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*कपास किसानों की बर्बादी : किसकी उंगलियां घी में?!* ( छत्तीसगढ़)

*प्रकाशनार्थ*
*कपास किसानों की बर्बादी : किसकी उंगलियां घी में?!*
*(आलेख : संजय पराते)*

छत्तीसगढ़

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में 32 लाख किसान कपास उत्पादन से जुड़े हुए हैं। वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। अधिकांश कपास उत्पादक किसान सीमांत और छोटे किसान ही हैं। हमारे देश में कपास के आयात पर 11 प्रतिशत शुल्क लगता है। यह आयात शुल्क सस्ते कपास के अंधाधुंध आयात को रोकने और घरेलू कपास उत्पादक किसानों के हितों की रक्षा करने का काम करता है। लेकिन आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इस साल जून से अक्टूबर तक के पांच महीनों के लिए इस आयात शुल्क को निलंबित करने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले से 40 लाख गांठ कपास (1 कपास गांठ = 170 किलो) के आयात की संभावना जताई जा रही है।

सवाल यह है कि क्या हमारे देश में कपास की कमी पैदा हो गई है? इसका स्पष्ट जवाब है : नहीं, क्योंकि कपास उद्योग के प्रतिनिधियों ने खुद सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि घरेलू स्तर पर कपास की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है। कपास की बुआई का मौसम भी शुरू हो चुका है, किसान अपनी खेती-किसानी में निवेश भी कर चुके हैं और कपास की नई फसल अक्टूबर-दिसंबर तक बाजार में आ भी जाएगी। तो फिर कपास आयात के लिए मोदी सरकार देश के दरवाजे क्यों खोल रही है?

इस प्रश्न का उत्तर अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में खोजा जा सकता है, जिसका मुख्य लब्बोलुआब यह है कि भारत को अमेरिका से हर साल 100 अरब डॉलर का सामान खरीदना ही पड़ेगा, चाहे उसे जरूरत हो या न हो और वह भी बिना किसी टैरिफ (शुल्क) के। पिछले सीजन में भी अगस्त-दिसंबर के बीच कपास आयात को शुल्क मुक्त किया गया था और 18 लाख गांठों का आयात किया गया था, जबकि इसके पूर्व के वर्ष में इसी अवधि के दौरान 8.8 लाख गांठों का सशुल्क आयात किया गया था। अमेरिकी के साथ व्यापार समझौते का प्रणाम यह है कि आयातित गांठों को मात्रा जून अक्टूबर के पांच महीनों की अवधि में 40 लाख गांठ पहुंचने वाली है, जबकि भारत का सालाना कपास आयात अभी तक 40-50 लाख गांठों का ही रहा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारतीय किसानों की कीमत पर अब कपास का आयात दो से ढाई गुना बढ़ना अनुमानित है।

इतने बड़े पैमाने पर और जरूरत से बाहर जाकर कपास आयात का भारतीय किसानों पर नकारात्मक असर पड़ना तय है। अगले पांच महीनों के लिए आयात शुल्क शून्य किए जाने का बाजार पर सीधा असर तो यह पड़ा है कि कपास की कीमतें 3% गिर गई है। कपास का औसत न्यूनतम समर्थन मूल्य (मध्यम रेशे और लंबे रेशे के मूल्य का औसत) लगभग 8500 रूपये प्रति क्विंटल है। लेकिन खुले बाजार में उसे औसतन 6800 रूपये क्विंटल ही मिलता है। शुल्क मुक्त आयात की घोषणा के बाद इसकी कीमत गिरकर 6600 रूपये प्रति क्विंटल से भी नीचे चली गई है। अमेरिकी उत्पादों के भारतीय बाजार में पटने के साथ यह गिरावट और तेज हो जाएगी।

एक ओर कृषि इनपुट -- बीज, खाद, कीटनाशक, बिजली, डीजल, पानी -- आदि की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और दूसरी ओर लाभकारी समर्थन मूल्य से भी वंचित कपास के भाव तेजी से गिरेंगे। भारतीय किसान इस झटके को सहन करने की स्थिति में नहीं है। कपास की खेती का घाटा और बढ़ेगा, किसान और ज्यादा ऋणग्रस्त होंगे और उनमें अपने सम्मान की रक्षा के लिए आत्महत्या की प्रवृत्ति और ज्यादा बढ़ेगी, खासकर विदर्भ जैसे क्षेत्रों में, जहां की मुख्य फसल कपास ही है।

