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झारखंड : टाटा स्टील और स्थानीय समुदायों के बीच विकास व विवाद

झारखंड : 1907 में स्थापित टाटा स्टील ने जमशेदपुर से भारत के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कंपनी वर्तमान में 21.68 मिलियन टन से अधिक कच्चा इस्पात उत्पादन करती है और वार्षिक कारोबार ₹2.18 लाख करोड़ से अधिक है। हालांकि, झारखंड के कई सामाजिक संगठन, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता और विस्थापित परिवार इस बात पर सवाल उठाते हैं कि राज्य की खदानों, जंगलों और जमीन से हुए विकास में स्थानीय लोगों को न्यायसंगत हिस्सा मिला है या नहीं।

पश्चिम सिंहभूम जिले के Noamundi में दशकों से टाटा स्टील द्वारा लौह अयस्क खनन किया जा रहा है, जो कंपनी के उत्पादन की रीढ़ माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि खनिज संपदा से भारी आर्थिक लाभ हुआ, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार में पिछड़े हैं। भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के कारण भी विवाद जारी हैं। कंपनी ने पुनर्वास, मुआवजा और CSR योजनाओं का हवाला देते हुए सहायता का दावा किया है, जबकि सामाजिक संगठनों का कहना है कि कई परिवारों को स्थायी रोजगार या पर्याप्त पुनर्वास नहीं मिला।

पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी टाटा स्टील की परियोजनाओं पर आलोचना हुई है, जहां पर्यावरण संगठनों ने स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने की आशंका जताई है। कंपनी ने पर्यावरण संरक्षण के उपायों का समर्थन किया है। अप्रैल 2026 में रामगढ़ जिला खनन कार्यालय ने टाटा स्टील को अतिरिक्त कोयला उत्खनन के आरोप में ₹1,755 करोड़ का डिमांड नोटिस जारी किया है। यह मामला कानूनी प्रक्रिया में है। टाटा स्टील ने जमशेदपुर को विकसित औद्योगिक शहर बनाने और शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास में CSR कार्यक्रम चलाने का भी दावा किया है। झारखंड की जनता के सामने आज भी सवाल है कि राज्य की प्राकृतिक संपदा से लाभ स्थानीय समुदायों तक सही तरीके से पहुंच रहा है या नहीं।

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