वाराणसी : अहिल्याबाई होलकर की जयंती पर वैचारिक गोष्ठी
वाराणसी : लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की जयंती पर आयोजित वैचारिक संगोष्ठी में उनके जीवन, शासन और 18वीं सदी की राजनीति पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने बताया कि अहिल्याबाई केवल मंदिरों की रानी नहीं, बल्कि सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव की प्रतीक थीं। उनके शासनकाल में मस्जिदों और सूफी फकीरों को मिलने वाले अनुदान बंद नहीं किए गए। 18 जनवरी 1785 को एक सूफी संत को दान देने का उल्लेख उनकी सहिष्णु नीति का प्रमाण है।
गोष्ठी में कुम्हेर प्रसंग और महाराजा सूरजमल की उदारता पर भी चर्चा हुई। 1754 में खांडेराव होलकर की मृत्यु पर महाराजा सूरजमल ने शोक और सम्मान व्यक्त किया, जो उनके महान व्यक्तित्व को दर्शाता है। सती प्रथा के खिलाफ अहिल्याबाई के निर्णय और मल्हार राव होलकर की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया। इसके अलावा, नामकरण विवाद में राजस्थान के जाट नायकों और राजपूत शूरवीरों के योगदान की उपेक्षा पर चिंता जताई गई और महाराजा सूरजमल के नाम पर शिक्षा संकुल के नामकरण का सुझाव दिया गया।