हरियाली का महाकुंभ या पौधों का मौसमी महोत्सव
सेल्फी वाले पौधे खूब लग रहे हैं, लेकिन छांव वाले पेड़ आखिर पैदा कब होंगे
नर्मदापुरम में विश्व पर्यावरण दिवस पर हरियाली का महाकुंभ सजा। जल चेतना परिक्रमा निकली, पौधे लगे, सीड बॉल बने, संकल्पों की बारिश हुई और पर्यावरण बचाने के संदेशों की गूंज दूर तक सुनाई दी। कलेक्टर सोमेश मिश्रा का बच्चों के साथ पौधारोपण करना और ई-स्कूटर से पहुंचकर ग्रीन संदेश देना निश्चित रूप से एक सकारात्मक तस्वीर पेश करता है।
लेकिन इस हरियाली उत्सव के बीच एक मौन सवाल फिर सिर उठाकर खड़ा हो गया है।
हम हर साल पौधे लगाने की नई इबारत लिखते हैं, लेकिन उन पौधों की अगली कहानी कौन लिखता है
पेड़ लगाने की परंपरा अब फोटो फ्रेम अभियान बन चुकी है। पौधा लगा, कैमरा चमका, तालियां बजीं और फिर पौधा मौसम, मवेशियों और लापरवाही के हवाले। कुछ दिनों तक पौधे वीआईपी मेहमान की तरह देखे जाते हैं, फिर धीरे-धीरे हरियाली के अनाथ बन जाते हैं।
कभी करोड़ों पौधों का महाअभियान, कभी रिकॉर्ड वाली हरियाली, कभी आंकड़ों का जंगल लेकिन धरातल पर आज भी कई जगह छांव तलाशती धरती दिखाई देती है। यही वह हरित विरोधाभास है, जो हर पर्यावरण दिवस पर सामने आ जाता है।
इस बार प्रशासन ने सिर्फ पौधारोपण नहीं, संरक्षण की बात भी की है। यही इस पूरे आयोजन का सबसे मजबूत पक्ष है। यदि पौधों के साथ जिम्मेदारियां भी रोपी गईं, तो यह अभियान सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि भविष्य का हरित निवेश साबित हो सकता है।
क्योंकि सच यही है कि प्रकृति को पौधों की गिनती नहीं, पेड़ों की मौजूदगी याद रहती है।
और जब तक पौधारोपण महोत्सव के साथ पौधा संरक्षण संस्कार नहीं जुड़ता, तब तक हरियाली के दावे और सूखे पौधों की हकीकत आमने-सामने खड़ी नजर आती रहेगी।