अपने आप प्रकट कर देता है यह उसी प्रकार है जैसे बादलों के छट जाने से सूर्य स्वतःप्रकाशित हो जाता है
 इस अवसर पर विहार उपाध्यक्ष विजय तिवारी राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बिहारी दुबे, गुजरात प्रदेश अध्यक्ष गंगासागर तिवारी संजय जोशी राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ उपाध्यक्ष श्रीमती रिचा तिवारी राष्ट्रीय महामंत्री राजू चौबे सौरव पांडे अमित मिश्रा सदाशिव तिवारी अन्य गणमान्य उपस्थित रहे*

  

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पुत्रदा एकादशी 
हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा है। उसके सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

एक बार की बात है, श्री युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? व्रत करने की विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। मधुसूदन कहने लगे कि इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। अब आप शांतिपूर्वक इसकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल मिलता है।

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।

वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ‍ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है?

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे। एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।

सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो।

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।

उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।

यह वार्ता सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।
लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी। लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया।

इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।
इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।
                                            अंजनी मिश्रा 

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विवेकानंद जयंती विशेष : एक युग, जिसका अंत कभी हुआ ही नहीं, युवाओं के प्रेरणास्‍त्रोत


उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए' का संदेश देने वाले युवाओं के प्रेरणास्त्रो‍त, समाज सुधारक युवा युग-पुरुष 'स्वामी विवेकानंद' का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में हुआ। इनके जन्मदिन को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद जी आधुनिक भारत के एक महान चिंतक, दार्शनिक, युवा संन्यासी, युवाओं के प्रेरणास्त्रोत और एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी थे। विवेकानंद दो शब्दों द्वारा बना है। विवेक+आनंद। विवेक संस्कृत मूल का शब्द है। विवेक का अर्थ होता है बुद्धि और आनंद का शब्दिक अर्थ होता है- खुशियां

उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रमुख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, अलौकिक विचार और उनके आदर्श हैं, जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। उनके ये विचार और आदर्श युवाओं में नई शक्ति और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। उनके लिए प्रेरणा का एक उम्दा स्त्रोत साबित हो सकते हैं।

जब भी कभी भारतीय संस्कृति या हिंदू धर्म का मुद्दा उठता है अथवा इस पर विचार-विमर्श किया जाता है तो स्वामी विवेकानंद के विचारों का स्मरण ज़रूर किया जाता है। आज तक उनके चरित्र, उनके विचारों, उनके आदर्शों के विषय में जितना भी पढ़ पाया हूँ, उसे एक लेख में समेट देने का अर्थ होगा रत्नाकर को दरिया के समान पेश कर देना। आज यहाँ उनके एवं उनके ऐतिहासिक कार्यों की चर्चा करने से पहले उनकी जन्म तारीख, जन्म स्थान आदि का विवरण पेश करना मैं ज़रूरी नहीं समझता, क्योंकि आज आवश्यकता है उनके आदर्शों को अपनाने की, ना की उनसे जुड़े कुछ तथ्यों को रट लेने की।

सन् 1897 में मद्रास में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था 'जगत में बड़ी-बड़ी विजयी जातियां हो चुकी हैं। हम भी महान विजेता रह चुके हैं। हमारी विजय की गाथा को महान सम्राट अशोक ने धर्म और आध्यात्मिकता की ही विजयगाथा बताया है और अब समय आ गया है कि भारत फिर से विश्व पर विजय प्राप्त करे। यही मेरे जीवन का स्वप्न है और मैं चाहता हूं कि तुम में से प्रत्येक, जो कि मेरी बातें सुन रहा है, अपने-अपने मन में उसका पोषण करे और कार्यरूप में परिणित किए बिना न छोड़ें।
युवाओं के लिए उनका कहना था कि पहले अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाओ, मैदान में जाकर खेलो, कसरत करो ताकि स्वस्थ-पुष्ट शरीर से धर्म-अध्यात्म ग्रंथों में बताए आदर्शो में आचरण कर सको. आज जरूरत है ताकत और आत्म विश्वास की, आप में होनी चाहिए फौलादी शक्ति और अदम्य मनोबल।
अपने जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद ने न केवल पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया, बल्कि लाखों लोगों से मिले और उनका दुख-दर्द भी बांटा। इसी क्रम में हिमालय के अलावा, वे सुदूर दक्षिणवर्ती राज्यों में भी गए, जहां उनकी मुलाकात गरीब और अशिक्षित लोगों से भी हुई, साथ ही साथ धर्म संबंधित कई विद्रूपताएं भी उनके सामने आईं। इसके आधार पर ही उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि जब तक देश की रीढ़ 'युवा' अशिक्षित रहेंगे, तब तक आजादी मिलना और गरीबी हटाना कठिन होगा, इसलिए उन्होंने अपनी ओजपूर्ण वाणी से सोए हुए युवकों को जगाने का काम शुरू कर दिया।

