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*आपकी करतूतों के ही नतीजे तो सामने आ रहे हैं जनाब!* *(आलेख : नीलोत्पल बसु)*

*प्रकाशनार्थ*

*आपकी करतूतों के ही नतीजे तो सामने आ रहे हैं जनाब!*
*(आलेख : नीलोत्पल बसु)*

उत्तर-सत्य या पोस्ट ट्रुथवाली दुनिया की समस्या यह है कि इसकी एक एक्सपायरी डेट जरूर होती है। एक लंबे समय के लिए तो सच्चाई पर मुलमा चढ़ाकर उसे छुपाया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए ऐसा नहीं हो सकता। अंतत: सच्चाई की जीत होती है। ऐसा लगता है कि हम वहां तक पंहुच गए हैं, जब सच्चाई की जीत दिखाई देने लगी है। इसके संकेत खुद प्रधानमंत्री द्वारा दिए जा रहे थे, जब उन्होंने सीधे साफ शब्दों में भारतीय नागरिकों को ''अपनी कमर की पेटी कसने" की जरूरत पर जोर दिया। यह एक तरह का ''कटौतियों का पैकेज" ही है।

लेकिन इसका सबसे भयानक प्रदर्शन कहीं दूर, स्केंडिनेविया में सामने आया। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा की पूर्व-संध्या में भारतीय लोकतंत्र की गहन रूप से चिंताजनक स्थिति को, उसकी निरंतर बिगड़ती जा रही प्रेस की स्वतंत्रता को और उसकी धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी के मानवाधिकारों की स्थिति को बयान किया। लेकिन मोदी को निर्णायक झटका तब मिला, जब नार्वे के रिपोर्टरों ने सीधे-सीधे भारतीय प्रधानमंत्री से यह सवाल कर दिया कि वे मीडिया को आमंत्रित किए जाने के बाद भी प्रेस कान्फ्रेंस में सवाल क्यों नहीं ले रहे।

यह न सिर्फ प्रधानमंत्री और उनके शासन की साख के लिए एक झटका था, बल्कि यह एक ऐसा सवाल था, जो समाज और लोकतंत्र को जीवंत बनानेवाले आलोचनात्मक सवालों से बचने तथा उन्हें टालने के लिए कार्पोरेट के नेतृत्ववाले मीडिया का पूरी तरह से संस्थानीकरण किए जाने के जरिए मजे कर रही पोस्ट ट्रुथ की दुनिया को भी परेशान करेगा। भारतीय विदेश मंत्रालय की सारी मुलम्मेबाजी भी कुछ सवालों को टाल नहीं सकती। यह सब बहुत दूर ओस्लो में हुआ, जिसने ''गद्दारों" या ''देशद्रोहियों" के जाने-पहचाने आरोप लगा कर, इस तरह के लोगों को बदनाम करने के काम को मुश्किल बना दिया।

इस्राइली-अमरीकी सैन्य हमले और ईरान द्वारा इसका जायज जवाब दिए के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा की सप्लाई लाइन पूरी तरह से ठप्प होकर रह गयी है और यह बात साफ नजर आती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मोदी द्वारा अपने तथाकथित मित्र डोनाल्ड ट्रंप की बार-बार जफियां लिए जाने और इस सैन्य हमले की तैयारी के वक्त नेतन्याहू के साथ पूर्ण मित्रता कायम करने और निरंतर अमरीकी-इस्राइली धुरी के साथ बने रहने के बावजूद, सैन्य टकराव की दिशा बदलने के प्रयासों में भारत की कूटनीति को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। गुटनिरपेक्ष दुनिया के नेता के रूप में भारत की पूर्ववर्ती प्रतिष्ठा को ताक पर रखे जाने के बाद, अब भारत तेल अवीव तथा वाशिंगटन का पक्ष ले रहा है, जबकि उधर पाकिस्तान ने कूटनीतिक ढ़ंग से गतिरोध को खत्म करने के लिए वार्ताकारों में से एक बनने का रास्ता ढूंढ़ लिया है।

