rticle)
नौकरशाही की नई परिभाषा:
जब 'फाइलें' नहीं, 'अफसर' पहुंचे जनता के द्वार,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी : बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर अक्सर 'लालफीताशाही' और लेती-देती के आरोप लगते रहे हैं।
आम आदमी को एक छोटे से प्रमाण पत्र या पेंशन के लिए ब्लॉक और अंचल कार्यालयों के अनगिनत चक्कर काटने पड़ते हैं।
लेकिन गया जिले से आई ताजा तस्वीर इस घिसे-पिटे ढर्रे को तोड़ती नजर आ रही है।
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर के नेतृत्व में 28 पंचायतों में आयोजित 'सहयोग शिविर' ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत साफ हो और नेतृत्व सक्रिय, तो लोकतंत्र का असली मतलब 'जनता की सेवा' ही होता है।
फाइलों का अंबार नहीं, सीधे समाधान की रफ्तार,
शिविरों में 8 हजार से अधिक आवेदनों का आना दो बातें साफ करता है।
पहली— ग्रामीण स्तर पर जनता की समस्याएं और प्रशासनिक गैप कितना बड़ा था।
दूसरी— जनता का इस शिविर पर भरोसा। सबसे चौंकाने वाला और सुखद आंकड़ा है 6 हजार मामलों का ऑन द स्पॉट निष्पादन।
"यह सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं है। जब एक बुजुर्ग महिला को ब्लॉक जाए बिना उसकी पंचायत में ही वृद्धावस्था पेंशन का स्वीकृत पत्र मिल जाता है, या किसी किसान का महीनों से अटका म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) चंद घंटों में सुधर जाता है, तो प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास हजार गुना बढ़ जाता है।"
शशांक शुभंकर का 'कमांड एंड कंट्रोल' मॉडल,
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने इस अभियान के जरिए सीधे तौर पर ब्लॉक स्तर के अधिकारियों (BDO, CO) को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है।
अमूमन देखा जाता है कि अधिकारी वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने में कतराते हैं, लेकिन जब खुद जिले का कप्तान मॉनिटरिंग कर रहा हो, तो नीचे का अमला भी पूरी मुस्तैदी से काम करता है।
28 पंचायतों में एक साथ इस तरह का कैंप लगाना और 75% सफलता दर हासिल करना किसी 'प्रशासनिक सर्जिकल स्ट्राइक' से कम नहीं है।
आगे की चुनौती:
क्या यह व्यवस्था स्थायी बनेगी?
गया का यह 'सहयोग शिविर' मॉडल पूरे बिहार के लिए एक नजीर बनना चाहिए।
हालांकि, असली चुनौती इस निरंतरता को बनाए रखने की है।
बाकी 25% का क्या?
जो 2 हजार आवेदन लंबित रह गए हैं, उन पर फीडबैक लूप मजबूत होना चाहिए ताकि जनता को लगे कि उनके बचे हुए काम भी प्रक्रिया में हैं।
भ्रष्टाचार पर लगाम:
जब काम ऑन-द-स्पॉट होगा, तो बिचौलियों (दलालों) का धंधा अपने आप बंद हो जाएगा।
अंतिम निष्कर्ष :
गया जिला प्रशासन का यह कदम सुशासन (Good Governance) की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।
'सहयोग शिविर' ने यह दिखा दिया है कि डिजिटल इंडिया और जमीनी प्रशासन का तालमेल कैसे बैठता है।
शशांक शुभंकर और उनकी टीम इस त्वरित कार्यप्रणाली के लिए बधाई की पात्र है, लेकिन जनता की उम्मीदें अब बढ़ चुकी हैं।
उम्मीद है कि गया का यह 'सफलता का फॉर्मूला' बिहार के अन्य 37 जिलों में भी रीपिट किया जाएगा, ताकि विकास सिर्फ फाइलों में न दौड़े, बल्कि जनता की चौखट पर मुस्कुराए।