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नारी तेरे कितने रूप !

"नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पग तल में, पियूष-स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।"

सृष्टि के प्रारंभ में जब विधाता ने इस ब्रह्मांड की रचना की, तो उन्होंने पुरुष और प्रकृति (नारी) के रूप में दो अद्भुत तत्वों को धरती पर भेजा। पुरुष को जहां पुरुषार्थ और सुरक्षा का दायित्व मिला, वहीं नारी को इस सुंदर संसार की रचना, निरंतरता और संस्कार गढ़ने का वरदान मिला। किसान जिस तरह खेत में बीज डालकर उसे एक विशाल, फलदार वृक्ष का रूप देता है, ठीक उसी तरह नारी ने अपने गर्भ से मानवता को सींचा है। वह केवल एक जीव नहीं, बल्कि इस पूरी सृष्टि की नियंता और विधाता की सबसे उत्कृष्ट रचना है।

लेकिन आज समय के चक्र ने एक ऐसा मोड़ लिया है जहां यह सवाल पूछना लाजिमी हो गया है—

"नारी तेरे कितने रूप?"

क्या आज की नारी अपनी उसी गरिमा को बचाए रख पाई है, या समानता की अंधी दौड़ में उसने अपनी सबसे बड़ी पूंजी यानी अपने "नारीत्व की खूबसूरती" को ही दांव पर लगा दिया है?


एक दौर था जब समाज का ढांचा बेहद संतुलित था। पुरुष धनार्जन कर परिवार की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता था, और नारी "गृहलक्ष्मी" के रूप में घर को स्वर्ग बनाती थी। वह केवल चौका-चूल्हा नहीं संभालती थी, बल्कि बच्चों को संस्कार, पति को संबल और घर के बुजुर्गों को मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी। उसका यह रूप पुरुष से कहीं ऊंचा और श्रेष्ठ था, क्योंकि पुरुष सिर्फ पैसा कमाता था, जबकि नारी "परिवार और समाज" का निर्माण करती थी।

समय बदला, व्यवस्थाएं बदलीं। बेटियों ने पढ़ना शुरू किया, वे मुख्यधारा में आईं और यह बदलाव बेहद सुखद था। समाज ने अपनी संकीर्ण सोच बदली और बेटियों को पंख दिए। उन्होंने चांद तक की दूरी तय की, सेना से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। पुरुषों ने भी इस सामाजिक उत्थान में उनका खुलकर साथ दिया। चारों तरफ एक ही नारा गूंजा—

"म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के?"

परंतु, इसी "बराबरी" के चक्कर में आधुनिक अभिभावकों और समाज से एक बहुत बड़ी चूक हो गई। बेटियों को "बेटों के बराबर" बनाने की होड़ में हम उन्हें यह सिखाना ही भूल गए कि वे बेटी हैं, और उनका बेटी होना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

आज शाहपुर पटोरी जैसे छोटे कस्बों से लेकर बड़े महानगरों की गलियों तक में जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं। यहाँ समाज से कुछ तीखे सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है:

एक स्त्री वह थी जो घर में आते ही बड़े-बूढ़ों, सास-ससुर, ननद-देवर और जेठ को एक धागे में पिरोकर रखती थी; वह पूजा की माला की तरह सबको गूंथ कर रखती थी। लेकिन आज की यह कौन सी स्त्री है, जो घर में आने के कुछ महीनों बाद ही एक चूल्हे को अनेक चूल्हों में बंटवा देती है? स्त्री तो भावना की प्रतिमूर्ति होती है, फिर यह कौन सी प्रवृत्ति है जो भाई-भाई को अलग करती ही है, साथ ही बेटे को भी उसके मां-बाप से दूर कर रसोई अलग करवा देती है?


