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उद्योगों के बंद होने पीछे छिपे वास्तु दोष

व्यापार में घाटा, बंद होते हुए उद्योग और वास्तुदोष
डॉ. अजय कुमार शर्मा (पीएचडी, वास्तुशास्त्र)
कई बार कोई व्यापार या उद्योग प्रारंभ में अच्छी प्रगति करता है, परंतु कुछ समय बाद अचानक घाटे में जाने लगता है। आर्थिक संकट बढ़ने लगता है और अंततः उद्योग या व्यापार बंद होने की स्थिति में पहुँच जाता है। सामान्यतः लोग इसका कारण प्रबंधन की कमियाँ, बाजार की परिस्थितियाँ या आर्थिक मंदी को मानते हैं, जबकि वास्तुशास्त्र के अनुसार परिसर में विद्यमान वास्तुदोष भी इसके प्रमुख कारणों में से एक हो सकता है।
वास्तु विशेषज्ञ डॉ. अजय कुमार शर्मा के अनुसार किसी भी व्यापारिक संस्था की सफलता केवल प्रबंधन, पूंजी और परिश्रम पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि कार्यस्थल की ऊर्जा तथा पंचतत्वों का संतुलन भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वास्तुशास्त्र में किसी भी उद्योग या व्यापार का आकलन करने से पूर्व उसके मुख्य प्रवेशद्वार का सही स्थान पर होना अत्यंत आवश्यक माना गया है। यदि प्रवेशद्वार सकारात्मक ऊर्जा वाले क्षेत्र में है तो वह व्यापार की उन्नति में सहायक होता है, किंतु यदि वह नकारात्मक ऊर्जा वाले क्षेत्र में स्थित हो तो व्यापार में लगातार बाधाएँ, आर्थिक नुकसान तथा अंततः बंद होने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
वास्तुशास्त्र किसी भी दिशा को अशुभ नहीं मानता, बल्कि उन दिशाओं में बनाए गए प्रवेशद्वारों के स्थान को महत्वपूर्ण मानता है। वास्तु सिद्धांतों के अनुसार प्रत्येक दिशा में आठ संभावित द्वार स्थान माने जाते हैं, जिनमें से केवल कुछ ही स्थान सकारात्मक एवं लाभकारी होते हैं। इनका सही निर्धारण सोलह दिशाओं वाले वास्तु मानचित्र के आधार पर किया जाता है।
ईशान, अग्नि, नैऋत्य तथा पश्चिम दिशा के कुछ विशेष भागों में स्थित मुख्य द्वार उद्योगों को भारी आर्थिक हानि पहुँचा सकते हैं। ऐसे स्थानों पर बने प्रवेशद्वारों के कारण व्यापारिक घाटा, आग लगने की घटनाएँ, दुर्घटनाएँ, चोरी तथा वित्तीय अस्थिरता जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। कई बार ऐसे उद्योग भारी कर्ज के बोझ तले दबकर बंद होने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। इसलिए किसी भी उद्योग या व्यापार के लिए उचित स्थान पर मुख्य प्रवेशद्वार का चयन अत्यंत आवश्यक है।
उद्योगों में पिट (गड्ढों) का भी विशेष महत्व होता है। लिफ्ट, मशीन फाउंडेशन अथवा अन्य तकनीकी आवश्यकताओं के लिए गड्ढे बनाना आवश्यक हो सकता है, किंतु उनका स्थान वास्तु सिद्धांतों के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, नैऋत्य कोण में बना गड्ढा उद्योग की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर सकता है तथा कई बार परियोजना के सुचारु रूप से प्रारंभ होने में भी कठिनाई पैदा करता है। अग्नि कोण में बना गड्ढा दुर्घटनाओं, मशीन संबंधी समस्याओं तथा आर्थिक प्रवाह में रुकावट का कारण बन सकता है।
इसके विपरीत उत्तर और पूर्व दिशा में बनाए गए पिट या जल स्रोत अनेक परिस्थितियों में उद्योग की प्रगति तथा आर्थिक लाभ में सहायक माने जाते हैं। यदि किसी कारणवश अन्य स्थानों पर पिट बनाना आवश्यक हो तो उचित वास्तु परामर्श एवं उपायों के माध्यम से संभावित दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है।
व्यापार में हानि पहुँचाने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम (South-South-West) का भी विशेष उल्लेख किया जाता है। यदि व्यापारी का मुख्य कार्यालय, लेखा विभाग अथवा तैयार माल का भंडारण इस क्षेत्र में अनुचित प्रकार से स्थित हो जाए, तो व्यापार की गति प्रभावित हो सकती है और उद्योग धीरे-धीरे आर्थिक संकट की ओर बढ़ सकता है।
इसके अतिरिक्त जिन उद्योगों या व्यापारिक परिसरों के दक्षिण भाग में नदी या जलधारा प्रवाहित होती है तथा समय-समय पर उसका जल परिसर की दीवारों को प्रभावित करता है, अथवा जिनका अपशिष्ट जल सीधे उसमें प्रवाहित किया जाता है, वहाँ भी वास्तु संबंधी असंतुलन उत्पन्न होने की संभावना मानी जाती है। ऐसे उद्योगों में दीर्घकालीन आर्थिक चुनौतियाँ, ऋणभार तथा व्यापारिक अस्थिरता देखी जा सकती है।
यदि किसी व्यापार या उद्योग में लगातार घाटा हो रहा हो, कार्य रुक-रुक कर चल रहा हो, मशीनें बार-बार खराब हो रही हों, दुर्घटनाएँ बढ़ रही हों अथवा उद्योग बंद होने की स्थिति में पहुँच रहा हो, तो अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ द्वारा वास्तु परीक्षण कराना तथा आवश्यक वास्तु सुधार एवं उपाय करना लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
— डॉ. अजय कुमार शर्मा
पीएचडी (वास्तुशास्त्र)
वैदिक वास्तु सलाहकार

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