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क्या हिंदुत्व की राजनीति और ईद की बधाई में कोई अंतर्विरोध है? या यह 'सबका साथ' की व्यावहारिक राजनीति है?


​अक्सर सोशल मीडिया पर यह बहस छिड़ जाती है कि जो भाजपा नेता प्रखर हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं, वे ईद या अन्य त्योहारों पर फेसबुक और ट्विटर पर मुबारकबाद क्यों पोस्ट करते हैं? कुछ लोग इसे राजनीतिक मजबूरी कहते हैं, तो कुछ इसे 'दोहरा मापदंड'।
​लेकिन अगर राजनीति और शासन व्यवस्था को गहराई से समझें, तो इसके पीछे कई बड़े कारण नजर आते हैं:
​1️⃣ संवैधानिक पद की गरिमा: जब कोई नेता मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनता है, तो वह किसी एक वर्ग का नहीं बल्कि पूरे राज्य या देश का प्रतिनिधि होता है। लोकतांत्रिक परंपराओं के तहत सभी नागरिकों को उनके त्योहार पर बधाई देना एक प्रशासनिक और नैतिक दायित्व है।
​2️⃣ 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा: सरकारी योजनाओं (राशन, आवास, गैस कनेक्शन) का लाभ हर धर्म के जरूरतमंद को मिलता है। इसी तरह, त्योहारों पर बधाई देकर नेतृत्व यह संदेश देने की कोशिश करता है कि सरकार सभी के लिए है।
​3️⃣ पसमांदा मुस्लिम और चुनावी समीकरण: भाजपा पिछले कुछ समय से 'पसमांदा (पिछड़े) मुस्लिमों' को जोड़ने का प्रयास कर रही है। त्योहारों पर ये संदेश इसी आउटरीच का एक हिस्सा हैं।
​4️⃣ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति (Global Diplomacy): भारत के संबंध खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब आदि) के साथ बेहद मजबूत हैं। वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक समावेशी राष्ट्र की है, जिसे बनाए रखना देश के हित में जरूरी है।

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