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कॉकरोच, परजीवी और लोकतंत्र : क्या यह केवल एक व्यंग्य है या व्यवस्था के विरुद्ध उभरती नई बेचैनी?

## लोकतंत्र में उपमाएँ कभी-कभी आंदोलनों को जन्म देती हैं

लोकतांत्रिक इतिहास का एक दिलचस्प सत्य यह है कि कई बार बड़े राजनीतिक आंदोलन किसी विचारधारा, घोषणापत्र या संगठन से नहीं, बल्कि एक शब्द, एक प्रतीक या एक टिप्पणी से जन्म लेते हैं। सत्ता, न्यायपालिका, मीडिया अथवा किसी प्रभावशाली संस्था द्वारा प्रयुक्त कोई रूपक अचानक लाखों लोगों की सामूहिक चेतना को छू लेता है और वह प्रतीक प्रतिरोध की भाषा बन जाता है।

हाल के दिनों में ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द विकसित हुआ तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” (सीजेपी) का आंदोलन इसी प्रवृत्ति का एक नया उदाहरण बनकर सामने आया है। यह केवल एक संगठन की कहानी नहीं है; यह उस मनःस्थिति की अभिव्यक्ति है जिसमें देश का एक बड़ा युवा वर्ग स्वयं को उपेक्षित, अपमानित और असुरक्षित महसूस कर रहा है।

जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन चाहे संगठनात्मक दृष्टि से सफल रहा हो या नहीं, लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य खड़ा कर दिया है—क्या भारत का युवा आज केवल रोजगार, शिक्षा और अवसरों की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि सम्मान और सुने जाने के अधिकार की भी लड़ाई लड़ रहा है?

## शब्दों की राजनीति और आहत नागरिकता

लोकतंत्र में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती; वह सत्ता और समाज के बीच संबंधों की दिशा भी निर्धारित करती है। जब कोई सामान्य नागरिक स्वयं को “कॉकरोच” या “परजीवी” जैसे रूपकों के संदर्भ में देखता है, तब उसके भीतर केवल असहमति नहीं, बल्कि अपमान की अनुभूति भी जन्म ले सकती है। यह प्रतिक्रिया तार्किक हो या भावनात्मक, लोकतंत्र में उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में न्यायपालिका, सरकार, विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज सभी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संवाद की ऐसी भाषा अपनाएँ जो असहमति को सम्मानपूर्वक व्यक्त करने की गुंजाइश बनाए रखे। किसी भी लोकतंत्र की शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि वह आलोचना को कितना दबा सकता है, बल्कि इससे मापी जाती है कि वह असंतोष को कितनी गरिमा के साथ सुन सकता है।

## शिक्षा संकट : आंदोलन की वास्तविक ऊर्जा

सीजेपी के मंच, नेतृत्व और राजनीतिक संभावनाओं पर जितनी बहस हुई, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह सामाजिक पृष्ठभूमि है जिसने इस आंदोलन को ऊर्जा प्रदान की।

यदि लाखों छात्र परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठा रहे हैं, यदि परिणामों को लेकर अविश्वास बढ़ रहा है, यदि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता को लेकर संदेह उत्पन्न हो रहे हैं, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाती; यह लोकतांत्रिक वैधता का प्रश्न बन जाती है।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसका युवा वर्ग होता है। जब वही वर्ग यह महसूस करने लगे कि उसकी मेहनत और भविष्य दोनों असुरक्षित हैं, तब असंतोष केवल परीक्षा केंद्रों तक सीमित नहीं रहता। वह धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप धारण करने लगता है।

इतिहास बताता है कि बेरोजगारी, शिक्षा संकट और अवसरों की कमी से उपजा असंतोष अंततः व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा में बदल जाता है। आज भारत के सामने भी यही चुनौती खड़ी है।

## क्या हर नया आंदोलन किसी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा होता है?

भारतीय राजनीति का अनुभव जनता को संदेह करना सिखा चुका है। पिछले डेढ़ दशक में देश ने अनेक ऐसे आंदोलनों को देखा है जो बाद में राजनीतिक दलों में परिवर्तित हुए या राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा बन गए। परिणामस्वरूप जनता अब किसी भी नए आंदोलन को सहज रूप से स्वीकार नहीं करती। यही कारण है कि सीजेपी को लेकर भी अनेक प्रश्न उठ रहे हैं—

* क्या यह स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश है?
* क्या यह किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?
* क्या यह सत्ता-विरोधी ऊर्जा को नियंत्रित करने का माध्यम है?
* या यह वास्तव में युवाओं की स्वतंत्र आवाज़ है?

