मशहूर शायर बशीर बद्र साहब का निधन, अदब की दुनिया में शोक की लहर
उर्दू अदब के मशहूर शायर का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। उनके इंतकाल की खबर से साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
"मुखालफतें मेरी शख्सियत संवारती हैं,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ..."
बशीर बद्र साहब की शायरी सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि जिंदगी का फलसफा थी। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्ते, दर्द और इंसानी एहसासों की गहराई साफ झलकती थी। उन्होंने अपनी कलम से करोड़ों दिलों को छुआ।
उनके कुछ अमर शेर आज भी हर दिल की आवाज़ हैं—
🖋️ "कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो.."
🖋️ "दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों.."
🖋️ "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए.."
🖋️ "मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी.."
🖋️ "घरों पर नाम थे और नामों के साथ ओहदे भी थे,
बहुत तलाश करने पर भी कोई आदमी नहीं मिला.."
बशीर बद्र साहब का जाना उर्दू शायरी के एक सुनहरे दौर का अंत है।
उनकी आवाज़, उनकी ग़ज़लें और उनके अल्फ़ाज़ हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
🙏 बशीर बद्र साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि
💐 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 💐