विवेकानंद नहीं नरेंद्रनीथ था बचपन का नाम, कैसे बन गए स्वामी विवेकानंद, जानें ये रोचक बातें
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था. लेकिन उनका नाम बचपन से विवेकानंद नहीं था. जन्‍म के बाद उनका नाम नरेंद्रनीथ दत्त रखा गया था. आखिरी उनका नाम स्‍वामि विवेकानंद कैसे पडा. ज्‍यादातर लोगों का मानना है कि उनके गुरु रामकृष्‍ण परमहंस ने उन्‍हें यह नाम दिया था. लेकिन ऐसा नहीं है. दरअसल, यह नाम उनके गुरु ने नहीं, बल्‍क‍ि किसी और ने दिया था. दरअसल,स्वामी जी को अमेरिका जाना था. लेकिन इसके लिये उनके पास पैसे नहीं थे. उनकी इस पूरी यात्रा का खर्च राजपूताना के खेतड़ी नरेश ने उठाया था और उन्होंने ही स्वामी जी को स्‍वामी विवेकानंद का नाम भी दिया. इसका उल्‍लेख प्रसिद्ध फ्रांसिसी लेखक रोमां रोलां ने अपनी किताब ‘द लाइफ ऑफ विवेकानंद एंड द यूनिवर्सल गोस्पल’ में भी किया है. शिकागो में आयोजित 1891 में विश्‍वधर्म संसद में जाने के लिए राजा के कहने पर ही स्वामीजी ने यही नाम स्वीकार किया था. 
                                       अंजनी मिश्रा

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लाल बहादुर शास्त्री पुण्यतिथि विशेष
स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री स्व0 श्री लाल बहादुर शास्त्री जिनका जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उ0प्र0 के मुगलसराय में एक साधारण परिवार में हुआ था. वह दिखने में तो साधारण व्यक्ति थे लेकिन उनके इरादे चट्टान की तरह दृढ़ और शेर जैसे निर्भीक थे. शास्त्री जी बचपन बहुत संघर्षपूर्ण बीता, उन्हे उच्छा शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई मील नंगे पांव पैदल, व गर्मी में सड़कों पर चलना पड़ा.

27 मई 1964 को जब प्रधानमंत्री के पद पर कार्यरत जवाहरलाल नेहरू का देहांत हो गया इसके बाद साफ सुथरी छवि वाले शास्त्री जी को 9 जून 1964 में ही देश का दूसरा प्रधानमंत्री  बनाया गया.
सादगी और देशभक्ति से ओतप्रोत इस महान व्यक्ति का 11 जनवरी 1966 को रहस्यमय तरीके से देहावसान हो गया.

उन्हे मरणोपरान्त “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया

लाल बहादुर शास्त्री जी के अनमोल विचारों

लोगों को सच्चा लोकतंत्र या स्वराज कभी भी असत्य और हिंसा से प्राप्त नहीं हो सकता है. लाल बहादुर शास्त्री
मेरी समझ से प्रशाशन का मूल विचार यह है कि समाज को एकजुट रखा जाये ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ सके. लाल बहादुर शास्त्री

जो शाशन करते हैं उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशाशन पर किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं. अंततः , जनता ही मुखिया होती है. लाल बहादुर शास्त्री
क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और और भी मजबूत बने. लाल बहादुर शास्त्री
                                   अंजनी मिश्रा


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विश्व हिन्दी दिवस (विश्व हिंदी दिवस) प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ तब से ही इस दिन को 'विश्व हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है।


विश्व हिन्दी दिवस का उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना, करना, हिन्दी के प्रति अनुराग पैदा करना, हिन्दी की दशा के लिए जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना है
 भारतके पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था।
                                 अंजनी मिश्रा

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