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भालौठ नहर को सीमेंट से पक्का करने का चौतरफा विरोध


हरियाणा के रोहतक जिले में भालौठ सब-ब्रांच नहर की तलहटी (बेड) को कंक्रीट और सीमेंट से पक्का करने के सरकारी फैसले के खिलाफ काहनी-रिठाल रोड सहित कई स्थानों पर किसानों और ग्रामीणों का तीव्र विरोध प्रदर्शन व धरना लगातार जारी है। इस विरोध के पीछे मुख्य वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण यह है कि कच्ची नहरों से होने वाला पानी का प्राकृतिक रिसाव आसपास के क्षेत्रों में 'भूजल रीचार्ज' का सबसे बड़ा जरिया होता है, जिससे भूमिगत जलस्तर (वाटर टेबल) बना रहता है और नलकूपों (ट्यूबवेल) में मीठा व पीने योग्य पानी उपलब्ध होता है। यदि नहर की तलहटी को पूरी तरह सीमेंट से बंद कर दिया गया, तो पानी का जमीन के नीचे जाना पूरी तरह रुक जाएगा, जिससे आने वाले समय में भूजल स्तर अत्यधिक नीचे चला जाएगा, कुएं व हैंडपंप सूख जाएंगे, और पहले पक्की की जा चुकी जवाहरलाल नेहरू नहर के कड़वे तजुर्बों की तरह यहां का पानी भी पूरी तरह खारा या फ्लोराइड युक्त हो जाएगा जो न पीने लायक बचेगा और न ही सिंचाई के योग्य।

इसके परिणामस्वरूप उपजाऊ जमीनें धीरे-धीरे बंजर होने लगेंगी, खेतों की नमी खत्म होने से पेड़-पौधे और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाएंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंचेगी। इस गंभीर समस्या के बावजूद 'आम जनता या शहरी आबादी' द्वारा किसानों का खुलकर साथ न देने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण काम कर रहे हैं; पहला कारण यह है कि सरकार और सिंचाई विभाग इस परियोजना को 'पानी की बर्बादी रोकने' और 'नहर के अंतिम छोर तक पूरा पानी पहुंचाने' के प्रशासनिक तर्क के साथ पेश करते हैं, जिससे गैर-कृषि और शहरी आबादी को लगता है कि इससे पानी का प्रबंधन सुधरेगा। दूसरा कारण यह है कि शहरी क्षेत्रों और औद्योगिक उपभोक्ताओं को पानी की आपूर्ति सीधे पाइपलाइनों या वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से सरकार द्वारा की जाती है, जिससे वे भूजल स्तर के तत्काल गिरने या हैंडपंप सूखने जैसी जमीनी समस्याओं को अपने जीवन से सीधा जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाते हैं।

तीसरा कारण यह है कि आधुनिक समाज में किसान आंदोलनों को केवल 'किसानों की निजी समस्या' के रूप में देखने की एक संकुचित धारणा बन चुकी है, जिससे आम नौकरीपेशा या शहरी नागरिक पर्यावरण के इस दूरगामी और विनाशकारी संकट को समझ नहीं पाते हैं। इस आंदोलन को धार देने के लिए अखिल भारतीय किसान सभा जैसे संगठनों और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित विपक्षी नेताओं ने भी रिठाल, धामड़, किलोई, काहनी और घिलौड़ जैसे प्रभावित गांवों के प्रदर्शनकारियों से मिलकर उनकी मांगों को जायज ठहराया है और सरकार से नहर के बेड को कच्चा रखने तथा पुलों के पास पशुओं व इंसानों के लिए पारंपरिक घाट बनाने की पुरजोर मांग की है।

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