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20 हजार की रिश्वत और करोड़ों की बदनामी: आखिर कब सुधरेगा भ्रष्टाचार का बिजली तंत्र?



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

पटना: बिहार में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई की खबरें अब इतनी सामान्य हो गई हैं कि समाज चौंकना भी भूलता जा रहा है।
लेकिन बांका जिले के रजौन विद्युत कार्यालय में सहायक विद्युत अभियंता की कथित रिश्वतखोरी में गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
जब एक इंजीनियर, जिसे जनता की सेवा और व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी दी गई हो, वही जनता से सुविधा शुल्क मांगने लगे, तब समस्या किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि व्यवस्था की हो जाती है।

सवाल केवल 20 हजार का नहीं है,
बहुत लोग कहेंगे कि मात्र 20 हजार रुपये की रिश्वत पर इतनी चर्चा क्यों?

असल सवाल रकम का नहीं है।
सवाल यह है कि यदि एक सामान्य दुकानदार को अपने वैध कार्य के लिए भी रिश्वत देनी पड़े तो कानून और शासन की उपयोगिता क्या रह जाती है?

एक गरीब व्यापारी, किसान या मजदूर के लिए 20 हजार रुपये महीनों की कमाई हो सकती है।
जिस अधिकारी का वेतन सरकार लाखों रुपये सालाना दे रही है, यदि वही जनता को लूटने लगे तो यह नैतिक दिवालियापन है।

बिजली विभाग क्यों बन रहा है शिकायतों का केंद्र?
देशभर में बिजली विभाग लंबे समय से शिकायतों के घेरे में रहा है।

शिकायतें अक्सर इन मुद्दों से जुड़ी होती हैं:
नया कनेक्शन,
मीटर जांच,
बिल सुधार,
जुर्माना निर्धारण,
अवैध उपभोग के मामले,
ट्रांसफार्मर और लाइन मरम्मत,
इन प्रक्रियाओं में अत्यधिक विवेकाधिकार होने के कारण भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ जाती है।

जब तक प्रक्रियाएं पूर्णतः डिजिटल और पारदर्शी नहीं होंगी, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे।
निगरानी विभाग की सफलता, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने ट्रैप कर गिरफ्तारी की।
यह सराहनीय है।
लेकिन एक बड़ा प्रश्न यह भी है—
क्या केवल गिरफ्तारी से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा?
यदि हर महीने कोई न कोई अधिकारी रंगे हाथ पकड़ा जा रहा है तो इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार की जड़ें अभी भी बहुत गहरी हैं।
सफलता केवल गिरफ्तारी नहीं है।
सफलता तब होगी जब रिश्वत मांगने का साहस ही कोई अधिकारी न कर सके।

जनता की मजबूरी, भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ताकत
अक्सर लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते।
कारण स्पष्ट हैं—
प्रताड़ना का डर,
काम रुक जाने की आशंका,
प्रशासनिक दबाव,
लंबी कानूनी प्रक्रिया,
इसी डर का लाभ भ्रष्ट अधिकारी उठाते हैं।
इस मामले में शिकायतकर्ता ने साहस दिखाया।
ऐसे नागरिक ही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत हैं।
सरकार को क्या करना चाहिए?
इस घटना के बाद केवल विभागीय निलंबन पर्याप्त नहीं होगा।
सरकार को चाहिए कि:
बिजली विभाग की सभी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करे।
प्रत्येक आवेदन की डिजिटल ट्रैकिंग हो।
रिश्वत मांगने पर तत्काल शिकायत के लिए हेल्पलाइन सक्रिय हो।
अधिकारियों की संपत्ति की नियमित जांच हो।
भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
रजौन में हुई यह गिरफ्तारी एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें कुछ लोग सरकारी पद को जनसेवा नहीं बल्कि निजी कमाई का साधन समझ बैठते हैं।
यदि बिहार को विकसित राज्य बनना है तो सड़क, बिजली और पानी से पहले प्रशासनिक ईमानदारी को मजबूत करना होगा।

20 हजार रुपये की यह कथित रिश्वत शायद छोटी रकम लगे, लेकिन इसने करोड़ों रुपये की सरकारी साख को नुकसान पहुंचाया है।
और जब जनता का विश्वास टूटता है, तब सबसे बड़ी कीमत लोकतंत्र को चुकानी पड़ती है।

"भ्रष्टाचार की असली हार तब होगी जब रिश्वत लेने वाला नहीं, रिश्वत मांगने का विचार भी डरने लगे।

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