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जनता दरबार की भीड़: सुशासन का उत्सव या निचले प्रशासन की नाकामी का प्रमाण?



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

गया समाहरणालय में 1 जून 2026 को आयोजित जनता दरबार की तस्वीरें दो बिल्कुल अलग-अलग संदेश देती हैं।
पहली नजर में यह दृश्य एक संवेदनशील और सक्रिय प्रशासन का प्रतीक दिखाई देता है, जहां जिलाधिकारी शशांक शुभंकर स्वयं आम जनता की समस्याएं सुन रहे हैं, अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं और त्वरित समाधान की पहल कर रहे हैं।
लोकतंत्र में इससे बेहतर तस्वीर क्या हो सकती है कि जिले का सर्वोच्च अधिकारी सीधे जनता से संवाद कर रहा हो?
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू कहीं अधिक चिंताजनक है।
सवाल यह नहीं है कि जिलाधिकारी ने कितने लोगों की समस्याएं सुनीं। असली सवाल यह है कि आखिर सौ से अधिक लोगों को अपनी शिकायत लेकर जिला मुख्यालय तक आने की नौबत क्यों आई?
जनता दरबार की भीड़ ही सबसे बड़ा आरोप-पत्र
जब कोई बुजुर्ग अपनी पेंशन के लिए, कोई गरीब अपने आवास के लिए, कोई किसान अपनी जमीन के विवाद के लिए और कोई छात्र अपनी शिक्षा संबंधी समस्या के लिए जिला मुख्यालय पहुंचता है, तो वह केवल एक आवेदन नहीं देता, बल्कि वह स्थानीय प्रशासन की विफलता का प्रमाण-पत्र भी साथ लेकर आता है।

यदि पंचायत सचिव, राजस्व कर्मचारी, अंचलाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी और स्थानीय थाने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन समय पर और निष्पक्षता से कर रहे होते, तो जनता दरबार के बाहर इतनी लंबी कतारें दिखाई ही नहीं देतीं।
जनता दरबार में उमड़ती भीड़ दरअसल उन फाइलों की कहानी कहती है जो महीनों तक प्रखंड कार्यालयों में धूल फांकती रहती हैं।
यह उन गरीबों की पीड़ा का दस्तावेज है जिन्हें अपने अधिकार पाने के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों की चौखट पर माथा टेकना पड़ता है।

क्या जिला मुख्यालय ही न्याय का अंतिम ठिकाना है?
लोकतांत्रिक प्रशासन की मूल अवधारणा विकेंद्रीकरण पर आधारित है। सरकार गांव तक इसलिए पहुंचाई गई थी ताकि लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जिला मुख्यालय का रुख न करना पड़े।
लेकिन आज स्थिति यह है कि कई प्रखंड कार्यालय शिकायत निवारण केंद्र कम और शिकायत उत्पादन केंद्र अधिक बनते जा रहे हैं।

अगर भूमि विवाद का समाधान सीओ नहीं कर पा रहे, यदि सामाजिक सुरक्षा पेंशन की समस्या बीडीओ स्तर पर नहीं सुलझ रही, यदि आवास योजना की अनियमितताओं पर पंचायत स्तर पर कार्रवाई नहीं हो रही, तो यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं बल्कि जवाबदेही के संकट का संकेत है।

"ऑन द स्पॉट" समाधान या अस्थायी मरहम?
जनता दरबार में दिए गए निर्देश निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। जिलाधिकारी की सक्रियता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर सप्ताह या हर महीने जनता दरबार लगाकर समस्याओं का समाधान किया जा सकता है?
यह व्यवस्था बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि उसके लक्षणों पर लगाया गया अस्थायी मरहम है।
जब तक निचले स्तर के अधिकारियों की कार्यशैली में सुधार नहीं होगा, तब तक जनता दरबार में आने वालों की संख्या कम नहीं होगी। एक जिलाधिकारी दिन भर में सौ आवेदन सुन सकते हैं, लेकिन यदि प्रखंड स्तर पर हजारों समस्याएं लंबित हैं तो समाधान की यह गति अपर्याप्त साबित होगी।
आंकड़ों का विश्लेषण बने प्रशासनिक सुधार का आधार
गया जिला प्रशासन के पास जनता दरबार से प्राप्त शिकायतों का बहुमूल्य डेटा उपलब्ध है। आवश्यकता इस बात की है कि इसका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए।
किस प्रखंड से सबसे अधिक शिकायतें आईं?
किस विभाग के खिलाफ सबसे ज्यादा आवेदन मिले?
किन अधिकारियों के क्षेत्राधिकार में समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं?
कितने मामलों में पहले भी शिकायतें दर्ज हुई थीं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाएं तो प्रशासनिक सुधार की दिशा स्वतः स्पष्ट हो जाएगी।
केवल निर्देश देने से व्यवस्था नहीं बदलती; जवाबदेही तय करने और लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई करने से बदलाव आता है।
सुशासन का असली पैमाना क्या है?
सरकारें अक्सर जनता दरबार में प्राप्त आवेदनों और उनके निपटारे की संख्या को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन सुशासन का वास्तविक पैमाना यह नहीं है।
सुशासन तब होगा जब:
पेंशन लाभार्थी को आवेदन के लिए चक्कर न लगाना पड़े।
किसान का भूमि विवाद स्थानीय स्तर पर सुलझ जाए।
आवास योजना का लाभ बिना सिफारिश और रिश्वत के मिल जाए।
नागरिक को अपनी समस्या लेकर जिला मुख्यालय की यात्रा ही न करनी पड़े।
जनता दरबार की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण अगले जनता दरबार में कम होती भीड़ होगी।
निष्कर्ष: न्याय दरबार में नहीं, व्यवस्था में दिखना चाहिए
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर की पहल निश्चित रूप से सराहनीय है। उनकी संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई की इच्छा प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। लेकिन एक स्वस्थ प्रशासनिक व्यवस्था का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि जिलाधिकारी अधिक से अधिक शिकायतें सुनें।
लक्ष्य यह होना चाहिए कि शिकायतें उत्पन्न ही कम हों।
जिस दिन पंचायत, प्रखंड और अंचल स्तर पर समस्याओं का समाधान होने लगेगा, उस दिन जनता दरबार की भीड़ स्वतः कम हो जाएगी। और वही दिन सुशासन की वास्तविक जीत का दिन होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि जनता दरबार तक पहुंचे, बल्कि यह है कि न्याय जनता के दरवाजे तक पहुंचे।

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