एक वक्त था जब पुरुष अपनी कम पढ़ी-लिखी पत्नी के साथ भी पूरा जीवन सम्मानपूर्वक काट लेता था। फिर आज समाज किस दिशा में जा रहा है जहां यदि महिला कामकाजी (Job) है और पुरुष थोड़ा कम कमाता है या अस्थाई रूप से बेरोजगार है, तो आज की लड़कियां उसे स्वीकार नहीं करतीं? क्या पैसा अब घर बसाने की भावना से भी ऊपर हो गया है? ऐसा क्यों नहीं होता कि एक आत्मनिर्भर लड़की किसी संघर्षशील या बेरोजगार लड़के का हाथ थामकर उसका संबल बने? इन सवालों पर गहराई से सोचना बेहद ज़रूरी है।

लड़कों की बराबरी करने का मतलब आज यह मान लिया गया है कि जो बुराइयां पुरुषों में थीं, उन्हें लड़कियां भी अपना लें। सड़कों के किनारे, गुमटियों के पीछे सिगरेट के छल्ले उड़ाना, शराब पीना और इसे 'आज़ादी' या 'स्टेटस सिंबल' समझना—क्या यही वास्तविक महिला सशक्तिकरण है?

जब एक नवजात शिशु की मां शराब के नशे में धुत होकर सड़क पर गिरती है और राहगीर उसे संभालते हैं, तो वहां सिर्फ एक स्त्री नहीं गिरती, बल्कि पूरी मानवता और मातृत्व की गरिमा तार-तार हो जाती है। जो स्त्री कल तक 'शक्तिपुंज' थी, आज वह पाश्चात्य विकृतियों की गिरफ्त में आकर खुद को असहाय बना रही है। करियर और तथाकथित आधुनिक जीवनशैली के चक्कर में आज की पीढ़ी यह भूलती जा रही है कि एक स्वस्थ समाज के लिए 'घर बसाना' और 'आने वाली नस्लों को संस्कार देना' कितना अनिवार्य है।

इस आधुनिक दौर का एक कड़वा पहलू यह भी है कि समाज आज दोहरी मानसिकता के साथ जी रहा है। जो अभिभावक अपनी बेटी को आधुनिकता के नाम पर पूरी छूट देते हैं, उसे कोई घरेलू मर्यादा या संस्कार नहीं सिखाते; वही अभिभावक जब अपने घर में बहू लाते हैं, तो उम्मीद करते हैं कि वह 'सर्व-गुण संपन्न और संस्कारी' हो। यह विरोधाभास ही आज के पारिवारिक बिखराव और अदालतों में बढ़ते तलाक के मामलों की सबसे बड़ी वजह है। आप जो संस्कार अपनी बेटी को नहीं दे पाए, उसकी उम्मीद किसी और की बेटी से कैसे कर सकते हैं?

महिलाओं की सुरक्षा और उत्थान के लिए कड़े कानून बने, महिला आयोग का गठन हुआ और चुनावों से लेकर नौकरियों तक में आरक्षण दिया गया। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कानून या आरक्षण कभी भी किसी समाज की आंतरिक मानसिकता को नहीं बदल सकता। इस शोर का फायदा उठाकर राजनीतिक दल अपनी रोटियां तो सेंक लेते हैं, लेकिन धरातल पर नैतिक स्तर लगातार गिरता जा रहा है। जब तक समाज आंतरिक रूप से अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक कागजी अधिकार सिर्फ एक बैशाखी बनकर रह जाएंगे।

स्त्री सृष्टि के निर्माण से लेकर अब तक सर्वश्रेष्ठ रही है और अंत तक रहेगी। उसकी खूबसूरती उसके पुरुष जैसा बनने में नहीं है, बल्कि उसके "नारी होने" में है। उसकी कोमलता, उसका त्याग, उसका मातृत्व और उसकी मर्यादा ही उसकी असली शक्ति हैं।

आज वक्त आ गया है कि हम:

अपनी बेटियों को "बेटा" बनाने की होड़ से बाहर निकालें और उन्हें एक "सशक्त व संस्कारी बेटी" बनाएं, ताकि वे आने वाले कल में एक मजबूत घर और समाज की नींव रख सकें।

अपने बेटों को "पुरुषार्थ और नैतिकता" का पाठ पढ़ाएं, ताकि वे स्त्रियों का हृदय से सम्मान करना सीखें।

यदि आज हमने आधुनिकता के इस छद्म रूप को नहीं रोका, और बेटियों की इस प्राकृतिक शालीनता व मर्यादा को खोने दिया, तो आने वाली नस्लों का वैचारिक अवसान निश्चित है। एक स्वस्थ समाज बिखर जाएगा और हमारे पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा। नारी के अनेक रूप हो सकते हैं, लेकिन उसका सबसे सुंदर रूप वही है जो समाज को जीवन और संस्कार दे, न कि उसे विनाश की ओर ले जाए।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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