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नर्म और नाज़ुक लहजे के शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की आयु में निधन

पदम श्री बशीर बद्र एक ऐसे शायर रहे जिन्होने अपने शेरों में न केवल रूह बख्शी बल्कि बहुत नर्मी और नज़ाकत के साथ जिंदगी के उन तजुर्बात को अपने शेरों में ढाला जिनको आम आदमी जीता है और महसूस करता है लेकिन उन्हें ज़ाहिर नहीं कर पाता। उनका एक बहुत मारूफ शेर जो इन्हीं जज़्बातो को दर्शाता है-

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

इसी क्रम में आज के नये परिवेश को बहुत समय पहले भांपते हुए उन्होंने लिखा:-

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

जब 1987 में मेरठ के दंगो में उनका घर जला दिया गया जिसमें उनकी बहुत सारी अप्रकाशित रचनाये और मूल प्रतियां भी जल कर खाक हो गयी तब उन्होंने कहा:

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”

यह शेर सांप्रदायिक हिंसा और सत्ता की संवेदनहीनता को उजागर करता है जो कि आज भी देश के विभिन्न जगहों पर प्रतिदिन देखने सुनने को मिल जाती है। बशीर बद्र ने दंगों को देखा और मेरठ से पलायन करके भोपाल में अपना आशियाना बसाया। परंतु इन सबके बावजूद उनकी शायरी ने बगावत या बदले का भाव नही आया। उन्होंने लिखा:-

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

बशीर बद्र ने जब मोहब्बत की बात की तो वह कुछ इस तरह बयान हुयी:-

“ना जी भर के देखा, ना कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की।”

जब जुदाई पर लिखा तो कुछ ऐसा कहा:-

"कई साल से कुछ खबर ही नहीं,
कहाँ दिन गुजारा कहां रात की।"

आधुनिक युग पर उनका तंज़ जो शहर की अब पहचान बन गया:-

“घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला।”

आज की मौजूदा सियासत की नब्ज़ को बरसों पहले भांपते हुये उन्होने आगाह किया:-

“मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ।”

रिश्तों के बनते बिगड़ते इस दौर को उन्होने कुछ ऐसा समझा:-

“मैं चुप रहा तो और ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ीं,
वो भी सुना है उस ने जो मैं ने कहा नहीं।”

अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में डिमेंशिया की बीमारी के कारण उनकी स्मृति ने उनका साथ छोड़ दिया। लेकिन जब उनके सामने उनका कोई पुराना शेर पढ़ा जाता तो वह भी उसे गुनगुनाने की कोशिश करते। बशीर बद्र की शायरी सुनिये तो आप स्वंय से सवाल करने लग जाते हैं :-

“ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।”

“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।”

सदी के इस महान शायर को शत शत नमन !!

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