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गया में शिक्षा की नई भोर:
जब 'सात निश्चय' से दूर होगी सात प्रखंडों की शैक्षणिक कंगाली!
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी : बिहार के ग्रामीण इलाकों से अक्सर यह दर्दभरी तस्वीरें सामने आती रही हैं कि मैट्रिक और इंटर पास करने के बाद, खासकर बेटियां, सिर्फ इसलिए उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं क्योंकि उनके प्रखंड में कोई डिग्री कॉलेज नहीं होता।
दूरी, सुरक्षा की चिंता और आर्थिक तंगहाली उनके सपनों के आगे दीवार बन जाती है।
लेकिन गया जिला प्रशासन और राज्य सरकार के साझा संकल्प ने इस दीवार को ढहाने का पूरा खाका तैयार कर लिया है।
आगामी 1 जुलाई से गया जिले के उन 7 प्रखंडों— अतरी, नीमचक बथानी, कोंच, मोहड़ा, बांकेबाजार, डुमरिया और मोहनपुर— में 'उत्सवी माहौल' में डिग्री की पढ़ाई शुरू होने जा रही है, जो अब तक उच्च शिक्षा के नक्शे पर हाशिए पर थे।
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर की मैराथन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और तकनीकी विभागों को दिए गए कड़े निर्देश यह बताते हैं कि इस बार सरकार सिर्फ कागजों पर कॉलेज नहीं खोल रही, बल्कि जमीन पर मुकम्मल व्यवस्था खड़ी कर रही है।
'उन्नत शिक्षा-उज्जवल भविष्य':
नारों से आगे बढ़ता सुशासन,
मुख्यमंत्री के 'सात निश्चय-3' कार्यक्रम का चौथा निश्चय "उन्नत शिक्षा-उज्जवल भविष्य"
केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि गया में इसकी तैयारियों को देखकर लगता है कि यह एक प्रशासनिक मिशन बन चुका है।
मगध विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर, नव-नियुक्त प्राचार्यों और सभी 7 बीडीओ (BDO) के साथ जिलाधिकारी की यह समीक्षा बैठक यह साफ करती है कि शिक्षा के बुनियादी ढांचे को लेकर इस बार कोई 'चलता है' वाला रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सबसे सराहनीय बात यह है कि प्रशासन स्थायी भवनों के निर्माण का इंतजार करके समय बर्बाद नहीं कर रहा है।
1 जुलाई से सत्र शुरू करने के लिए अस्थायी भवनों का चयन कर लिया गया है, लेकिन वहां दी जाने वाली सुविधाएं स्थायी जैसी ही होंगी।
क्वालिटी से नो कॉम्प्रोमाइज: एसी, वाई-फाई और सुरक्षा का चक्रव्यूह,
अक्सर सरकारी व्यवस्थाओं में 'अस्थायी' शब्द आते ही लोग मान लेते हैं कि सुविधाएं दोयम दर्जे की होंगी।
लेकिन शशांक शुभंकर के कड़े रुख ने इस धारणा को बदल दिया है।
उन्होंने दोटूक कहा है कि— "कार्यों की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।"
फर्नीचर, कंप्यूटर, हाई-स्पीड वाई-फाई से लेकर वाटर कूलर, आरओ और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था करने का निर्देश यह साबित करता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी वही माहौल देने की कोशिश है जो किसी बड़े शहर के नामचीन कॉलेज में मिलता है।
इसके साथ ही कॉलेज के रास्तों को सुगम बनाना और परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करना, ग्रामीण क्षेत्र की छात्राओं के नामांकन को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाएगा।
"जब समाज की अंतिम कतार में खड़ा युवा अपने ही प्रखंड में कंप्यूटर और वाई-फाई से सुसज्जित कॉलेज में कदम रखेगा, तो वह सिर्फ डिग्री नहीं लेगा, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े होने का आत्मविश्वास भी हासिल करेगा।"
स्थायी समाधान:
जमीन की खोज और प्रशासनिक सजगता,
इस तात्कालिक व्यवस्था के समानांतर जिला प्रशासन दूरगामी सोच के साथ भी काम कर रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में 5 एकड़ और नगर क्षेत्रों में ढाई एकड़ जमीन खोजने की समयबद्ध कार्रवाई यह बताती है कि आने वाले दिनों में इन 7 प्रखंडों के पास अपने भव्य और विशाल कॉलेज परिसर होंगे।
अपर समाहर्ताओं की अध्यक्षता में हर कॉलेज के लिए एक समर्पित कमेटी का गठन और अनुमंडल पदाधिकारियों को खुद भवनों के निरीक्षण का जिम्मा सौंपना नौकरशाही के 'कमांड स्ट्रक्चर' को मजबूत और जवाबदेह बनाता है।
अंतिम निष्कर्ष :
1 जुलाई 2026 की तारीख गया जिले के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रही है।
अतरी से लेकर सुदूर डुमरिया और बांकेबाजार तक के छात्रों को अब उच्च शिक्षा के लिए मीलों दूर भटकने या पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
यह पहल बिहार में 'ड्रॉप-आउट' रेट को कम करने और 'ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो' को बढ़ाने में गेम-चेंजर साबित होगी।
शशांक शुभंकर के नेतृत्व में सम्पूर्ण प्रशासनिक तंत्र की यह तत्परता और प्रतिबद्धता काबिले तारीफ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 1 जुलाई को जब इन कॉलेजों के कपाट खुलेंगे, तो वह सिर्फ एक नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत नहीं होगी, बल्कि गया के ग्रामीण इलाकों में ज्ञान और सशक्तिकरण के एक नए युग का शंखनाद होगा।