जो चीज हमारे लिए, करोड़ों भारतवासियों के लिए स्थिति को कहीं ज्यादा खतरनाक बनाती है, वह है संकट -- जिसको नकारा नहीं जा सकता -- के प्रभाव के बोझ को लोगों पर डालने की प्रधानमंत्री की कोशिश। इस तरह वे इस संकट से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। मोदी कोविड तथा युद्ध के संकट को देश की जनता पर थोप रहे हैं। सिर्फ अकेले विपक्ष की ही बात नहीं है, बल्कि इस संकट का गंभीर विश्लेषण उनके इस औचित्य को तार-तार करके रख देता है। वास्तव में भारत का मौजूदा आर्थिक संकट खुद मोदी के नेतृत्ववाली सरकार की नीतियों को आईना दिखा रहा है। आक्रामक नव-उदारवादी हमलों ने मेहनतकश अवाम के बड़े हिस्से की आय तथा बचतों को घटा दिया है। कार्पोरेट हितों के सामने पूरी तरह से घुटने टेक देने के चलते दरबारी पूंजीवाद के अभूतपूर्व स्तर सामने आए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को खत्म करने और उन्हें तथा प्राकृतिक संसाधानों को इन्हीं कार्पोरेट घरानों के हवाले किए जाने के चलते, इस सबने घरलू मांग तथा क्रय शक्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

*परिणाम आंखें खोलनेवाले हैं।* असमानता अभूतपूर्व स्तर पर पंहुच गयी है और बेरोजगारी का स्तर आसमान छू रहा है। ताजातरीन वर्ष 2026 की विश्व असमानता रिपोर्ट में बड़े भयंकर किस्म के आंकड़े सामने आए हैं, जो यह दिखाते हैं कि भारत में आय तथा संपत्ति कितने तीखे ढ़ंग से विभाजित है। सबसे ऊपर के 10 फीसद लोग सारी आमदनी का 58 फीसद ले जाते हैं, जबकि सबसे नीचे के 50 फीसद लोगों को संपूर्ण आय का सिर्फ 15 फीसद ही मिलता है। संपत्ति की स्थिति तो और ज्यादा विषमतापूर्ण है। सबसे अमीर 10 फीसद लोगों के पास कुल दौलत का करीब 65 फीसद हिस्सा है और सबसे ऊपर के 1 फीसद लोगों के पास करीब 40 फीसद हिस्सा है। इसी तरह के निष्कर्ष थॉमस पिकेट्टी तथा अन्य की अगुवाई वाली वर्ल्ड इन-ईक्वेलिटी लैब के भी हैं। पोस्ट ट्रुथ के इस गुणगान के बावजूद कि भारत दुनिया की चौथी सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है और इससे भी मजेदार यह दावा कि भारत दूसरी सबसे ''समतापूर्ण अर्थव्यवस्था" है, यह सारी बातें अब जनाब मोदी और उनके कार्पोरेट-मीडिया समर्थकों को परेशान करने लगी हैं और वे हिले हुए हैं।

यहां अर्थव्यवस्था की कुछ जमीनी सच्चाइयों को समझ लेना चाहिए। अगर मुनाफे नहीं कमाए जा सकते, तो चाहे कितना ही प्रचार कर लो, निवेश नहीं आएंगे। और मुनाफे सिर्फ तभी कमाए जा सकते हैं, जब चीजें बिकेंगी। और बिना मांग के न तो चीजें बिक सकती हैं और न ही मुनाफे कमाए जा सकते हैं। और इस सच की बड़े ही तीखे ढ़ंग से वापसी हो रही हैं। सामने खड़े संकट के कुछ ताजातरीन लक्षण इस रूप में सामने आ रहे हैं कि विदेशी संस्थागत निवेशक बड़ी तेजी से वापस जा रहे हैं। वे भारी हड़बड़ी में भारतीय पूंजी बाजार से अपने निवेश समेट रहे हैं। यही चीज तो अमरीकी डॉलर के सामने भारतीय रुपए के तेजी से कमजोर पड़ते जाने के रूप में सामने आ रही है।

