पर्यावरण का बिगड़ता स्वरुप : आखिर कब तक?
ओ पी उनियाल
आज दुनिया का कोई-सा हिस्सा ऐसा नहीं है जो जलवायु परिवर्तन की मार न झेल रहा हो। कभी असमय धरती का तीव्रगति से बढ़ता तापमान, कभी अतिवृष्टि की मार तो कभी हाड़ गलाने वाली ठंड। अर्थात धरती के तापमान और मौसम में असमय बदलाव।
जलवायु परिवर्तन वैश्विक तापमान में वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन का परिणाम है, जिससे हमारा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। कुल मिलाकर पर्यावरण का बिगड़ता स्वरुप देखने को मिल रहा है।
क्या धरती पर अनियोजितव विकास संबंधी गतिविधियों का बोझ इतना बढ़ गया है कि धरती का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, जिसका फर्क प्रकृति पर पड़ रहा है। नष्ट होती प्रकृति के परिणाम हमारे सामने गुजरते रहते हैं। एक तरफ विकास की बात की जाती है तो दूसरी तरफ आएदिन विनाश का मंजर देखना पड़ रहा है। मानव जीवन में विकास जरूरी है लेकिन प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर नहीं।
प्रतिवर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन पर्यावरण संरक्षण का संदेश विभिन्न पर्यावरण संरक्षण करने वाली सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं, सामाजिक संस्थाओं, पर्यावरणविदों व केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दिया जाता है इसके बावजूद भी आमजन में जागरूकता नहीं आ रही है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति आज भी अनेकों लोग समर्पित हैं। फिर भी हम चेत नहीं रहे हैं। इसके लिए जब तक एक-एक आदमी समर्पण भाव नहीं रखेगा तब तक लक्ष्य पूरा नहीं होगा।
आज धड़ाधड़ पेड़ों का कटान कर तो दिया जाता है उनकी जगह नए पेड़ बहुत कम लगाए जाते हैं। यदि नए पेड़ लगाए भी जाते हैं तो उनकी देखभाल नहीं की जाती। पेड़ों से हमें शुद्ध हवा मिलती है जो कि हरेक प्राणी को जीवन देती है। जहां पेड़ होंगे भू-स्खलन, मिट्टी क्षरण की संभावना बहुत कम रहती है। पेड़ की जड़ों में नमी होती है जिससे पृथ्वी का तापमान संतुलित बना रहता है। हम यदि अपने घर के गलियारों, आसपास किसी भी रूप में हरियाली बनाए रखें तो यह भी छोटा-सा योगदान होगा।
पर्यावरण दिवस को एक दिवसीय कार्यक्रम तक ही सीमित न रखें। पर्यावरण के प्रति जागरूक बनें। यह अभियान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर चलना चाहिए।