पंजाब सरकार की DA पर "सील बंद रिपोर्ट" का सच: डॉ. दलेर सिंह मुल्तानी
पटियाला, जून (विक्की हरिंदर पाल): महंगाई को लेकर कई सरकारें बनीं और गिरीं, पर आज पंजाब में महंगाई भत्ते DA को लेकर कर्मचारियों, सियासत, कोर्ट और अफवाहों का बाजार गर्म है। कई मीडिया रिपोर्ट तो यहां तक कह रही हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा DA ही होगा।वैसे DA बड़ा मुद्दा होना भी चाहिए। नेता महंगाई बढ़ने पर खूब शोर मचाते हैं, पर DA देने की बारी आते ही सरकारों का खजाना "संकट" में चला जाता है।सील बंद रिपोर्ट में क्या है?
पिछली 2-3 सरकारों की टाल-मटोल ने हालात यहां पहुंचा दिए कि कर्मचारी-पेंशनर अब कोर्ट में इंसाफ मांग रहे हैं। जबकि DA उनका बुनियादी हक है, कोई खैरात नहीं।18% DA न देने के पंजाब सरकार के फैसले के खिलाफ कर्मचारी-पेंशनर कोर्ट में केस लड़ रहे हैं। कोर्ट ने फैसला कर्मचारियों के हक में किया हुआ है, पर सरकार DA न देने के लिए हर तरीका आजमा रही है।25.5.2026 को सरकार ने हाई कोर्ट में एक "सील बंद रिपोर्ट" पेश करके सबकी धड़कनें बढ़ा दी थीं। अब रिपोर्ट सामने आई है।
पूरे निरीक्षण से पता चलता है कि सरकार ने कुछ कैडरों की "पे एनॉमली" को आधार बनाकर DA लेट/न देने के लिए कोर्ट से समय मांगा है।डॉ. मुल्तानी के 5 तीखे सवाल:पे एनॉमली vs DA: अगर पे एनॉमली है तो सरकार अपने स्तर पर सुधार करे। पे एनॉमली के नाम पर सभी कर्मचारियों-पेंशनरों के DA में भेदभाव क्यों? DA महंगाई भत्ता है जो रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालता है, जबकि पे एनॉमली प्रशासनिक गलती है।भेदभाव का आरोप: सरकार IAS, IPS, IFS को पंजाब के खजाने से सेंटर के बराबर DA दे रही है, पर बाकी कर्मचारियों को नहीं। ये सीधा Article 14 का उल्लंघन है - "सबके लिए समानता"।
इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल केरल सरकार vs पेंशनर केस में भेदभाव को पेंशनरों के हक में माना था।आधे-अधूरे आंकड़े: सरकार 2 दिन की मीटिंग में सिर्फ 4 कर्मचारी कैडर की पे एनॉमली का आंकड़ा कोर्ट को दे रही है। जबकि सरकार के सैकड़ों कैडर हैं जिनकी सैलरी सेंटर से कम या बराबर है।
वहां सेंटर बराबर DA न देने का कोई तर्क नहीं बचता।खजाना खाली, पर खर्चे पूरे?: सरकार अपनी वित्तीय स्थिति को "दयनीय" बता रही है, तो फिर मुफ्त सुविधाओं के लिए कर्ज क्यों ले रही है? वो भी ऐसी मुफ्त सुविधाएं जो किसी ने मांगी तक नहीं थीं। सैकड़ों सलाहकारों की मोटी तनख्वाह, 5-सितारा होटलों/घरों में चहेतों को बैठाना, रोज करोड़ों के विज्ञापन... खजाना खाली कैसे?वादा vs हकीकत: चुनाव से पहले AAP ने कर्मचारियों से वादा किया था - पे कमिशन पूरी तरह लागू करेंगे, सबको समान वेतन देंगे। फिर अब भेदभाव क्यों? पे एनॉमली साढ़े 4 साल बाद क्यों याद आई? वो भी सिर्फ 3-4 ग्रुप-C कैडर में। बाकी सैकड़ों कैडर पर चुप क्यों?
डॉ. मुल्तानी का खुला चैलेंज:
अगर सरकार कोर्ट को ये संतुष्ट कर दे कि रोज इस्तेमाल होने वाले सरकारी हवाई जहाज का खर्चा और वो कहां-कहां जाता है, उसका पूरा हिसाब दे, तो कर्मचारी-पेंशनर सरकार के वित्तीय संकट को सच मानकर DA की किस्तों के लिए और इंतजार कर लेंगे।अंत में चेतावनी:
कर्मचारियों-पेंशनरों को आधी-अधूरी और रोज बदलती खबरों से डरना नहीं चाहिए। सरकार के पास DA देने के अलावा कोई चारा नहीं - "बकरी की मां कब तक खैर मनाएगी"। पिछली सरकारों के नेता जो आज "मगरमच्छ के आंसू" बहा रहे हैं, वो भी आज के हालात के बराबर जिम्मेदार हैं।