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डिजिटल युग में खोती जा रही चिट्ठियों की मिठास, यादों में सिमटकर रह गया पोस्टकार्ड* *हाथ से लिखी चिट्ठियों की पुरानी यादें अब केवल अलमारियों में जीवित

*डिजिटल युग में खोती जा रही चिट्ठियों की मिठास, यादों में सिमटकर रह गया पोस्टकार्ड*
*हाथ से लिखी चिट्ठियों की पुरानी यादें अब केवल अलमारियों में जीवित*
खैरथल हीरालाल भूरानी
कभी चिट्ठियां केवल कागज नहीं होती थीं, बल्कि अपनों का प्यार, भावनाएं और रिश्तों की मिठास उनके शब्दों में बसती थी। डाकिए की साइकिल की घंटी सुनते ही लोग घर से बाहर निकलकर अपने नाम की चिट्ठी का बेसब्री से इंतजार किया करते थे। पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और लिफाफों की अपनी अलग पहचान हुआ करती थी। किसी बेटे को नौकरी की खबर भेजनी हो, शादी का निमंत्रण या दूरवर्ती रिश्तेदारों का हाल जानना-हर संदेश में अपनापन और इंतजार की मिठास थी। लेकिन डिजिटल युग ने इस परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया। मोबाइल, इंटरनेट, व्हाट्सएप, फेसबुक और ई-मेल की सुविधा ने संवाद के तरीके बदल दिए। पहले जो संदेश पहुंचने में कई दिन लगते थे, अब कुछ सेकंड में दुनिया के किसी कोने तक पहुंच जाते हैं। समय की कमी और तेज़ रफ्तार जिंदगी ने भी चिट्ठियों की संस्कृति को पीछे छोड़ दिया है। खैरथल में पहले तीन पोस्ट ऑफिस हुआ करते थे, अब मात्र एक आनंदनगर कॉलोनी में झूलेलाल मंदिर के पास बचा है। शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि चिट्ठियों में आत्मीयता और अपनापन होता था, जो डिजिटल संदेशों में आज नहीं दिखता। पुराने खत अब अमूल्य धरोहर बनकर घरों की अलमारी में रखे गए हैं, जो उस दौर की याद दिलाते हैं।
भारतीय डाक विभाग ने समय के साथ खुद को बदला और स्पीड पोस्ट, पार्सल सेवा, बैंकिंग और बीमा जैसी आधुनिक सेवाएं शुरू कीं, लेकिन पोस्टकार्ड और हस्तलिखित पत्रों की वह पुरानी पहचान धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही है। डिजिटल युग ने दुनिया को जोड़ दिया, लेकिन भावनाओं का वह रिश्ता और चिट्ठियों की मिठास अब केवल यादों में जिंदा है।

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