हरियाणा का अस्थल तिरखु तीर्थ महाभारत कालीन यक्ष-सरोवर आज भी जीवित है
हरियाणा का अस्थल तिरखु तीर्थ — महाभारत कालीन यक्ष-सरोवर आज भी जीवित है
हरियाणा। अस्थल तिरखु तीर्थ — जो महाभारत के वन-पर्व में वर्णित यक्ष-सरोवर के रूप में प्रसिद्ध है — आज भी अपनी दिव्य परम्परा को जीवित रखे हुए है। इतिहासकार एवं सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी नरेश दास वैष्णव निम्बार्क के शोध के अनुसार यही वह पावन सरोवर है जहाँ युधिष्ठिर ने यक्ष के समस्त प्रश्नों का धर्मपूर्वक उत्तर दिया था।
शोधकर्ता के अनुसार यह सरोवर एक समय लगभग पच्चीस एकड़ में विस्तृत था — जो आज सिमटकर एक एकड़ में शेष है। इस तीर्थ के अन्तर्गत लगभग तीन सौ साठ मन्दिर आते थे जिनकी सेवा-पूजा की सम्पूर्ण व्यवस्था वैष्णव बैरागी आचार्यों के अधीन थी।
ऐतिहासिक दृष्टि से यह तीर्थ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सन् १७५० में छुई खदान रियासत के प्रथम बैरागी राजा रूप दास बैरागी ने इसी तीर्थ पर दीक्षा ग्रहण की थी। यह तथ्य डॉ. नारायण दत्त — M.A., Ph.D., आगरा विश्वविद्यालय — की पुस्तक 'निम्बार्क सम्प्रदाय — कृष्ण भक्ति हिन्दी काव्य' में प्रमाणित रूप से वर्णित है।
वर्तमान में इस तीर्थ के पीठाधीश्वर डॉ. महन्त राजपाल दास बैरागी निम्बार्क हैं — जिन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से निम्बार्क वेदान्त पर Ph.D. सम्पन्न की है। सन् १९८४ से वे इस तीर्थ की सेवा-व्यवस्था का संचालन कर रहे हैं।
इतिहासकार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क का कहना है — "अस्थल तिरखु तीर्थ तीन युगों को अपने भीतर समेटे हुए है। महाभारत काल का यक्ष-सरोवर, निम्बार्क सम्प्रदाय की वैष्णव बैरागी साधना और आधुनिक विद्वत्ता की त्रिवेणी इस तीर्थ को भारत के तीर्थ-इतिहास में अद्वितीय स्थान प्रदान करती है।"
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