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दस हजार की रिश्वत और करोड़ों का अविश्वास: आखिर कब बदलेगा राजस्व विभाग का चेहरा?



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

पटना: पूर्णिया के केनगर अंचल में एक राजस्व कर्मचारी के मात्र दस हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार होने की खबर कोई साधारण घटना नहीं है।
यह उस गहरी बीमारी का लक्षण है जो वर्षों से बिहार के राजस्व प्रशासन को खोखला करती चली आ रही है।
सवाल केवल दस हजार रुपये का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक आम नागरिक को अपनी ही जमीन का दाखिल-खारिज कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, फाइलें महीनों धूल खाती रहती हैं और अंततः उसे रिश्वत देने या न्याय छोड़ देने के बीच चुनाव करना पड़ता है।

भ्रष्टाचार की जड़ में बैठा 'दाखिल-खारिज उद्योग'
बिहार में दाखिल-खारिज, परिमार्जन, जमाबंदी और भूमि अभिलेखों से जुड़े कार्य लंबे समय से शिकायतों के केंद्र रहे हैं।
सरकार ने ऑनलाइन प्रणाली लागू की।
डिजिटल पोर्टल बनाए।
समय सीमा निर्धारित की।

लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कई स्थानों पर आज भी फाइल की गति रिश्वत की रकम से तय होती है।
यह गिरफ्तारी साबित करती है कि तकनीक आने के बावजूद मानसिकता नहीं बदली।

एक कर्मचारी नहीं, पूरी व्यवस्था कटघरे में
जब कोई राजस्व कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ा जाता है तो उसे व्यक्तिगत अपराध मानकर मामला बंद कर देना आसान होता है।

लेकिन असली प्रश्न है:
क्या उस कार्यालय में पहले कभी शिकायत नहीं हुई?
क्या अधिकारियों को भ्रष्टाचार की भनक नहीं थी?
क्या निगरानी विभाग के पहुंचने तक स्थानीय प्रशासन पूरी तरह अनजान था?
यदि उत्तर "हाँ" है तो यह प्रशासनिक विफलता है।
यदि उत्तर "नहीं" है तो यह प्रशासनिक मिलीभगत का संकेत है।
दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।
जनता के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, जीवन है
एक किसान के लिए जमीन उसकी रोजी-रोटी है।
एक गरीब परिवार के लिए जमीन उसकी सामाजिक पहचान है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए जमीन उसकी जीवन भर की जमा पूंजी है।

जब इसी जमीन के कागजात दुरुस्त कराने के लिए रिश्वत मांगी जाती है तो केवल पैसा नहीं लिया जाता, नागरिक का सम्मान भी छीना जाता है।
निगरानी विभाग की कार्रवाई स्वागतयोग्य
इस मामले में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई सराहनीय है।
शिकायत का सत्यापन करना, ट्रैप बिछाना और आरोपी को रंगे हाथ पकड़ना यह दर्शाता है कि यदि नागरिक साहस दिखाए तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई संभव है।
लेकिन केवल गिरफ्तारी से समस्या समाप्त नहीं होगी।
जरूरत है:
विभागीय जवाबदेही तय करने की,
सम्पत्ति की जांच करने की,
और यह पता लगाने की कि क्या यह रिश्वतखोरी का अकेला मामला था या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा।
बिहार सरकार के लिए चेतावनी
मुख्यमंत्री बार-बार सुशासन और पारदर्शिता की बात करते हैं।
लेकिन जब जमीन से जुड़े विभागों में रिश्वतखोरी की खबरें लगातार आती हैं तो यह सुशासन की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
सरकार को चाहिए कि:
प्रत्येक अंचल कार्यालय का विशेष ऑडिट कराया जाए।
दाखिल-खारिज मामलों की रैंडम जांच हो।
लंबित मामलों की सार्वजनिक सूची जारी की जाए।
रिश्वत शिकायतों के लिए स्वतंत्र हेल्पलाइन सक्रिय की जाए।
दोषी कर्मियों की संपत्ति की जांच की जाए।

अंतिम प्रश्न
पूर्णिया में एक कर्मचारी दस हजार रुपये लेते पकड़ा गया।
लेकिन क्या केवल वही दोषी है?
या फिर वह उस विशाल भ्रष्ट तंत्र की एक छोटी कड़ी है जिसने आम नागरिक को सरकारी कार्यालयों के सामने बेबस बना रखा है?

जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक हर गिरफ्तारी के बाद एक नया आरोपी मिलेगा, लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ें जस की तस बनी रहेंगी।

दस हजार रुपये की यह रिश्वत केवल एक कर्मचारी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर आरोपपत्र है जो नागरिकों को उनका वैध अधिकार पाने के लिए भी कीमत चुकाने पर मजबूर करती है।

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