हमारे देश में 'कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया' (सीसीआई) केंद्र सरकार द्वारा घोषित (अलाभकारी) समर्थन मूल्य पर किसानों का कपास खरीदता है। अगर आयात के कारण कीमतें गिरती हैं, तो सीसीआई को कम दरों पर बाजार में कपास बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और वह घाटे में जाएगा। इसका सीधा असर किसानों से समर्थन मूल्य पर कपास खरीदी की उसकी क्षमता पर पड़ेगा। इससे सीसीआई तो बर्बाद होगी ही, कपास उत्पादक किसानों की, जिनमें से अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, समर्थन मूल्य से वंचना और बढ़ जाएगी। सीसीआई के कमजोर पड़ने के साथ ही कपास किसानों के लिए समर्थन मूल्य की प्रणाली भी खतरे में पड़ जाएगी। कपास के मामले में समर्थन मूल्य की व्यवस्था के ध्वस्त होने का सीधा अर्थ है, कपास उत्पादन में आत्मनिर्भरता को खोना और भारत के एक कपास-आयातक देश में बदलना।

कपास उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार 'कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन' चला रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2025 के बजट में इसका ऐलान किया था। यह मिशन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय मिलकर लागू करेंगे। इस मिशन के तहत अगले पांच सालों में 5,659 करोड़ रूपये से ज्यादा खर्च करने की घोषणा की गई है। इस मिशन के तहत यह घोषणा की गई है कि कपास का उत्पादन बढ़ाने के लिए जलवायु अनुकूल और कीट प्रतिरोधी बीज विकसित किए जाएंगे, आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा, मंडियों का डिजिटलीकरण किया जाएगा और ई-प्लेटफॉर्म विकसित करके किसानों को सीधे बाजार तक पहुंचाया जाएगा, आदि-इत्यादि। इस मिशन का भी वही हाल होने जा रहा है, जो किसानों के लिए बनाई गई अन्य योजनाओं का हो रहा है, क्योंकि सी-2+50 प्रतिशत फार्मूले के आधार पर कपास किसानों को लाभकारी समर्थन मूल्य देना सुनिश्चित करने की बात इस मिशन में सिरे से गायब है। अब सोचने की बात यही है कि किसानों को लाभकारी समर्थन मूल्य दिए बिना और कपास की शुल्क मुक्त आयात की इजाजत देकर देश में किस प्रकार कपास उत्पादन बढ़ाया जा सकता है? साफ है कि पूरा मिशन कपास किसानों और किसान आंदोलन की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही बनाई गई है।

भारत में कपास उत्पादक किसानों की बर्बादी किसकी कीमत पर हो रही है? इसका फायदा निश्चित ही उन कपास कारोबारियों को होने जा रहा है, जिनकी पिछले पांच वर्षों में मुनाफे की औसत वृद्धि दर 22-23 प्रतिशत रही है। पिछले 5 सालों में कपास (कपास/रुई) के कारोबारियों और मिलों का शुद्ध मुनाफा 9 से 38 के बीच रहा है। शून्य आयात शुल्क पर कपास आयात करने से उनके मुनाफे और बढ़ेंगे। भारत को कपास निर्यात करने वाले देशों में अमेरिका का स्थान दूसरा है, अब वह पहले स्थान पर आएगा। इससे उन बड़े अमेरिकी किसानों को (अमेरिका में छोटे और सीमांत किसान नहीं है), जिन्हें उनकी सरकार से भारी अनुदान मिलता है, भारत के बाजार में कब्जा करने का मौका मिलेगा, जो अपने माल को खपाने के लिए पूरी दुनिया की खाक छान रहे हैं। उल्लेखनीय है कि एक अमेरिकी किसान को जहां औसतन सालाना 25 लाख रूपये से ज्यादा की प्रत्यक्ष सब्सिडी मिलती है और फसल खर होने या कीमतों में गिरावट होने पर भी उन्हें कभी घाटा नहीं होता, वहीं एक भारतीय किसान को सालाना औसतन केवल 6000 रूपये की ही सब्सिडी मिलती है और फसल खराब होने या भावों में उतार चढ़ाव का पूरा बोझ उन्हें ही उठाना पड़ता है। इसलिए विश्व बाजार में अमेरिकी कपास भारत के कपास से हमेशा सस्ता होता है। इसलिए भारत के कपास कारोबारी भारतीय किसानों का कपास खरीदने के बजाए अमेरिका का सस्ता कपास खरीदेंगे और अपने मुनाफे को बढ़ाएंगे। भारतीय किसान की बर्बादी की नींव पर अमेरिकी किसानों को खुशहाल बनाया जाएगा और भारत के कॉरपोरेट कपास व्यापारियों के मुनाफे खड़े किए जायेंगे।

भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार ठीक यही चाहती है। भारतीय किसानों की सुरक्षा और राष्ट्रीय कृषि की ज़रूरतें उसकी प्राथमिकता में नहीं है। यही कारण है कि वह वैश्विक और साम्राज्यवादी आर्थिक दबावों के आगे बेशर्मी से घुटने टेक रही है। मोदी सरकार की इस साम्राज्यवादपरस्त नीतियों के खिलाफ और देश के कृषि क्षेत्र और संप्रभुता को बचाने के लिए किसानों और मजदूरों सहित आम जनता के सभी तबकों को मिलकर संघर्ष करना होगा।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

*Devashish Govind Tokekar*
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