कोलकाता में वीर सावरकर की 143वीं जयंती पर भव्य स्मरण सभा का आयोजन; पारित हुए दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव
कोलकाता, २८ मई २०२६: बंगीय प्रादेशिक हिंदू महासभा (Bengal Provincial Hindu Mahasabha) के तत्वावधान में कोलकाता प्रेस क्लब में महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रणेता वीर विनायक दामोदर सावरकर की 143वीं जयंती के अवसर पर एक गरिमापूर्ण स्मरण सभा का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यक्रम में देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस महान मनीषी को श्रद्धांजलि देने के लिए कई प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, सामाजिक व सांस्कृतिक नेता, बुद्धिजीवी और बड़ी संख्या में आम नागरिक उपस्थित हुए।
स्वतंत्रता संग्राम और वैचारिक योगदान पर चर्चा
सभा के दौरान वक्ताओं ने वीर सावरकर के प्रखर बौद्धिक योगदान, सेलुलर जेल (अंडमान) में उनके द्वारा सहे गए अमानवीय अत्याचारों, उनके अद्वितीय साहस और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन और विचारधारा के साथ सावरकर जी का बहुत गहरा संबंध था। बंगाल के सशस्त्र आंदोलन के प्रति उनका अटूट समर्थन राष्ट्रवाद के इतिहास में हमेशा एक गौरवशाली अध्याय रहेगा।
सभा में सर्वसम्मति से पास हुए दो मुख्य प्रस्ताव
पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में वीर सावरकर को उनका उचित सम्मान दिलाने के लिए सभा के अंत में सर्वसम्मति से दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए:
विधानसभा में प्रतिमूर्ति की मांग: पश्चिम बंगाल विधानसभा परिसर में वीर सावरकर की एक भव्य प्रतिमूर्ति (आदमकद चित्र या प्रतिमा) स्थापित करने का अनुरोध करते हुए पहला प्रस्ताव पारित किया गया।
सड़क के नामकरण का अनुरोध: आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के उद्देश्य से कोलकाता की एक मुख्य और लोकप्रिय सड़क का नाम बदलकर 'वीर सावरकर' के नाम पर रखने के लिए नगर निगम (पौरसंस्था) से अनुरोध करने का दूसरा प्रस्ताव पास किया गया।
इस कार्यक्रम का संचालन और विज्ञप्ति बंगीय प्रादेशिक हिंदू महासभा के कार्यालय संपादक अंजन बंद्योपाध्याय द्वारा जारी की गई।
प्रलेखों में उल्लिखित वीर सावरकर के जीवन से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्य और महापुरुषों के विचार:
प्रेस विज्ञप्ति के साथ संलग्न अन्य प्रपत्रों में वीर सावरकर के ऐतिहासिक योगदानों और उनके प्रति देश के महान नेताओं के दृष्टिकोण को भी दर्शाया गया है:
ऐतिहासिक तथ्य: सावरकर पहले ऐसे भारतीय छात्र थे जिन्हें देशभक्ति के कारण कॉलेज और हॉस्टल से निष्कासित किया गया था। वह पहले ऐसे भारतीय नेता थे जिन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर बहिष्कार आंदोलन की शुरुआत की और जिन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा दो बार आजीवन कारावास (50 वर्ष के द्वीप निर्वासन) की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने सामाजिक सुधारों के तहत रत्नागिरी में पतितपावन मंदिर की स्थापना कर अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए काम किया था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार (1939): नेताजी ने सावरकर के योगदान को याद करते हुए कहा था कि उन्होंने युवाओं को प्रेरित करने के लिए 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर उत्कृष्ट पुस्तक लिखी और देश को सही नेतृत्व प्रदान किया।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचार: डॉ. अंबेडकर ने भी सावरकर के समाज सुधार के प्रयासों और सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उनकी गतिशीलता की सराहना की थी।
फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के विचार: उन्होंने सावरकर की निस्वार्थ देशभक्ति को रेखांकित करते हुए कहा था कि सावरकर ने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा, उनका एकमात्र सपना भारत को स्वतंत्र देखना था।