सनातन धर्म विशेष कुन्ती ने श्रीकृष्ण से माँगा दुःख जानिए क्यों?
रामनगर, गन्नौर, हरियाणा। सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के शोधकर्ता एवं सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने श्रीमद्भागवत के एक अत्यन्त हृदयस्पर्शी प्रसंग पर प्रकाश डाला है — वह प्रसंग जो सनातन भक्ति के परम रहस्य को उद्घाटित करता है और आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पाँच सहस्र वर्ष पूर्व था।
महाभारत के पश्चात् का वह क्षण
महाभारत का महासमर समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की धरती पर लाखों वीरों का रक्त बह चुका था। पितामह भीष्म शरशय्या पर थे। गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन — सभी काल के गाल में समा चुके थे। पाँचों पाण्डव विजयी हुए थे, किन्तु यह विजय उत्सव नहीं थी। यह विजय आँसुओं में डूबी हुई थी। हस्तिनापुर के राजभवन में उल्लास कम और शोक अधिक था।
ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण, जो इस समस्त युद्ध के साक्षी थे, अब द्वारका लौटने की तैयारी कर रहे थे। प्रस्थान से पूर्व वे अपनी बुआ — माता कुन्ती — से मिलने गए। माता कुन्ती वही थीं जिन्होंने जीवन में असंख्य कष्ट सहे थे। पति पाण्डु की अकाल मृत्यु, वनवास का दीर्घ कष्ट, पुत्रों का निरन्तर संघर्ष — इन सब अग्निपरीक्षाओं से वे गुजरी थीं। फिर भी उनका मन अविचल था।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्वक कहा —
बुआ, आज जो चाहो माँग लो।
यह वरदान था। यह अवसर था। और यह वह क्षण था जिसने सनातन भक्ति के इतिहास में एक अमर अध्याय लिख दिया।
माता कुन्ती का वह अद्भुत वरदान
संसार में जब कोई माँ से पूछा जाए कि क्या चाहती हो — तो वह सुख माँगती है। अपने पुत्रों की दीर्घायु माँगती है। धन-सम्पदा माँगती है। राज्य माँगती है। यह स्वाभाविक है। यह मानवीय प्रवृत्ति है।
किन्तु माता कुन्ती ने कुछ और ही माँगा।
उन्होंने कहा —
विपदः सन्तु ताः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्याद् अपुनर्भवदर्शनम्।।
— श्रीमद्भागवतपुराण, प्रथम स्कन्ध, अध्याय ८, श्लोक २५
अर्थात् — हे जगद्गुरु! मुझे बारम्बार विपदाएँ मिलती रहें — क्योंकि उन्हीं संकटों में आपके दर्शन होते हैं, और आपके दर्शन ही पुनर्जन्म के बन्धन को काटते हैं।
माता कुन्ती ने दुःख माँगा।
यह सुनकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुख पर एक दिव्य मुस्कान आई। यह वह माँगना था जो कोई साधारण मनुष्य नहीं माँग सकता। यह वह वरदान था जो केवल एक सच्चा भक्त ही समझ सकता है।
दुःख माँगने का रहस्य
इस प्रसंग की व्याख्या करते हुए रामनगर गन्नौर निवासी शोधकर्ता नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने कहा कि माता कुन्ती के इस वरदान को समझने के लिए हमें मानव स्वभाव की गहराई में उतरना होगा।
मनुष्य का स्वभाव है कि सुख में वह ईश्वर को भूल जाता है। जब घर में धन है, परिवार में सुख है, शरीर में स्वास्थ्य है — तो मनुष्य मन्दिर जाना भूल जाता है। भजन-कीर्तन छूट जाती है। प्रभु का स्मरण कम हो जाता है।
