सीख रहा हूं इंसानों की चेहरा पढ़ने का हुनर,क्योंकि सुना है किताबों से ज्यादा चेहरे पर लिखा होता है।
राजनीति : सेवा का माध्यम या स्वार्थ का साधन? मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है के आधार पर सामाजिक न्याय के लिए राजनीति जैसा व्यवस्था बनाया गया। जिससे मानवता सर्वोपरि बनी रहे।जब हमने राजनीति को नज़दीक से देखा और समझा, तो पाया कि इसमें सेवा भाव रखने वाले लोगों की अपेक्षा स्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों की संख्या अधिक दिखाई देती है। कुछ लोग सत्ता को जनसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी निजी जागीर समझ बैठते हैं। यह प्रवृत्ति चाहे आम जनता में हो या नेताओं में, समाज और मानवता दोनों के लिए घातक है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के बिना उसका जीवन अधूरा है। इसी सोच के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति और सत्ता की स्थापना की गई थी, ताकि समाज के योग्य और जिम्मेदार लोग नेतृत्व करें तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और विकास की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा सकें। राजनीति का मूल उद्देश्य जनकल्याण, सामाजिक न्याय और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन समय के साथ राजनीति का स्वरूप काफी हद तक बदलता गया।आज कई स्थानों पर राजनीति सेवा की बजाय स्वार्थ, अवसरवाद, जातिवाद, धनबल, बाहुबल और माफियासंस्कृति के प्रभाव में दिखाई देती है। राजनीति में गुंडे, मवाली, माफिया और निजी हित साधने वाले तत्वों की बढ़ती दखलंदाजी ने इसकी गरिमा को ठेस पहुंचाई है। परिणामस्वरूप जनता का विश्वास भी राजनीति और राजनीतिक दलों से कमजोर होता जा रहा है,आवश्यकताइस बात की है कि राजनीति को पुनः सामाजिकता, नैतिकता और जनसेवा से जोड़ा जाए। राजनीति में ऐसे लोगों का प्रवेश बढ़े जो समाज के प्रति संवेदनशील हों, जिनकी प्राथमिकता व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि जनहित हो। जब राजनीति सेवा, त्याग, ईमानदारी और जवाबदेही के सिद्धांतों पर चलेगी, तभी समाज में सकारात्मक परिवर्तन आएगा और लोकतंत्र मजबूत होगा।
राजनीति किसी व्यक्ति या वर्ग की रखैल नहीं, बल्कि जनता की अमानत है। इसका उद्देश्य सत्ता का सुख भोगना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में सुधार लाना है। यदि राजनीति अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटे, तो यह देश और समाज के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।