जगदलपुर जेल में आदिवासी कैदी की मौत
हादसा, लापरवाही या अनुत्तरित सवाल?
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में एक बार फिर जेल में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजापुर जिले के उसूर थाना क्षेत्र के लिंगापुर गांव के रहने वाले 35 वर्षीय आदिवासी युवक रमेश कुंजाम की जगदलपुर केंद्रीय कारागार में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बाथरूम में फिसलकर गिरने से उसके सिर में गंभीर चोट लगी और अस्पताल में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। लेकिन यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को जन्म देती है।
कौन था रमेश कुंजाम?
रमेश कुंजाम बीजापुर जिले के उसूर क्षेत्र के लिंगापुर गांव के निवासी था । यह गांव दंडकारण्य क्षेत्र का हिस्सा है, जो लंबे समय से माओवादी आंदोलन, सुरक्षा बलों के अभियानों और राजनीतिक संघर्षों का केंद्र रहा है। पुलिस के अनुसार, रमेश पर माओवादी गतिविधियों से जुड़े तीन मामले दर्ज थे और इन्हीं मामलों के कारण वह जेल में बंद था।
उसे पहले दंतेवाड़ा केंद्रीय जेल में रखा गया था। बाद में नवंबर 2025 में उसे जगदलपुर केंद्रीय कारागार में स्थानांतरित कर दिया गया। जेल में सजा/निरोध की अवधि के दौरान ही उसकी मृत्यु हुई।
आधिकारिक कहानी क्या कहती है?
जेल प्रशासन और पुलिस के अनुसार, 4 जून की रात रमेश कुंजाम बाथरूम गया था। वहां फर्श पर पानी जमा होने के कारण उसका पैर फिसल गया और वह गिर पड़ा। गिरने से उसके सिर में गंभीर चोट आई। अन्य कैदियों और जेल कर्मचारियों की मदद से उसे तत्काल जगदलपुर के महारानी अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
लेकिन यहीं से शुरू होते हैं सवाल
किसी भी कैदी की जेल में मृत्यु सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। चाहे वह किसी भी आरोप में बंद हो, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की होती है। इसलिए इस घटना पर कई सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या केवल फिसलने से ही मौत हुई?
सिर में चोट लगने से मौत संभव है, लेकिन चोट कितनी गंभीर थी? घायल होने के बाद उसे कितनी जल्दी चिकित्सा सहायता मिली? अस्पताल पहुंचाने में कितना समय लगा? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर अभी सामने नहीं आया है।
क्या सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है?
केंद्रीय जेलों में अधिकांश हिस्सों में निगरानी कैमरे लगे होते हैं। रमेश के बाथरूम जाने, घायल होने और अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया से संबंधित फुटेज उपलब्ध है या नहीं, यह भी जांच का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।
क्या जेल प्रशासन की लापरवाही थी?
यदि बाथरूम में इतना पानी जमा था कि कोई व्यक्ति फिसलकर गंभीर रूप से घायल हो जाए, तो यह जेल प्रबंधन और सुरक्षा मानकों पर भी सवाल खड़े करता है। क्या आवश्यक सावधानियां बरती गई थीं? इसकी जांच जरूरी है।
बस्तर की पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
रमेश कुंजाम की मौत को समझने के लिए बस्तर क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखना होगा। बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिले लंबे समय से माओवादी आंदोलन और राज्य की सुरक्षा नीति के संघर्ष का केंद्र रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों ने समय-समय पर आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में आदिवासियों को माओवादी मामलों में गिरफ्तार कर वर्षों तक जेलों में रखा जाता है।
ऐसे में माओवादी मामलों से जुड़े किसी आदिवासी कैदी की जेल में मृत्यु होने पर केवल आधिकारिक बयान पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अधिक पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता होती है।
स्वतंत्र जांच की आवश्यकता
वर्तमान उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना संभव नहीं है कि रमेश कुंजाम की मौत एक दुर्घटना थी, प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम थी या इसके पीछे कोई अन्य कारण था। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जेल के भीतर हुई किसी भी मौत की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, मजिस्ट्रियल जांच कराई जानी चाहिए और मृतक के परिवार को पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
निष्कर्ष
रमेश कुंजाम की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। यह जेल व्यवस्था, आदिवासी क्षेत्रों की परिस्थितियों, बंदियों के अधिकारों और राज्य की जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवालों को सामने लाती है। "बाथरूम में फिसलकर मौत" का आधिकारिक बयान अपने आप में अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। जब तक सभी तथ्य सामने नहीं आते, तब तक यह घटना कई अनुत्तरित प्रश्नों के साथ समाज के सामने खड़ी रहेगी।