logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

क्षमा का वैभव


राजस्थान की धरती पर बसे एक राज्य के राजा नंदा कस्वां अपनी वीरता और न्याय प्रियता के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध थे। प्रजा उन्हें साहसी शासक मानती थी परंतु उनका स्वभाव थोड़ा तेज था। दरबार में अनुशासन की बड़ी महत्ता थी और छोटी सी भूल पर भी दंड मिल जाया करता था। एक दिन दोपहर का समय था,राज महल में भव्य भोजन की व्यवस्था की गई थी। सोने चाँदी के थालों में व्यंजन परोसे जा रहे थे। स्वयं राजा नंदा कस्वां सिंहासन समान आसन पर बैठकर भोजन कर रहे थे। पास ही उनका एक सेवक अत्यंत श्रद्धा और समर्पण से भोजन परोस रहा था।

वह सेवक कई वर्षों से महल में सेवा कर रहा था और राजा के प्रति उसकी निष्ठा अटूट थी । अचानक जैसे ही वह सब्जी का बर्तन उठाकर भोजन परोसने लगा उसका हाथ हल्का सा फिसल गया। थोड़ी सी सब्जी राजा के राजसी वस्त्रों पर गिर पड़ी। दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा की भौंहें तन गईं चेहरा क्रोध से लाल हो उठा। सेवक समझ गया कि उससे बड़ी भूल हो गई है।क्षण भर में ही सेवक ने कुछ निर्णय लिया। उसने बर्तन में बची सारी सब्जी उठाई और पूरी की पूरी राजा के वस्त्रों पर उड़ेल दी। यह दृश्य देखकर दरबारियों की सांसें थम गईं। राजा का क्रोध अब सीमा पार कर चुका था। उन्होंने गरजते हुए पूछा “अरे मूर्ख! यह दुस्साहस क्यों किया? क्या तुम्हें अपने प्राणों की चिंता नहीं?”

सेवक ने शांत स्वर में हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “महाराज, जब पहली बार सब्जी गिरी, तब आपके चेहरे का क्रोध देखकर मुझे लगा कि अब मेरा जीवन समाप्त है। फिर मैंने सोचा कि यदि आप मुझे छोटी सी भूल पर कठोर दंड देंगे, तो लोग कहेंगे कि राजा ने एक निष्ठावान सेवक को मामूली गलती पर मृत्यु दंड दे दी। इससे आपकी कीर्ति पर आंच आएगी। इसलिए मैंने पूरी सब्जी आपके वस्त्रों पर उड़ेल दी ताकि दुनिया यह समझे कि मैं बड़ा अपराधी हूँ और आप जो भी दंड देंगें वह उचित है। यहाँ आपकी मर्यादा बनी रहे यही मेरा कर्तव्य था। दरबार में मौन छा गया। राजा नंदा कस्वां के हृदय में जैसे किसी ने दीप जला दिया हो। उन्हें अहसास हुआ कि सच्चा सेवक वही होता है जो अपने स्वामी की प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को भी बलिदान करने को तैयार हो। उनका क्रोध शांत हो गया वे सिंहासन से उठे सेवक को अपने पास बुलाया और उसे क्षमा कर दिया।
राजा ने दरबार में घोषणा की, “क्षमा बड़ों का आभूषण है। यदि भगवान विष्णु को भी भृगु ऋषि की लात से कोई कमी नहीं आई, तो मैं क्यों अपने सेवक की भूल पर क्रोधित होऊँ? उस दिन से में एक नई सीख फैली जो व्यक्ति प्रेम और समर्पण से सेवा करता है, उससे भूल भी हो सकती है। परंतु उसकी निष्ठा और भावना को समझना ही सच्ची महानता है।
समर्पित लोगों की छोटी गलतियों पर क्रोध करने के बजाय उनके प्रेम और निष्ठा का सम्मान करना चाहिए। क्षमा ही सच्चे राजा और सच्चे मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण हैं l

5
36 views

Comment