रुपये की कमजोरी से विदेशी निवेशकों को झटका, शेयर बाजार से निकाल रहे हैं पैसा। अर्थव्यवस्था को होगा भारी नुकसान।
विदेशी निवेशकों के लिए किसी देश के शेयर बाजार में निवेश करते समय केवल बाजार की तेजी ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्रा की मजबूती भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी देश की मुद्रा लगातार कमजोर होती है, तो शेयरों से मिलने वाला लाभ भी विदेशी निवेशकों के लिए कम या समाप्त हो सकता है।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। वर्ष 2024 में एक अमेरिकी निवेशक 1 लाख डॉलर लेकर भारत आया। उस समय डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत करीब 82 रुपये थी, जिसके चलते उसकी निवेश राशि लगभग 82 लाख रुपये बन गई। उसने यह रकम भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर दी।
मान लें कि एक-दो वर्षों में शेयर बाजार में अच्छी बढ़त हुई और उसकी पूंजी 10 प्रतिशत बढ़कर 90.2 लाख रुपये हो गई। लेकिन इसी दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 82 से गिरकर 95 रुपये प्रति डॉलर पहुंच गई।
जब निवेशक ने अपनी राशि वापस डॉलर में बदलवाई, तो उसे करीब 94,900 डॉलर ही प्राप्त हुए। यानी शेयर बाजार में लाभ होने के बावजूद रुपये की कमजोरी के कारण उसकी वास्तविक डॉलर आधारित संपत्ति घट गई। इसके अलावा टैक्स, स्टांप ड्यूटी, ब्रोकरेज और जीएसटी जैसे अतिरिक्त खर्चों का असर भी पड़ा।
आर्थिक जानकारों के अनुसार यही वजह है कि किसी देश की मुद्रा में लगातार गिरावट आने पर विदेशी निवेशक वहां से पूंजी निकालने लगते हैं। उनके लिए निवेश पर वास्तविक रिटर्न केवल शेयरों की बढ़त से नहीं, बल्कि मुद्रा विनिमय दर से भी तय होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत मुद्रा केवल आयातित वस्तुओं, विशेषकर तेल, को सस्ता बनाने के लिए ही जरूरी नहीं होती, बल्कि विदेशी निवेश आकर्षित करने, निवेशकों का भरोसा बनाए रखने और अर्थव्यवस्था की स्थिरता बढ़ाने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।