बिहार ब्यूरोक्रेसी में महाकंपन: '
दराद' का डंडा और सफेदपोश भ्रष्टाचार पर सबसे बड़ा प्रहार!
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
पटना : बिहार के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नाम की गूंज सबसे ज्यादा है— आईपीएस पंकज कुमार दराद।
एक ऐसा नाम, जिसके जिक्र मात्र से ही सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालयों तक बैठे दागी अफसरों के माथे पर पसीना आ जाता है।
1995 बैच के इस कड़क आईपीएस अधिकारी ने जब से विशेष सतर्कता इकाई (SVU) के एडीजी का पद संभाला है, बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक नए और आक्रामक युग में प्रवेश कर चुकी है।
दो-दो आईएएस (IAS) अधिकारियों का निलंबन इस बात का पुख्ता सबूत है कि अब "फाइलें दबेंगी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों की किस्मत का फैसला करेंगी।"
रसूख का किला ध्वस्त:
कानून के सामने सब बराबर,
बिहार में एक दौर वह भी था जब बड़े अधिकारियों पर हाथ डालने से पहले जांच एजेंसियां दस बार सोचती थीं।
रसूख, पैरवी और राजनीतिक रक्षण के कवच के सहारे भ्रष्ट अफसर खुद को अजेय समझते थे।
लेकिन पंकज कुमार दराद ने अपनी बेदाग छवि और निडर कार्यशैली से इस मिथक को मटियामेट कर दिया है।
उनकी अगुवाई में चल रही जांच का दायरा केवल फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार की जड़ों तक जा रहा है। दो आईएएस अधिकारियों पर हुई कार्रवाई ने राज्य की नौकरशाही को यह स्पष्ट और कड़ा संदेश दे दिया है कि:
"कुर्सी कितनी भी ऊंची हो, पद कितना भी प्रभावशाली हो और प्रतिष्ठा कितनी भी बड़ी हो— कानून के सामने जवाबदेही से ऊपर कुछ भी नहीं है।"
भ्रष्टाचार के खिलाफ 'चेहरा' बने पंकज दराद,
पंकज दराद राज्य और केंद्र, दोनों ही स्तरों पर कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील पदों पर रह चुके हैं।
लेकिन आज उनकी पहचान किसी सरकारी केबिन या पद से नहीं, बल्कि बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे महा-अभियान के 'पोस्टर बॉय' के रूप में बन चुकी है।
समर्थक और आम जनता उनकी इस कार्यशैली की तुलना 'सुपरकॉप' से कर रहे हैं, जिसने सिस्टम की सड़ांध को साफ करने का बीड़ा उठाया है।
विभिन्न विभागों में कथित वित्तीय अनियमितताओं और टेंडरों के खेल पर जिस तरह से SVU ने शिकंजा कसा है, उसने यह साबित कर दिया है कि अगर जांच एजेंसी का मुखिया साफ नीयत और मजबूत रीढ़ वाला हो, तो सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' (भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता) की नीति केवल कागजी नारा नहीं रह जाती, बल्कि जमीन पर उतर आती है।
बड़ा सवाल:
क्या बदलेगा बिहार का प्रशासनिक ढर्रा?
इस वक्त पूरी व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही है— क्या पंकज कुमार दराद की यह मुहिम बिहार की नौकरशाही में एक बड़े और स्थायी प्रशासनिक सुधार की शुरुआत है, या फिर यह भी अतीत की कुछ बड़ी कार्रवाइयों की तरह केवल एक तात्कालिक हेडलाइन बनकर रह जाएगी?
चुनौती बहुत बड़ी है, क्योंकि भ्रष्टाचार का सिंडिकेट बहुत गहरा और आपस में जुड़ा हुआ है।
जब बड़े अधिकारियों पर आंच आती है, तो पूरी लॉबी एकजुट होकर पर्दे के पीछे से जांच को प्रभावित करने और फाइल को ठंडे बस्ते में डलवाने का प्रयास शुरू कर देती है।
अंतिम निष्कर्ष :
एडीजी पंकज कुमार दराद ने अपनी तरफ से लकीर खींच दी है।
उन्होंने यह दिखा दिया है कि एक अकेला अधिकारी भी अगर ठान ले, तो पूरे सिस्टम को हिला सकता है।
दो आईएएस अधिकारियों के निलंबन के बाद अब जनता की नजरें कोर्ट और आगे की कानूनी कार्रवाई पर टिकी हैं।
आने वाला समय तय करेगा कि बिहार की ब्यूरोक्रेसी इस झटके से सुधरती है या फिर पुरानी राह पर लौट जाती है।
लेकिन एक बात तो तय है— पंकज दराद ने बिहार के प्रशासनिक इतिहास में ईमानदारी और निडरता का जो नया अध्याय लिखना शुरू किया है, उसकी धमक बहुत दिनों तक महसूस की जाएगी।
दागी अफसरों की रातों की नींद उड़ चुकी है, और सुशासन का असली मतलब अब जमीन पर दिखने लगा है।