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गया की सड़कों पर जिंदगी की सुरक्षा: प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक दायित्व का 'गोल्डन आवर',



​विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

दिनांक: 07 जून 2026
गयाजी : ​गया के समाहरणालय सभागार में माननीय केंद्रीय मंत्री श्री जीतन राम मांझी की अध्यक्षता और क्षेत्र के प्रबुद्ध जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में संपन्न हुई सड़क सुरक्षा समिति की बैठक केवल एक रूटीन प्रशासनिक समीक्षा नहीं है।
यह बैठक बिहार के एक सबसे बड़े और सांस्कृतिक-भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील जिले में लगातार असमय छिनती जिंदगियों को बचाने के लिए एक 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी की घंटी) है।

वर्ष 2022 से अब तक जिले में 2,490 सड़क दुर्घटनाएं होना और अकेले वर्ष 2025 में 601 हादसों का दर्ज होना यह साबित करता है कि गया की सड़कों पर रफ्तार और लापरवाही का जानलेवा खेल जारी है।

​इस बैठक के प्रमुख बिंदुओं, आंकड़ों और भविष्य की कार्ययोजना का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित आयामों के तहत किया जा सकता है:
​1. आंकड़ों का खौफनाक सच और 'अदृश्य' दुर्घटनाओं की चुनौती,
​जिला पदाधिकारी श्री शशांक शुभंकर द्वारा प्रस्तुत आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
वर्ष 2026 के शुरुआती पांच महीनों (जनवरी से मई) में ही 251 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुल हादसों में 873 मामले 'हिट एंड रन' के हैं, जहां टक्कर मारने वाला वाहन चालक पीड़ित को तड़पता छोड़ फरार हो जाता है।

​केंद्रीय मंत्री श्री जीतन राम मांझी ने एक बेहद गंभीर व्यावहारिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है—अनेक सड़क दुर्घटनाएं थानों तक पहुंच ही नहीं पातीं। ग्रामीण क्षेत्रों या लोक-लाज और अदालती चक्करों के डर से लोग प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं कराते, जिससे ये मामले सरकारी आंकड़ों में 'अदृश्य' रह जाते हैं।
सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ इन पीड़ितों तक पहुंचाने के लिए अब निजी और सरकारी अस्पतालों से सीधे डेटा प्राप्त करने का निर्देश एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।

​2. 'गोल्डन आवर' और स्वास्थ्य ढांचे का सुदृढ़ीकरण,
​चिकित्सा विज्ञान में सड़क दुर्घटना के बाद के पहले 45 मिनट से 1 घंटे के समय को 'गोल्डन आवर' कहा जाता है।
इस अवधि में यदि घायल को प्राथमिक उपचार मिल जाए, तो अधिकांश जानें बचाई जा सकती हैं। गया जिला भौगोलिक रूप से जीटी रोड और गया-पटना मुख्य मार्ग जैसे व्यस्ततम राजमार्गों से जुड़ा है, जहाँ हादसों की गंभीरता अधिक होती है।

​निशुल्क इलाज योजना:
केंद्र सरकार की दो माह पूर्व लागू योजना, जिसके तहत दुर्घटना पीड़ितों का इलाज मुफ्त होगा और अस्पताल को सीधे परिवहन विभाग/केंद्र सरकार भुगतान करेगी, एक मील का पत्थर है।
जिला परिवहन पदाधिकारी को सभी निजी अस्पतालों का एनरोलमेंट (नामांकन) कराने का निर्देश निजी स्वास्थ्य माफियाओं की मनमानी पर लगाम लगाएगा।

​ट्रामा सेंटर्स का एक्टिवेशन:
मगध मेडिकल अस्पताल के ट्रामा सेंटर को पूरी तरह कार्यात्मक (Functional) बनाने के साथ-साथ शेरघाटी अस्पताल में भी नया ट्रामा सेंटर चालू करने का निर्णय जीटी रोड पर होने वाले हादसों के लिए 'लाइफ-लाइन' बनेगा।

