logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

सम्राट का राज, पटोरी बेहाल : शाहपुर पटोरी के बदहाली के जिम्मेदार कौन ?

"अंधा गुरु बहरा चेला, मांगे गुड़ तो लावे ढेला।"

आज हमारे राज्य की स्थिति पर यह कहावत और यह पंक्तियाँ बिल्कुल सटीक बैठती हैं। बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सत्ता संभालते ही राज्य में विकास की रफ़्तार तेज करने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस कि इस तकनीक का लक्ष्य भ्रष्टाचार को मिटाना नहीं, बल्कि "हरे रंग के गमछे" वालों को पकड़ना है! मुख्यमंत्री की प्राथमिकता यह देखना हो गई है कि इस गमछे के रंग वाला उनका वोटर है या नहीं।

जब शहर की बुनियादी जरूरतें दम तोड़ रही हों, जब भ्रष्टाचार का दीमक विकास की जड़ों को चाट रहा हो, तब तकनीक और घोषणाओं का ढोल सिर्फ एक छलावा मात्र बनकर रह जाता है।


एक तरफ राजनीति के नए चश्मे से विरोधियों को चिह्नित करने का यह 'हाई-टेक' खेल चल रहा है, तो दूसरी तरफ हकीकत की जमीन पर भ्रष्टाचार का 'मैन्युअल खेल' खुलेआम जारी है। आम जनमानस इस बात से हैरान है कि जिस राज्य में हजारों करोड़ की लागत से बने पुल ताश के पत्तों की तरह आए दिन नदी में समा जाते हैं, वहाँ सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

पुलों को गिरने से बचाना और भ्रष्ट तंत्र पर लगाम लगाना, या 'हरे गमछे' वालों के पीछे मुस्तैद रहना?

बात जब भ्रष्टाचार की आती है, तो हमारा गृह नगर शाहपुर पटोरी नगर परिषद कोई अपवाद नहीं है। मुख्यमंत्री भले ही पटना से बड़े-बड़े दावे करें, लेकिन पटोरी को भ्रष्टाचार का दीमक दिनों-दिन चाट रहा है। यहाँ ठेका और टेंडर में कमीशन का खेल कोई अंदर की बात नहीं, बल्कि एक खुला सच है जिसे यहाँ का हर नागरिक रोजाना भुगत रहा है। कागजों पर विकास की योजनाएं बनती हैं, लेकिन धरातल पर आते-आते वे काली कमाई और अधिकारियों-ठेकेदारों की जेबों में समा जाती हैं।

पटोरी की जमीनी दुर्दशा सूबे के मुखिया की प्राथमिकताओं की पोल खोलने के लिए काफी है:

शहर के चौक-चौराहों पर लगीं जो 'हाई-मास्ट' और स्ट्रीट लाइटें जनता को उजाला देने के लिए आई थीं, वे लगने के तुरंत बाद ही 'आँख-मिचौली' का खेल खेल रही हैं। लगभग एक-तिहाई लाइटें आज भी बुझी पड़ी हैं, लेकिन कमीशन का भुगतान पूरा हो चुका है।

बीच सड़क पर घरों और दुकानों का गंदा पानी खुलेआम बह रहा है। शहर के बीचों-बीच स्थित ऐतिहासिक "गुलाब बुबना हाई स्कूल" आज अपने जीर्ण-शीर्ण और टूटे-फूटे हाल में आँसू बहा रहा है। इस ऐतिहासिक धरोहर के आस-पास प्रशासनिक लापरवाही के कारण गंदगी का अंबार लगा रहता है।

नगर परिषद के गठन के इतने दिनों बाद भी शहर में एक अदद ऑटो या बस स्टैंड तक नहीं बन सका। नतीजतन, पूरे शहर में जाम की समस्या आम है। इस जाम की मुख्य वजह है—चौक-चौराहों पर सक्रिय माफिया, जो ऑटो चालकों से जबरन और संगठित रूप से अवैध वसूली करते हैं। चूंकि ऑटो वाले माफिया को पैसा देते हैं, इसलिए वे बेतरतीब गाड़ियां खड़ी करने को मजबूर हैं। यह एक खुला संगठित अपराध है, जिसकी जानकारी प्रशासन को हमेशा दी जाती है, लेकिन अवैध पैसों की इतनी मोटी परत चढ़ी हुई है कि किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।

प्रशासनिक संवेदनहीनता का आलम यह है कि पिछले दिनों नगर परिषद में 30 लाख से ऊपर के गबन का पर्दाफाश हुआ, लेकिन वह फाइल भी 'पैसों के बोझ' तले दबा दी गई। जब राज्य के मुखिया ही 'हरे गमछे' की नई तकनीक में व्यस्त हों, तो स्थानीय अधिकारी बेलगाम क्यों न हों?