किन्तु जब दुःख आता है — जब रोग आता है, जब धन जाता है, जब प्रियजन छूट जाते हैं — तब मनुष्य स्वतः ही प्रभु की शरण में आ जाता है। तब उसके मुख से भजन निकलता है। तब उसकी आँखों में अश्रु बहते हैं। तब वह वास्तव में प्रार्थना करता है।
माता कुन्ती यह रहस्य जानती थीं।
इसीलिए उन्होंने कहा — मुझे दुःख दो। क्योंकि दुःख में ही तुम याद आते हो। सुख में तो मैं तुम्हें भूल जाऊँगी।
यह सनातन भक्ति का वह परम रहस्य है जिसे आचार्यों ने युगों से समझाया है।
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा की दृष्टि
निम्बार्क ने आगे कहा कि हमारी सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा में इसी भाव को दुःखे भजन, सुखे विस्मरण के सिद्धान्त से समझाया जाता है। यह सिद्धान्त कहता है कि भक्त को सुख और दुःख — दोनों में समभाव रखना चाहिए। किन्तु यदि दुःख में प्रभु-स्मरण होता है तो वह दुःख भी वरदान बन जाता है।
हमारी परंपरा में बैरागी साधु-सन्त सांसारिक सुखों का त्याग इसीलिए करते हैं — ताकि प्रभु से नाता बना रहे। वे जानते हैं कि सुख की अधिकता मनुष्य को प्रभु से दूर ले जाती है।
माता कुन्ती ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए वही भाव प्राप्त किया जो एक बैरागी साधक वर्षों की तपस्या से प्राप्त करता है। यही उनकी भक्ति की महानता है।
आचार्य निम्बार्क का युगल-उपासना दर्शन
आचार्य निम्बार्क के युगल-उपासना दर्शन में भी भक्त की यही स्थिति आदर्श मानी गई है — जहाँ भक्त की समस्त इच्छाएँ प्रभु में विलीन हो जाएँ। जहाँ भक्त यह न माँगे कि मुझे सुख दो, मुझे मोक्ष दो — बल्कि वह केवल यह माँगे कि मुझे तुम्हारी याद बनी रहे।
यह भक्ति का निर्गुण-निराकार स्वरूप नहीं है। यह सगुण प्रेमभक्ति का चरमोत्कर्ष है। यह वह अवस्था है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का अन्तर मिट जाता है। जहाँ भक्त कहता है — मुझे मोक्ष नहीं चाहिए, मुझे केवल तुम्हारी याद चाहिए।
कुन्ती-स्तुति इसी सिद्धान्त का जीवन्त प्रमाण है।
आज के युग में इस प्रसंग की प्रासंगिकता
निम्बार्क ने कहा कि आज के युग में जब मनुष्य सुख की दौड़ में अन्धा हो रहा है, जब धन और वैभव ही जीवन का लक्ष्य बन गया है — तब माता कुन्ती का यह वरदान और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
आज का मनुष्य दुःख से भागता है। वह नहीं जानता कि दुःख भी एक गुरु है। दुःख भी एक अवसर है — ईश्वर के निकट जाने का अवसर। जब सब ओर से दरवाजे बन्द हो जाते हैं, तब ऊपर देखने की आदत पड़ती है।
माता कुन्ती ने यही सिखाया — दुःख से मत भागो। दुःख को अपना गुरु बनाओ। दुःख को ईश्वर-स्मरण का माध्यम बनाओ।
उपसंहार
माता कुन्ती की यह स्तुति केवल एक श्लोक नहीं है। यह जीवन जीने का दर्शन है। यह सनातन धर्म की आत्मा है। यह वह सन्देश है जो युग-युगान्तर तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
जो मनुष्य इस प्रसंग को हृदय से समझ लेता है — वह फिर कभी दुःख में टूटता नहीं। वह जानता है कि दुःख ईश्वर का अभिशाप नहीं, ईश्वर का आमन्त्रण है।
नमो भगवते वासुदेवाय।
लेखक परिचय
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा शोधकर्ता
रामनगर, गन्नौर, हरियाणा
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