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हज़रत शाह जहांगीर (द्वितीय) मौलाना अब्दुल हयी (क्यू॰एस॰ए॰) का उर्स मुबारक

हज़रत शाह जहांगीर (द्वितीय) मौलाना अब्दुल हयी (क्यू॰एस॰ए॰) का उर्स मुबारक

हम सभी को हज़रत शाह जहांगीर (द्वितीय) मौलाना अब्दुल हयी फख़रुल आरिफीन (क्यूएसए) के उर्स (गुजरने का वार्षिक स्मरणोत्सव) की शुभकामनाएं दे रहे हैं।

हज़रत शाह जहांगीर फख़रुल आरिफीन (क्यूएसए) का जन्म 14 शव्वाल, 1276 हिजरी (6 मई, 1860) को हुआ था। उनके शेख़ और वालिद हज़रत शाह जहाँगीर (I) मौलाना मुख़लिसुर रहमान (QSA) द्वारा उन्हें ज़ाहिर और बातिन दोनों विज्ञानों में पढ़ाया गया था।

अपने वालिद की तरह हज़रत मौलाना अब्दुल हयी (क्यूएसए) ने किशोरी के रूप में आलिया मदरसा में उच्च इस्लामी अध्ययन के लिए कलकत्ता, भारत तशरीफ ले गए । उन्होंने इतनी महनत से अपनी पढ़ायी करी के वे कभी-कभी 7 वर्षों तक बांग्लादेश के चिट्टगोंग घर भी नहीं आया करते।

बाद में उन्होंने लखनऊ, भारत में प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण केंद्र, फेरुंगी-महल में अध्ययन किया। वह अपनी छोटी उम्र के दौरान इतने उत्साही पाठक थे कि उन्हें भारत के पटना में खुदा बख्श पुस्तकालय में सबसे अधिक या सभी किताबें पढ़ने के लिए जाना जाता था। हज़रत मौलाना अब्दुल हयी ( क्यू॰एस॰ए॰) ने एक बार एक ख़्वाब देखा जहाँ हज़रत खिद्र (अलैहिस्सलाम) ने खु़द अपनी राल ए मुबारक उनके मुँह में डाली थी जो एक विशाल ज्ञान को अवशोषित करने के लिए एक तोहफ़ा था।

व्यापक शिक्षा के बाद, हज़रत मौलाना अब्दुल हयी (क्यूएसए) अपने समय के शीर्ष विद्वानों में से एक बन गए। वह फेरुंगीमहल्ली में एक प्रसिद्ध शिक्षक भी थे। उन्होंने अरबी और फारसी दोनों में लगभग 117 रचनाओं की रचना की।

आप अपने घर चिट्टगोंग, बांग्लादेश 45 साल की उम्र में 1312 A.H (1895) में तशरीफ ले आए और अपने वालिद और शेख़, हज़रत मौलाना मुख़लिसुर रहमान (क्यूएसए) के सज्जादा नशीन बन गए क्योंकि पवित्र उत्तराधिकार आपके लौटने से पहले लगभग 20 साल तक ख़ाली था ।

हज़रत मौलाना अब्दुल हयी (क्यूएसए) ने कई चिल्लाह कशी किए और उन्हें अल्लाह की तरफ से "फख़रुल आरिफीन" लक़ब से नवाज़ा गया। वह एक कामिल शेख़ थे और ज़ाहिर और बातिन विज्ञान के उस्ताद थे। उनके अनगिनत करामात थे जो उन्होंने अपने जीवनकाल में छुपा कर रखने का आदेश दिया था। इसके बजाय उन्होंने इस्तिक़ामत को प्रोत्साहित किया और करामात (चमत्कार) को नापसंद किया।चिट्टगोंग में अपने फैज़ और करम फरमायी के लिए वे हर समय लोगों से घिरे रहते थे।

हज़रत मौलाना अब्दुल हयी (क्यूएसए) का 63 वर्ष की आयु में धुल हिज्जा की 17 तारीख को विसाल हो गया। आपकी बारगाह शरीफ बांग्लादेश के चिट्टगोंग में विश्व प्रसिद्ध दरबार मिर्जा़खिल शरीफ में है। आपके दरबार में दुनिया भर से लोग फैज़ ओ बरकात हासिल करने के लिए आते हैं।

दुआ:

दिलको हमारे या खु़दा दे जिंदगी और ताज़गी,
शाह मुहम्मद अब्दुल हयी मक़बूल उद दुआ के वास्ते

सिलसिला-ए-आलिया ख़ुशहालिया!!

(संदर्भ: हज़रत अशरफ जहांगीर सिमनानी (आरए) और उनके आड एंकाउंटर्ज़ सल्तनत-ए-बंगला में : मिर्जा़खिल दरबार शरीफ - एक केस स्टडी, पृष्ठ 29 से 42

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