अभी कल ही समाचार पत्रों की सुर्खियां एक ठेकेदार (ऋशु श्री) के घर पर स्पेशल विजीलेंस यूनिट (SVU) के छापे से भरी थीं, जहाँ करोड़ों के गहने और भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ। इसमें अफ़सरों को काली कमाई के दम पर विदेश यात्राएं कराने का भी संगीन आरोप लगा है।

यहाँ मीडिया और समाज की मानसिकता पर भी एक कड़वा सवाल उठता है: जब कोई गरीब या मध्यमवर्गीय छात्र कड़ी मेहनत कर अधिकारी बनता है, तो अखबार के बीच वाले पन्ने पर एक छोटा सा समाचार लिख दिया जाता है। लेकिन, वही अधिकारी जब भ्रष्टाचार के दलदल में कंठ तक डूबकर पकड़ा जाता है, तो उसका 'फॉलोअप' समाचार मुख्य पृष्ठ पर हफ्तों तक चलाया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारा नैतिक स्तर किस कदर गिर चुका है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की एक और ताजा घोषणा से सरकारी कर्मचारी भले ही गदगद हों, जिसमें सपरिवार घूमने के लिए छुट्टी देने की बात कही जा रही है ताकि बिहार के पर्यटन को बढ़ावा मिले। हालांकि, पर्यटन स्थलों की वर्तमान दुर्दशा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है।

यह योजना ठीक वैसी ही है जैसे कुछ साल पहले बिहार के सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर तो दे दिए गए, लेकिन उसके सालों बाद तक सरकार को यह याद ही नहीं रहा कि उस कंप्यूटर को चलाने वाले शिक्षक तो स्कूल में हैं ही नहीं! नतीजा यह हुआ कि वे कंप्यूटर विद्यालयों में पड़े-पड़े सड़ गए। आज पर्यटन केंद्रों की बदहाली सुधारे बिना ऐसी घोषणाएं भी सिर्फ कागजी साबित होंगी।

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कभी खुले मंच से स्वीकार किया था कि "ठेकेदारी का पैसा नीचे से ऊपर तक आता है।" उनकी आलोचना भले ही हुई हो, लेकिन आज की स्थिति देखकर लगता है कि उन्होंने सिर्फ एक नग्न सत्य बयां किया था। इंजीनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों के घपले रोजाना हो रहे हैं, और राज्य का नेतृत्व 'हाई-टेक' होकर भी दिशाहीन है ।

विकास की बातें सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित हैं, क्योंकि सूबे की सियासत आज भी सिर्फ 'जाति के गणित' (Mathematics of Caste) पर टिकी है। सम्राट चौधरी को भी कुर्सी इसलिए मिली क्योंकि वे इस जातिगत समीकरण में फिट बैठ गए। वरना, उनसे कहीं ज्यादा तजुर्बेकार, विज़नरी और काबिल लोग आज भी पार्टी की मुख्यधारा से साइडलाइन हैं, क्योंकि वे जाति के इस अंकगणित पर फिट नहीं बैठते। जब तक नेतृत्व का पैमाना 'योग्यता और ईमानदारी' के बजाय 'जाति' रहेगा, तब तक शाहपुर पटोरी जैसी नगर परिषदों का उद्धार होना असंभव है।

मेरा सीधा सवाल है कि यदि 'हरे गमछे' वाले सरकार की पार्टी को सपोर्ट न करें, तो क्या इसका यह मतलब है कि वे राज्य छोड़कर चले जाएं? लोकतंत्र में सबके अपने मत हो सकते हैं, लेकिन विकास सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए और वह विकास 'सबका' होना चाहिए।

किसी भी लोकतंत्र में जनता की चुप्पी ही भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा संबल होती है। शाहपुर पटोरी से लेकर पटना तक, अगर हम केवल मूकदर्शक बने रहे, तो यह दीमक पूरे राज्य को खोखला कर देगा। सरकार का एजेंडा सिर्फ 'समीकरण' साधना या प्रतीकात्मक राजनीति नहीं होना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि आम जनता अपनी आँखें खोले, जात-पात और राजनीतिक रंगों के चश्मे को उतारे और प्रशासन व सरकार की आँखों में आँखें डालकर सीधे जवाब मांगे।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

240
7320 views

Comment