​3. संस्थागत ढांचा और जमीनी जुड़ाव,
​बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष सह माननीय विधायक डॉ. प्रेम कुमार का यह सुझाव बेहद सटीक है कि इस समिति की बैठकें हर तीन माह पर अनिवार्य रूप से हों।
सड़क सुरक्षा केवल जिला मुख्यालय के वातानुकूलित कमरों का विषय नहीं हो सकती। इसे प्रखंड और पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों तथा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से जोड़कर ही एक जन-आंदोलन बनाया जा सकता है।

​4. अवैध खनन, ओवरलोडिंग और बुनियादी ढांचागत सुधार,
​शहर में अवैध रूप से बिना मानकों के दौड़ रहे ट्रैक्टर और बालू लदे वाहन सीधे तौर पर मौत को आमंत्रण दे रहे हैं। बैठक में इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए त्रिपक्षीय जांच (जिला प्रशासन, परिवहन और पुलिस) के आदेश दिए गए हैं।
​सड़कों पर बिखरा बालू:
बालू घाटों से निकलने वाले वाहनों से गिरने वाला बालू दोपहिया वाहनों के फिसलने का सबसे बड़ा कारण बनता है। खनन विभाग और पथ निर्माण विभाग को बालू की सफाई कराने तथा इसका खर्च बालू ठेकेदारों (संवेदकों) से वसूलने का निर्देश प्रशासनिक सख्ती का बेहतरीन उदाहरण है।

​ब्लैक स्पॉट्स का उपचार:
जिले के 27 संभावित दुर्घटना स्थलों (ब्लैक स्पॉट्स) की पहचान की गई है। आई-रेड (I-RAD) पोर्टल और इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) जैसी आधुनिक तकनीकों के सहारे जेबरा क्रॉसिंग, रम्बल स्ट्रिप, रोड डेलिनेटर और साइनेज लगाने का कार्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

​5. सूचना का अभाव और प्रशासनिक सुलभता (हेल्प डेस्क),
​बाराचट्टी और अतरी के माननीय विधायकों ने जनता की नब्ज पर हाथ रखा है। अमूमन दुर्घटना के बाद गरीब और ग्रामीण परिवारों को यह पता ही नहीं होता कि सरकारी मुआवजे या सहायता के लिए कौन से कागजात कहां जमा करने हैं।
​इस समस्या के समाधान के लिए समाहरणालय परिसर में ही परिवहन विभाग का समर्पित हेल्प डेस्क काउंटर स्थापित करने का जिला पदाधिकारी का निर्णय सराहनीय है।
​साथ ही, टेउसा बाजार में जाम की समस्या से निपटने के लिए दिन में भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक और गया इंजीनियरिंग कॉलेज के समीप साइन बोर्ड लगाने के निर्देश स्थानीय स्तर पर तुरंत राहत देंगे।

​निष्कर्ष :
​गया जिला सड़क सुरक्षा समिति की यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन और नीति-नियंता अब सड़क हादसों को केवल 'दुर्घटना' मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठने को तैयार नहीं हैं।
तकनीक (ITMS, I-RAD) का समन्वय, बुनियादी ढांचे में सुधार (साइनेज, जेबरा क्रॉसिंग), स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण (ट्रामा सेंटर) और प्रशासनिक संवेदनशीलता (कलेक्ट्रेट में हेल्प डेस्क) मिलकर एक सुरक्षित गया का निर्माण कर सकते हैं।
​हालांकि, जैसा कि डॉ. प्रेम कुमार ने रेखांकित किया—सड़क सुरक्षा केवल एक प्रशासनिक एजेंडा नहीं, बल्कि एक सर्वोच्च सामाजिक दायित्व है।
जब तक आम नागरिक हेलमेट पहनने, ओवरलोडिंग न करने, गति सीमा का पालन करने और 'गोल्डन आवर' में घायल की मदद करने को अपना नैतिक कर्तव्य नहीं मानेंगे, तब तक नियम केवल कागजों और बैठकों तक सीमित रह जाएंगे। गया प्रशासन ने अपनी मंशा साफ कर दी है, अब बारी आम जनता की है कि वे सड़कों पर रफ्तार की जगह 'जिंदगी' को प्राथमिकता दें।

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