सिर्फ एफआइआइ का ही नहीं, जो अपनी परिभाषा से ही बड़े चंचल होते हैं और फौरी लाभ की तरफ भागते हैं, बल्कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) का भी, जो दीर्घकालिक विकास के लिए ज्यादा अच्छा इनपुट माना जाता है, भारत से पलायन हो रहा है। इतना ही नहीं, अभी भारत में आने वाले एफडीआइ की स्थिति भी नकारात्मक है। अपने पसंदीदा कार्पोरेट घरानों के लिए चाहे कितनी ही कर माफी की जा रही हो, लेकिन यह कर माफी भी भारत में निवेशों को बचा नहीं पा रही है, क्योंकि बाहर मुनाफे के बेहतर अवसरों पर उनकी नजर है।

यहां तक कि मोदी के गोदी पूंजीपति अडानी ने भी भारी भरकम जुर्माना चुका कर अमरीकी सिक्योरिटी एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) के साथ समझौता कर लिया है। इसके अलावा दस अरब डॉलर के निवेश और 15,000 रोजगार सृजित करने की पेशकश करने के जरिए, उसने ट्रंप तथा उनके रिपब्लिकन सहयोगियों के साथ भी समझौता कर लिया है। यह कोई नहीं जानता कि क्या सचमुच रूस और ईरान से सस्ता कच्चा तेल और गैस खरीदना बंद करने और कहीं ज्यादा महंगा अमरीकी तेल खरीदने की ट्रंप की मांग के सामने घुटने टेकने की खुद मोदी की पेशकश से, इस समझौते की राह खुली है। एक और कयास यह भी लगाया जा रहा है कि कहीं ''टैरिफ टैरर" के सामने घुटने टेकना भी इस डील का हिस्सा तो नहीं है।

कुल मिलाकर कच्चे तेल के रणनीतिक भंडारण का निर्माण करने में मोदी सरकार की विफलता के चलते, युद्ध का प्रभाव इतना भयावह दिखायी दे रहा है। चीन ने जहां अप्रैल 2020 में ही 1.4 अरब बैरल कच्चा तेल हासिल कर लिया था, जब कच्चे तेल की कीमत 20 डालर प्रति बैरल चल रही थी, वहीं भारत के पास सिर्फ 4 करोड़ बैरल कच्चा तेल ही है। इसका अर्थ यह है कि भारत का कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार, चीन के भंडार का सिर्फ 2.85 फीसद है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच मोदी सरकार ने लोगों से तेल पर अतिरिक्त कर के रूप में 40 लाख करोड़ रुपये एकत्रित किए। यह वह वक्त था, जब घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन घट रहा था। इसके फलस्वरूप, भारत की आयात निर्भरता जो (वर्ष 2010 से 2014 तक) 78 फीसद होती थी, अब बढ़कर 90 फीसद हो गयी है। भंडारण के न्यूनतम रहने के साथ आयातों के विविधिकरण में विफलता ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। पिछले 12 वर्षों से भौतिक तथा सामाजिक संरचनाओं में निवेश की विफलता ने देश की आबादी को अभूतपूर्व तकलीफों में ही धकेला है।

हिंदुत्व की विभाजनकारी मुहिम इसमें कोई मदद नहीं करनेवाली। पोस्ट ट्रुथ की दीदादिलेरी तो और ज्यादा बेकार साबित होगी। अब सच्चाई को स्वीकार करने का वक्त आ गया है। सरकार को फौरन एक श्वेतपत्र लेकर सामने आना चाहिए, जिसमें ठीक-ठाक सा आत्मनिरीक्षण हो, चीजों को ठीक करने की बात हो और कुछ हद तक राष्ट्रीय आम राय बनाने की बात हो।

*(लेखक माकपा पोलिट ब्यूरो के सदस्य, पीपुल्स डेमोक्रेसी के संपादक और राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)*

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
*District President*
*Delhi Crime Press*
RNI NO : DELHIN/2005/15378
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*INDIAN PRESS UNION*
District Reporter
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