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शाहपुर पटोरी से दिल्ली तक: भारतीय शिक्षा व्यवस्था में नीतिगत विफलता और असमानता का तार्किक विश्लेषण।

भारत, जिसे प्राचीन काल में विश्व का ज्ञान केंद्र (विश्वगुरु) माना जाता था, आज अपने सबसे मूल्यवान संसाधन—युवाओं के भविष्य को लेकर एक गहरे नीतिगत संकट से जूझ रहा है। करोड़ों छात्र, विशेषकर ग्रामीण और मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले, शिक्षा की संरचनात्मक असमानता, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक-आर्थिक गठजोड़ के चक्रव्यूह में फंसे हैं। यह कोई भावुक शिकायत नहीं, बल्कि साक्ष्यों और तथ्यों पर आधारित वह कड़वी सच्चाई है जो राष्ट्रीय मानव पूंजी (Human Capital) को हर दिन बर्बाद कर रही है ।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा विरोधाभास मूल्यांकन के दोहरे मानकों में दिखता है।

बिहार जैसे राज्यों के स्टेट बोर्ड (BSEB) के छात्रों के लिए 75% अंक लाना आज भी एक बेहद कठिन चुनौती है, जबकि केंद्रीय बोर्ड (CBSE) या कुछ अन्य बोर्ड्स में मूल्यांकन अपेक्षाकृत अधिक उदार और सुसंगत रहा है।

तर्क यह है कि यदि दोनों बोर्ड के छात्र राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं (JEE, NEET, CUET) के लिए एक ही पाठ्यक्रम (NCERT) पढ़ते हैं, तो उनके मूल्यांकन मानकों में इतनी भारी विसंगति क्यों?

शाहपुर पटोरी जैसे अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मेधावी छात्र, जो सीमित संसाधनों के बावजूद कड़ी मेहनत करते हैं, वे इस नीतिगत पक्षपात के कारण JEE जैसी परीक्षाओं के पात्रता मानदंड 75% की शर्त से पहले ही बाहर हो जाते हैं।

दशकों से दर्जनों शिक्षा मंत्रियों के बदलने के बावजूद इस विसंगति को दूर न करना एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है। इसका एकमात्र तार्किक समाधान राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन मानकों का समानीकरण (Normalization Process) या सभी शिक्षा बोर्डों के लिए एक समान मूल्यांकन दिशानिर्देश लागू करना है।


तकनीक का उद्देश्य पारदर्शिता लाना होता है, लेकिन जब इसे बिना तैयारी और जवाबदेही के लागू किया जाए, तो यह छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बन जाती है। CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर सर्वर पर अपलोड किया जाता है।

उत्तर पुस्तिकाओं की धुंधली स्कैनिंग, मुख्य पृष्ठों का गायब होना, और गलत कॉपियों के मूल्यांकन के कारण मेधावी छात्रों के अंकों में अप्रत्याशित गिरावट देखी गई।

राँची के सार्थक और दिल्ली के वेदांत श्रीवास्तव जैसे सजग छात्रों ने जब संसदीय समितियों और RTI (सूचना का अधिकार) के माध्यम से आवाज उठाई, तब जाकर सिस्टम की परतें खुलीं।

टेंडर प्रक्रियाओं (जैसे Coempt EduTeck को दिए गए अनुबंधों) में संभावित अनियमितताओं के आरोप और उसके बाद शीर्ष अधिकारियों (CBSE चेयरमैन और सेक्रेटरी) के स्थानांतरण व जांच के आदेश इस बात की पुष्टि करते हैं कि समस्या गहरी है।

किसी भी बड़े तकनीकी बदलाव को सीधे थोपने के बजाय एक व्यापक पायलट प्रोजेक्ट (Pilot Project), स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और पूर्ण पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी।


लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले मुख्यधारा के मीडिया ने शिक्षा जैसे राष्ट्र-निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण विषय से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है।

मीडिया परीक्षा घोटालों (जैसे NEET पेपर लीक), बजट आवंटन और OSM विवाद पर गंभीर चर्चा करने के बजाय टीआरपी (TRP) केंद्रित सतही बहसों में व्यस्त रहता है।

जब सरकारी और पारंपरिक शिक्षण संस्थान गुणवत्ता देने में असमर्थ होते हैं, तभी 'खान सर' या 'विकास दिव्यकीर्ति' जैसे ऑनलाइन शिक्षकों की मांग बढ़ती है। मीडिया को इन शिक्षकों की आलोचना करने के बजाय सरकार से यह पूछना चाहिए कि शिक्षा उपकर (Education Cess) के रूप में वसूले जा रहे अरबों रुपये कहाँ खर्च हो रहे हैं?

भारत सरकार वर्तमान में शिक्षा पर GDP का लगभग 3-4% ही खर्च कर रही है, जो कि कोठारी आयोग द्वारा अनुशंसित 6% के राष्ट्रीय लक्ष्य से काफी कम है। यदि टैक्सपेयर्स के पैसे का सही उपयोग स्कूलों के बुनियादी ढांचे, आधुनिक लैब और शिक्षक प्रशिक्षण में किया जाए, तो महंगी कोचिंग व्यवस्था पर छात्रों की निर्भरता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।


परिवर्तन केवल व्यवस्था को कोसने से नहीं, बल्कि जागरूक समाज के दबाव से आता है। आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) के सामने एक गंभीर वैचारिक संकट है।

युवाओं का एक बड़ा हिस्सा रील्स की आभासी दुनिया, अंध-राष्ट्रवाद और सोशल मीडिया पर धार्मिक ध्रुवीकरण के जाल में फंसकर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा है।

जब परीक्षा माफिया और सिस्टम की कमियां उनके भविष्य को दीमक की तरह चाट रही होती हैं, तब युवाओं का मौन रहना आत्मघाती है। इतिहास गवाह है कि जब तक युवा अपने बुनियादी अधिकारों (शिक्षा और रोजगार) के लिए तार्किक और शांतिपूर्ण ढंग से आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं होगा।

शाहपुर पटोरी के खेतों से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन तक, देश के छात्रों को कोई खैरात या सहानुभूति नहीं चाहिए; उन्हें केवल उनके समान अवसर का अधिकार चाहिए। इस व्यवस्था को सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम तुरंत उठाए जाने अनिवार्य हैं:

बोर्ड मूल्यांकन का राष्ट्रीय समानीकरण (Normalization): ताकि राज्य और केंद्रीय बोर्ड के छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो सके।

तकनीकी टेंडरों में पूर्ण पारदर्शिता और गड़बड़ी पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई।

जीडीपी का 6% शिक्षा को आवंटित हो और जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचा सुधरे।

शिक्षा से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाया जाए।

यदि हम वास्तव में "विकसित भारत" की परिकल्पना को साकार करना चाहते हैं, तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था की इस जर्जर रीढ़ को सबसे पहले सीधा करना होगा। युवाओं को रील्स के सम्मोहन से बाहर निकलकर, तथ्यों पर आधारित विमर्श और शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक प्रयासों के जरिए अपने अधिकारों को हासिल करना होगा।

जय हिंद!

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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