इन प्रश्नों का उत्तर समय देगा। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता केवल उसके नारों से नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता, पारदर्शिता और वैचारिक स्पष्टता से निर्मित होती है। यदि कोई संगठन व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि उसका वैकल्पिक दृष्टिकोण क्या है।

## डिजिटल क्रांति और क्षणिक जनांदोलन

भारत की राजनीति अब सोशल मीडिया के युग में प्रवेश कर चुकी है। एक समय था जब आंदोलन वर्षों की तैयारी से जन्म लेते थे। आज एक हैशटैग, एक मीम, एक वायरल वीडियो या एक प्रतीक कुछ ही दिनों में लाखों लोगों को जोड़ सकता है। लेकिन डिजिटल लोकप्रियता और वास्तविक जनशक्ति में अंतर होता है। सोशल मीडिया पर लाखों प्रतिक्रियाएँ मिल जाना और सड़क पर लगातार जनसमर्थन बनाए रखना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

सीजेपी की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या वह डिजिटल आक्रोश को दीर्घकालिक सामाजिक आंदोलन में बदल पाती है या नहीं। यदि आंदोलन केवल वायरल सामग्री तक सीमित रह जाता है तो वह राजनीतिक इतिहास का एक फुटनोट बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि वह युवाओं की वास्तविक समस्याओं को संगठित रूप से उठाता है, तो उसका प्रभाव अपेक्षा से कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।

## लोकतंत्र में ‘सेफ्टी वाल्व’ की भूमिका

राजनीतिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत कहता है कि लोकतंत्र की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जनता के असंतोष को व्यक्त करने के कितने वैध मंच उपलब्ध कराता है।

जब नागरिकों को अपनी नाराज़गी व्यक्त करने का अवसर मिलता है, तब आंदोलन व्यवस्था के भीतर सुधार की संभावना पैदा करते हैं। लेकिन जब असंतोष को केवल प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित कर दिया जाता है और मूल समस्याएँ जस की तस बनी रहती हैं, तब आंदोलन धीरे-धीरे ‘सेफ्टी वाल्व’ बन जाते हैं—जनता अपना गुस्सा निकालती है और व्यवस्था बिना किसी वास्तविक परिवर्तन के आगे बढ़ती रहती है।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में दबाव बनाएगा या केवल क्षणिक आक्रोश का माध्यम बनकर रह जाएगा।

## भाजपा, विपक्ष और नई राजनीति की तलाश

भारतीय राजनीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ सत्ता और विपक्ष दोनों ही नई सामाजिक शक्तियों की तलाश में हैं।

एक ओर सत्तारूढ़ दल अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहता है, दूसरी ओर विपक्ष युवाओं, छात्रों और नए मतदाताओं को संगठित करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे समय में कोई भी नया संगठन स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाता है।

किन्तु लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि किसी भी नागरिक समूह को केवल आशंकाओं के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार किसी भी संगठन को केवल जनसमर्थन के दावे के आधार पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधि भी नहीं माना जा सकता। विश्वसनीयता अर्जित करनी पड़ती है। और वह समय, संघर्ष तथा निरंतर सार्वजनिक जवाबदेही से अर्जित होती है।

## असली प्रश्न कॉकरोच नहीं, व्यवस्था है

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि “कॉकरोच जनता पार्टी” का भविष्य क्या होगा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बन रही हैं जिनमें लाखों युवा किसी व्यंग्यात्मक प्रतीक के पीछे खड़े होने को तैयार हो जाते हैं?

* क्यों परीक्षा, रोजगार, शिक्षा और अवसरों के प्रश्न बार-बार राजनीतिक असंतोष में परिवर्तित हो रहे हैं?
* क्यों संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है?
* और क्यों नई पीढ़ी व्यवस्था से संवाद के बजाय टकराव की भाषा की ओर आकर्षित होती जा रही है?

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे जाएंगे, तब तक नए-नए प्रतीक जन्म लेते रहेंगे—कभी किसी नाम से, कभी किसी रंग से, कभी किसी नारे से। लोकतंत्र की असली परीक्षा किसी आंदोलन को रोकने में नहीं, बल्कि उन कारणों को दूर करने में है जो आंदोलनों को जन्म देते हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी सफल होगी या विफल—यह भविष्य का विषय है। लेकिन जिस बेचैनी ने उसे जन्म दिया है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत अवश्य है। उसे समझना, सुनना और उसका समाधान खोजना ही राष्ट्रहित का सबसे बड़ा दायित्व है।

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