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मसूरी में गहराया पेयजल संकट: व्यापारी, होटल व्यवसायी और स्थानीय लोग चिंतित

करोड़ों की योजना, बढ़ती मांग और खाली नल—क्या मसूरी अपनी क्षमता की सीमा को छूने लगी है?

मसूरी। पर्यटन सीजन के चरम पर खड़ी मसूरी इन दिनों पेयजल संकट से जूझ रही है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों—कुलड़ी, हैम्पटन कोर्ट, लैंडौर तथा कैंट क्षेत्र—से बीते कई दिनों से पानी की कमी की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में जलापूर्ति बाधित रही, जबकि कुछ स्थानों पर पानी का दबाव बेहद कम रहा। कई परिवारों को पानी का इंतजार करना पड़ा और कुछ को वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ा।

पेयजल संकट को लेकर असंतोष बढ़ने पर मसूरी व्यापार मंडल ने उत्तराखंड जल संस्थान कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन कर घेराव किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व मसूरी व्यापार मंडल अध्यक्ष एवं भाजपा मसूरी मंडल अध्यक्ष रजत अग्रवाल ने किया। रजत अग्रवाल ने आरोप लगाया कि जल संस्थान और जल निगम के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा आम जनता, व्यापारियों और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भीषण गर्मी और पर्यटन सीजन के दौरान होटल, रेस्टोरेंट और अन्य प्रतिष्ठान पानी के टैंकरों पर निर्भर होने को मजबूर हैं, जिससे आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।

इसी बीच होटल एसोसिएशन ऑफ मसूरी ने भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और संबंधित कैबिनेट मंत्री को ज्ञापन भेजकर समस्या के शीघ्र समाधान की मांग की है। होटल व्यवसायियों का कहना है कि पर्यटन सीजन के दौरान पानी की कमी से न केवल स्थानीय कारोबार प्रभावित हो रहा है, बल्कि पर्यटकों के सामने भी असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न हो रही है। उनका मानना है कि यदि मूलभूत सुविधाएं प्रभावित होती हैं तो इसका सीधा असर मसूरी की पर्यटन छवि पर पड़ सकता है।

वहीं कांग्रेस नेता एवं पूर्व पालिकाध्यक्ष अनुज गुप्ता ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए लगभग 144 करोड़ रुपये की लागत वाली यमुना–मसूरी पेयजल योजना पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना के बावजूद स्थानीय लोगों और पर्यटकों को कई दिनों तक पानी की किल्लत झेलनी पड़ रही है। उन्होंने सरकार और संबंधित विभागों से जवाबदेही तय करने की मांग की है।

दूसरी ओर, अधिकारियों द्वारा बिजली आपूर्ति में बाधा, आंधी-तूफान से प्रभावित पंपिंग व्यवस्था तथा तकनीकी कारणों को संकट की प्रमुख वजह बताया जा रहा है। हाल ही में आए तेज तूफान और हवाओं के कारण कई स्थानों पर विद्युत लाइनों को नुकसान पहुंचा, जिससे पंपिंग व्यवस्था प्रभावित हुई और जलापूर्ति पर असर पड़ा। जल विभाग का कहना है कि समस्या का मुख्य कारण यही व्यवधान रहा है तथा व्यवस्था को सामान्य करने के प्रयास लगातार जारी हैं। विभाग ने आश्वासन दिया है कि जलापूर्ति में सुधार होगा और पानी की कमी जल्द दूर कर दी जाएगी।

हालांकि अब यह मुद्दा केवल कुछ दिनों की पेयजल समस्या तक सीमित नहीं दिखाई देता। एक ओर स्थानीय लोग पानी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, दूसरी ओर व्यापारी धरना दे रहे हैं, होटल एसोसिएशन मुख्यमंत्री तक अपनी चिंता पहुँचा रही है और विपक्ष जवाब मांग रहा है। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब मसूरी वर्ष के सबसे व्यस्त पर्यटन सीजन से गुजर रही है।

यहीं से यह कहानी कुछ बड़ी हो जाती है।

मसूरी लंबे समय से ट्रैफिक जाम, पार्किंग संकट, बढ़ते निर्माण और संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। अब पानी का संकट भी उसी बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। वर्षों से विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् मसूरी की "कैरींग कैपेसिटी" अर्थात वह सीमा, जिसके भीतर एक पर्वतीय नगर अपने संसाधनों के साथ संतुलन बनाए रख सकता है, पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं।

आज वह बहस शायद सड़कों से निकलकर नलों तक पहुँच गई है।

विडंबना यह है कि जिस मसूरी की पहचान कभी उसके प्राकृतिक झरनों, बावड़ियों और जलस्रोतों से थी, वही शहर आज पानी को लेकर चिंतित दिखाई देता है। कुलड़ी से लेकर लैंडौर तक लोगों के बीच एक ही चर्चा है—पानी कब आएगा?

फिलहाल प्रशासन और संबंधित विभागों की चुनौती जलापूर्ति को जल्द से जल्द सामान्य करना है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा कर दिया है—क्या समस्या केवल कुछ दिनों की आपूर्ति बाधित होने की है, या फिर यह संकेत है कि मसूरी की आधारभूत संरचना पर दबाव लगातार बढ़ रहा है?

इस प्रश्न का उत्तर आने वाले दिनों में विभागीय रिपोर्टें और प्रशासनिक कदम देंगे। लेकिन इतना स्पष्ट है कि पानी का यह संकट केवल नलों में नहीं, बल्कि मसूरी के भविष्य को लेकर चल रही एक बड़ी बहस में भी बह रहा है।

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